The Token System999 / 1154

The Token System – Chapter 999

6 min read November 6, 2026

मैं नीचे भागा। बाहर आया तो फ़ौजी की गाड़ी दिखी नहीं। मैंने सड़क पर चारों तरफ़ देखा। तभी एक गाड़ी आई और रुकी। सुमन का चेहरा खिड़की से दिखा।

"अमर सुरक्षित है," सुमन ने कहा। "दूसरे अस्पताल में, फ़ौजी के साथ। जल्दी आ।"

मैं गाड़ी में बैठा। फ़ाइल और कॉपी दोनों मेरे पास थीं। मैंने खिड़की से बाहर देखा। अस्पताल का दरवाज़ा छोटा होता जा रहा था।

"मिल गया?" सुमन ने पूछा।

"मिल गया।" मैंने फ़ाइल उसकी तरफ़ बढ़ाई। "शेखर के बाप की पोस्टमार्टम रिपोर्ट। बदली हुई। और जिसने बदली, वो ख़ुद शेखर है।"

सुमन ने गाड़ी रोक द

॥

सुमन ने गाड़ी रोक दी थी, पर उसने इंजन नहीं बंद किया। मैंने फ़ाइल अपनी गोद में रखी और खिड़की से बाहर देखा। सड़क के दूसरी तरफ की दुकानों के शटर गिरे हुए थे। सुबह के सात बजे थे, धूप अभी नरम थी।

"लक्ष्मी से पूरी बात पूछनी है," मैंने कहा।

सुमन ने गाड़ी को सड़क किनारे लगाया। "मैं भी अंदर चलती हूँ।"

हम अस्पताल की इमरजेंसी के पास से होकर पीछे के गलियारे में गए। लक्ष्मी वहीं खड़ी थी, हाथ में एक गिलास। मुझे देखते ही गिलास रख दिया।

"लक्ष्मी," मैंने कहा, "उस रात। जब शेखर का काग़ज़ जला था। तुम ड्यूटी पर थीं?"

"हाँ। रात की ड्यूटी। बारह से सुबह आठ तक।"

"केबिन के बाहर कोई आया-गया?"

लक्ष्मी ने इर्द-गिर्द देखा। अस्पताल का गलियारा सुबह की सफ़ाई की आवाज़ों से भरा था। वो मुझे खींचकर दरवाज़े के पास ले गई।

"रात दो बजे के आसपास," उसने धीरे से कहा, "एक औरत निकली थी शेखर बाबू के केबिन से। मैं उस वक़्त दवा का ट्रॉली लेकर जा रही थी। मैंने उसे रोका भी — पूछा कौन है। वो बोली नहीं। बस सिर झुकाकर निकल गई।"

"कैसी औरत थी?"

"सफ़ेद साड़ी। सिर पर दुपट्टा। चेहरा छिपा था। उम्र कुछ पता नहीं चला। पर…" लक्ष्मी ने मेरी तरफ़ देखा, "उसके हाथ में एक पीतल का टुकड़ा था। चमक रहा था। और वो मास्टर जी — माफ़ करना, मन्नू बाबू — वो सीधे तुम्हारे पास से गुज़री। तुम बेंच पर सो रहे थे। उसका हाथ नीचे झुका। मैंने सोचा कुछ गिरा है। पर मैं उस वक़्त हिम्मत नहीं कर पाई कि जाकर पूछूँ।"

मेरी जेब में हाथ गया। टोकन वहीं था, ठंडा।

"और कोई पहचान?" मैंने पूछा।

लक्ष्मी ने ज़रा सोचा। "अंगूठी। उसकी उँगली में एक पुरानी अंगूठी थी। मोटी, काले पत्थर वाली। नीला-सा पत्थर। चमक नहीं रहा था, पर पत्थर बड़ा था।"

सुमन ने मेरी कलाई पकड़ी। "क्या हुआ?"

मुझे याद आ रहा था। भवानी के होम के पीछे वाले कमरे में, जहाँ रजिस्टर जला था — वहाँ एक तस्वीर थी। तीन आदमी। घर के सामने खड़े। और उस तस्वीर के कोने में, एक लटकती हुई औरत का आधा चेहरा — साड़ी में, गोल पल्लू, और उसका हाथ पकड़ी हुई एक और हाथ — जिसमें वही अंगूठी थी।

"मैंने वो अंगूठी देखी है," मैंने कहा। "भवानी की तस्वीर में।"

सुमन ने आँखें सिकोड़ीं। "मतलब वो औरत भवानी के घर की है?"

"या भवानी के ख़ून की।" मैंने टोकन जेब से निकाला। उस पर अभी भी वही ठंडक थी, कोई शब्द नहीं। "लक्ष्मी, तुमने देखा कि उसने टोकन मुझे दिया?"

"हाथ नीचे झुका, पर मैंने देखा नहीं कि कुछ गिरा। कम से कम मैंने उठाया नहीं।"

मैंने टोकन जेब में रखा और राजेंद्र को फ़ोन मिलाया। दो रिंग में उठा।

"राजेंद्र," मैंने कहा, "भवानी की कोई बहन है?"

दूसरी तरफ़ चुप्पी। फिर काग़ज़ खिसकने की आवाज़। "मुझे भी यही देखना है। मैं पुराने रिकॉर्ड में तेरा नाम ढूँढ रहा था, तभी एक तस्वीर मिली — भवानी के घर के सामने, एक औरत खड़ी है। किसी ने उसका चेहरा नहीं खुरचा, पर उसका नाम नहीं लिखा। बाकी तस्वीरों में भवानी का परिवार पूरा है। सिर्फ़ ये औरत अकेली है।"

"उसका नाम क्या है?"

"नाम नहीं मिल रहा। पर एक काग़ज़ पर लिखा है — 'बुआ के हिस्से की ज़मीन'। खेत्री के पुराने नक़्शे में एक प्लॉट उसके नाम पर है। नाम की जगह खाली।"

"राजेंद्र, ये औरत कल रात अस्पताल में थी। शेखर के केबिन में।"

"क्या?" उसकी आवाज़ बदल गई। "मैं अभी निकलता हूँ। तुम कहाँ हो?"

"अस्पताल। मैं तुम्हें फ़ोन पर लोकेशन भेजता हूँ।"

फ़ोन रखकर मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "अमर कहाँ है?"

"दूसरी मंज़िल। छोटा वार्ड। फ़ौजी बाहर है।"

मैं सीढ़ियों से ऊपर गया। वार्ड का दरवाज़ा खुला था। अमर बिस्तर पर लेटा था, आँखें खुली, छत को देख रहा था। उसके हाथ में एक कोरा काग़ज़ था, जिसे वो उँगलियों से मोड़ रहा था।

"अमर।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। चेहरे पर नशे जैसी सुस्ती थी, पर आँखें साफ़ थीं।

"तुम्हारे बाप की कोई बहन है?" मैंने सीधा पूछा।

अमर ने काग़ज़ मोड़ना बंद किया। "क्यों?"

"क्योंकि एक औरत कल रात शेखर के केबिन में थी और उसके हाथ में वही अंगूठी थी जो तुम्हारे घर की तस्वीर में है।"

अमर देर तक मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने आँखें बंद कर लीं। "बुआ हैं। बाप की बहन। पर उनसे कोई मिलता नहीं। बाप भी नहीं। वो होम के पीछे वाले पुराने हिस्से में रहती हैं। बीस साल से।"

"नाम?"

"कमलेश।" उसने आँखें खोलीं। "पर सब उन्हें बुआ कहते हैं। कोई उनका नाम नहीं लेता। बाप कहते थे कि उनका दिमाग़ ठीक नहीं है।"

मुझे कुछ याद आया — अमर के घर से मिले काग़ज़ों में, एक पुरानी सूची में, किसी नाम के नीचे एक आधा मिटा हुआ नाम था। मैंने उस वक़्त उसे छोड़ दिया था।

मैंने सक्सेना को फ़ोन मिलाया। एक रिंग, दो रिंग — उठाया नहीं। मैंने फिर मिलाया। इस बार दूसरी रिंग पर उठा।

"सक्सेना, मन्नू बोल रहा हूँ—"

"मन्नू।" उसकी आवाज़ अजीब थी। "मैं अभी तुम्हें ही फ़ोन करने वाली थी।"

मैं रुक गया। "क्या हुआ?"

"बसंत सिंह मिल गया है।"

मेरे हाथ से काग़ज़ गिरा। अमर ने उठाने की कोशिश की।

"कहाँ?"

"पुराने शहर में। उसके पुराने मकान के पीछे एक कमरे में। राजेंद्र की टीम ने ढूँढा — तुम्हारे काग़ज़ में उसका पता था। मैं अभी यहीं हूँ।"

"वो ठीक है?"

"जिस्म से ठीक है। पर बात नहीं करता।" सक्सेना की आवाज़ धीमी हुई। "बस एक ही नाम दोहराता है, मन्नू। बीस साल से एक ही नाम। जब भी कोई अंदर जाता है, वो सिर्फ़ एक लफ़्ज़ बोलता है — कमलेश।"

"कमलेश," मैंने दोहराया। "वही नाम जो अमर ने अभी बताया।"

सक्सेना ने साँस ली। "मन्नू, मुझे लगता है तुम्हें कुछ पता है।"

"भवानी की बहन है। अमर की बुआ। होम के पीछे वाले पुराने हिस्से में रहती है। बीस साल से।" मैंने अमर की तरफ़ देखा। वो बिस्तर पर बैठ गया था, मुँह खुला, जैसे पहली बार सुन रहा हो। "सक्सेना, बसंत सिंह को वहीं मत रखना। उसे उस कमरे से निकालो। अभी।"

"क्यों?"

"क्योंकि वो कमरा जिस मकान के पीछे है, वो मकान भवानी का पुराना ठिकाना निकल सकता है। और बसंत सिंह वहीं छिपा था — बीस साल। जिस आदमी ने भवानी का राज़ जाना, उसे भवानी के आदमी ही छिपाकर रख सकते थे।"

"समझ गई। मैं उसे सरकारी अस्पताल ले जा रही हूँ। पर मन्नू — वो किसी को छूने नहीं देता। डॉक्टर पास जाता है तो चिल्लाता है।"

"उसे छूने की ज़रूरत नहीं। बस उसके सामने मेरा नाम लेना। पूछना — मन्नू कौन है?"

"क्या?"

"बस पूछना। मैं पहुँचता हूँ।"

फ़ोन रखा। नीचे से सुमन की आवाज़ आई — वो किसी नर्स को डाँट रही थी। अमर ने मेरी कलाई पकड़ी।

"मन्नू, बुआ के बारे में मैंने कभी नहीं सोचा। बाप कहते थे वो बीमार हैं। मैं उस हिस्से में गया भी नहीं।"

"तुम उस हिस्से में जाते हो?"

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