The Token System998 / 1154

The Token System – Chapter 998

6 min read November 6, 2026

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कॉपी जेब से निकाली और उसका आख़िरी पन्ना खोला। नीचे अधूरा हस्ताक्षर — "शं…"। मैंने सुमन को दिखाया।

"शं… शेखर नहीं," सुमन ने धीरे से कहा। "पर हो सकता है शेखर का कोई अपना हो जिसका नाम शंकर हो।"

"या शेखर ख़ुद शंकर का बेटा हो," मैंने कहा। "और जिसे मारा गया वो उसका बाप।"

लक्ष्मी ने हाथ जोड़े और चली गई। गलियारा खाली हो गया। मैंने कॉपी वापस जेब में रखी और सुमन से बोला, "कल सुनवाई में ये कॉपी जज के सामने रखनी है। पर पहले मुझे एक चीज़ चाहिए — वो रजिस्टर जो जल गया। उसकी कॉपी।"

"कहाँ मिलेगी?"

"भवानी के होम का हर काग़ज़ पुलिस थाने में जमा होता है। राजेंद्र से कहता हूँ।"

मैं नीचे जाने लगा कि अमर के कमरे से आवाज़ आई। "मन्नू भाई!" मैं पलटा। अमर खिड़की की तरफ़ देख रहा था। "वो… वो नीचे सड़क पर। सफ़ेद कुर्ते वाला। वो गाड़ी के पास खड़ा है।"

मैं दौड़कर खिड़की तक गया। नीचे सड़क पर एक आदमी खड़ा था, सफ़ेद कुर्ता, काला चश्मा। वो ऊपर देख रहा था — सीधा हमारी खिड़की की तरफ़। मुझे देखते ही वो मुड़ा और तेज़ी से चल पड़ा।

"फ़ौजी!" मैंने चिल्लाया। "नीचे कोई सफ़ेद कुर्ते में भाग रहा है — पकड़ो!"

फ़ौजी नीचे भागा। मैं भी सीढ़ियों से उतरा। बाहर पहुँचा तो फ़ौजी सड़क के कोने पर खड़ा था, हाँफ रहा था। "साहब, ग़ायब हो गया। पीछे की गली में।"

मैंने चारों तरफ़ देखा। सड़क पर भीड़ शुरू हो गई थी। कोई सफ़ेद कुर्ता नहीं दिखा।

"साहब," फ़ौजी ने धीरे से कहा, "उसने आपको देख लिया।"

"हाँ।" मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था। "पर उसने ये नहीं देखा कि मेरे पास क्या है।"

ऊपर लौटा। सुमन दरवाज़े पर खड़ी थी। "क्या हुआ?"

"वो हमें देख रहा था। मतलब उसे पता है अमर यहाँ है।"

"तो अमर यहाँ सुरक्षित नहीं।"

"नहीं।" मैंने सोचा। "राजेंद्र से कहता हूँ, दो सिपाही अमर के कमरे के बाहर तैनात कर दे। और कल सुनवाई से पहले अमर को कहीं और शिफ़्ट कर देते हैं।"

सुमन ने सिर हिलाया। "और वो रजिस्टर?"

"राजेंद्र से बात करता हूँ। थाने में जमा काग़ज़ात में उसकी कॉपी हो सकती है।"

मैंने मोबाइल निकाला। बैटरी सिर्फ़ एक डंडी बची थी। राजेंद्र को फ़ोन मिलाया। दो बार बजा, फिर उठा।

"मन्नू? कहाँ हो?"

"अस्पताल। राजेंद्र, भवानी के होम का रजिस्टर जला दिया गया। पर थाने में उसकी कॉपी होगी न?"

"होनी चाहिए। पर उसमें क्या—"

"उसमें एक आदमी का निशान है। उलटा लंबा ज़ख़्म। वही ज़ख़्म शेखर की कलाई पर भी है।"

फ़ोन पर चुप्पी। फिर राजेंद्र की आवाज़ आई, "तुम कहना क्या चाहते हो?"

"मैं कह रहा हूँ कि शेखर उस आदमी को जानता है। या वो ख़ुद वही आदमी है। कल सुनवाई में ये बात रखनी है।"

"मन्नू, ये बहुत बड़ा इल्ज़ाम है। अगर ग़लत निकला—"

"तो मैं फँसूँगा। पता है।" मैंने कॉपी जेब में कसी। "पर राजेंद्र, मेरे पास उसके बाप की लिखी एक कॉपी है। उसमें लिखा है कि उसे मारा गया। और मारने वाला सफ़ेद कुर्ता पहनता है।"

फिर चुप्पी। लंबी।

"ठीक है," राजेंद्र ने धीरे से कहा। "मैं थाने से रजिस्टर की कॉपी निकलवाता हूँ। तुम अस्पताल में रहो। और मन्नू—"

"हाँ?"

"अमर को वहाँ से हटाओ। अभी।"

"मैं वही कर रहा हूँ।"

फ़ोन कटा। बैटरी की आख़िरी डंडी भी गई। मैंने मोबाइल जेब में रखा।

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "अब?"

"अब अमर को नीचे ले चलते हैं। फ़ौजी की गाड़ी से उसे दूसरे अस्पताल ले जाते हैं। और कल सुनवाई से पहले हम सब तैयार रहेंगे।"

हम अमर के कमरे में गए। उसने हमें देखा और बिना कुछ पूछे बोला, "मुझे ले जाना है कहीं?"

"हाँ," मैंने कहा। "कुछ देर के लिए।"

"ठीक है।" वो उठने लगा। सुमन ने उसे रोका और व्हीलचेयर मँगाई। हमने उसे बैठाया और लिफ़्ट की तरफ़ बढ़े।

रास्ते में मेरी जेब में टोकन फिर हिला। ठंडा। पर कोई शब्द नहीं। बस ठंडक, जैसे टोकन भी हमारे साथ चुपचाप चल रहा हो।

लिफ़्ट का दरवाज़ा खुला। भीतर उतरे। फ़ौजी नीचे तैयार खड़ा था। हम अमर को गाड़ी में बैठा ही रहे थे कि पीछे से कोई आया। मैं पलटा।

लक्ष्मी थी। साँस फूल रही थी। "मन्नू बाबू," वो हाँफते हुए बोली, "मैंने अभी देखा। शेखर बाबू अस्पताल आए हैं। वो डॉक्टर भारद्वाज के केबिन में गए हैं।"

मेरा दिल धक्क से रह गया। डॉक्टर भारद्वाज — तस्वीर वाला तीसरा आदमी।

"क्या बात कर रहे हैं?" मैंने पूछा।

"पता नहीं। पर केबिन का दरवाज़ा बंद है और भीतर से आवाज़ें आ रही हैं।" लक्ष्मी ने धीरे से कहा। "मैंने सुना शेखर बाबू कह रहे थे — 'वो काग़ज़ हमारे पास नहीं आना चाहिए।'"

मैंने सुमन की तरफ़ देखा। सुमन ने मेरी जेब की तरफ़ देखा, जहाँ कॉपी थी।

"गाड़ी स्टार्ट करो," मैंने फ़ौजी से कहा। "अमर को लेकर चलो। मैं पीछे से आता हूँ।"

"मन्नू—" सुमन ने हाथ पकड़ा।

"तू जा। अमर के साथ रह। मैं देखकर आता हूँ कि वो दोनों क्या रच रहे हैं।" मैंने कॉपी जेब से निकालकर सुमन को दी। "ये तेरे पास रहेगी। अगर मैं साढ़े आठ तक न आऊँ, तो राजेंद्र को दे देना।"

सुमन ने कॉपी ली। उसकी आँखों में डर था, पर उसने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया।

गाड़ी चली गई। मैं पलटा और लक्ष्मी के साथ अस्पताल के भीतर चला।

डॉक्टर भारद्वाज का केबिन पहली मंज़िल पर था। मैं सीढ़ियों से ऊपर गया, लक्ष्मी पीछे-पीछे। केबिन का दरवाज़ा बंद था। भीतर से आवाज़ें आ रही थीं — दबी हुई, तेज़।

मैंने कान सटाया।

शेखर की आवाज़ — "भारद्वाज, तुमने कहा था वो काग़ज़ जल गया। फिर वो कहाँ से आया?"

भारद्वाज — "मैंने तो जला दिया था। भवानी के होम में। पर कॉपी थाने में भी थी, शायद।"

"तो थाने से निकलवाओ। किसी को भेजो।"

"शेखर, थाना राजेंद्र के हाथ में है। वो मेरी बात क्यों मानेगा?"

"तो कुछ और करो। तुम डॉक्टर हो। तुम्हारे पास तरीक़े हैं।"

चुप्पी। फिर भारद्वाज की आवाज़ — "और अगर वो लड़का, मन्नू, सच में वही है?"

"तो वही हुआ जो हमें चाहिए।" शेखर की आवाज़ में कुछ ऐसा था जो सुनकर हाथ ठंडा हो गया। "उसके बाप ने भी यही किया था। सच बोला और मर गया। बेटा भी सच बोलेगा… और ख़त्म।"

मेरा हाथ दरवाज़े की मूठ पर था। एक धक्का और दरवाज़ा खुल जाता। पर तभी लक्ष्मी ने मेरा हाथ खींचा।

"मन्नू बाबू," वो फुसफुसाई, "ये सुनो।"

हम दीवार से सट गए। केबिन का दरवाज़ा खुला। शेखर बाहर निकले, भारद्वाज पीछे। दोनों तेज़ क़दमों से गलियारे के आख़िर की तरफ़ गए।

मैंने लक्ष्मी की तरफ़ देखा। वो फ़ाइल दबाए खड़ी थी। "मन्नू बाबू," उसने धीरे से कहा, "ये मैंने अभी भारद्वाज के केबिन की मेज़ से उठाई। इसमें वो नाम है।"

मैंने फ़ाइल खोली। भीतर एक पुरानी रिपोर्ट थी — पोस्टमार्टम की। नाम: शंकर सिंह। कारण: सिर पर गहरी चोट। तारीख़: दस साल पहले। और नीचे हस्ताक्षर — डॉक्टर भारद्वाज।

साथ में एक पर्ची थी, जिस पर लिखा था — "भाई साहब, ये रिपोर्ट बदल दी गई है। असली रिपोर्ट में लिखा था — धक्का देकर मारा गया। भेजने वाला: शेखर।"

मेरे हाथ काँपे। मैंने लक्ष्मी की तरफ़ देखा। "ये तुमने कहाँ से—"

"वो नाम," लक्ष्मी ने कहा, "जो शेखर बाबू बोल रहे थे — वो उनके बाप का था न?"

मैंने फ़ाइल बंद की। "नहीं। ये रिपोर्ट शंकर सिंह की है। और जिसने इसे बदला, वो शेखर है।" मैंने फ़ाइल जेब में रखी। "मतलब शेखर ने अपने ही बाप की मौत की रिपोर्ट बदली है।"

लक्ष्मी ने मुँह पर हाथ रखा।

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