The Token System – Chapter 997
नीचे पहुँचा तो एक सिपाही गाड़ी के पास खड़ा था। लंबा, पतला, छोटी मूँछें — नाम फ़ौजी था। मैंने उसे सोने से जगाया।
"भवानी का होम चलना है। जल्दी।"
"अभी? साहब, सुबह के पाँच ही बजे—"
"अभी।"
फ़ौजी गाड़ी निकालने लगा।
रास्ते में शहर खाली था। कुछ ठेले-रेहड़ी वाले दिखे, एक दूधवाला साइकिल पर बर्तन टाँगे जा रहा था। मैं खिड़की से बाहर देखता रहा और सोचता रहा। शेखर का केबिन। लक्ष्मी का कहना था कि वो आदमी शेखर से मिलकर आया, पर हाथ में किसी और का सामान था। मतलब शेखर किसी की मोहर लगा रहा है? और वो पीतल का टुकड़ा — किसी और का सामान — उसने वही मेरी जेब में डाला। क्यों?
गाड़ी भवानी के होम के गेट पर रुकी। लोहे का बड़ा फाटक, ऊपर जंग लगा ताला। अंदर बरगद का पेड़ था, उसकी जड़ें दीवार तोड़कर बाहर आ रही थीं।
"ताला खोलना पड़ेगा," फ़ौजी ने कहा।
"तोड़ दे।"
"साहब, बिना वारंट के—"
"फ़ौजी, उस ताले के पीछे एक काग़ज़ है जो सुनवाई पलट सकता है। तोड़ दे। मैं ज़िम्मा लेता हूँ।"
फ़ौजी ने एक पत्थर उठाया और ताले पर दे मारा। दो बार में टूट गया। फाटक खुला।
अंदर क़दम रखते ही हवा बदली। नमी, फफूँद, और कुछ जला हुआ — जैसे किसी ने काग़ज़ जलाया हो। मैं तेज़ी से दालान से गुज़रा। जहाँ रजिस्टर रखा था वो आलमारी — वहाँ पहुँचा तो आलमारी का दरवाज़ा खुला पड़ा था।
अंदर सिर्फ़ राख थी।
फ़ौजी पीछे आया। "साहब—"
मैं झुका। राख में उँगली डाली। अभी भी गुनगुनी थी। ज़्यादा देर नहीं हुई। मैंने इधर-उधर देखा। फ़र्श पर जलते काग़ज़ का एक कोना पड़ा था, बाक़ी सब उड़ गया। कोने पर आधा अक्षर दिख रहा था — "भा"।
"कोई यहीं था," मैंने कहा। "हम आने से पहले।"
फ़ौजी ने बंदूक संभाली। "कौन?"
"पता होता तो यहाँ क्यों आता?" मैंने राख से हाथ झाड़ा। पीछे मुड़ा। दालान के आख़िर में एक छोटा कमरा था, उसका दरवाज़ा अब भी खुला था, पर भीतर अँधेरा था।
मैंने मोबाइल की टॉर्च जलाई। कमरे में एक चारपाई, एक मेज़, और दीवार पर लगी एक फटी तस्वीर। तस्वीर में तीन आदमी थे, सफ़ेद कुर्ते में, पीछे बरगद का पेड़। उनमें से एक का चेहरा फटा हुआ था — जैसे किसी ने नाखूनों से खुरच दिया हो।
दूसरा आदमी — मैं और पास गया। इसे मैंने पहले कहीं देखा था। चौड़ा चेहरा, घनी भौंहें। सोचा… सोचा… फिर याद आया। ये वही डॉक्टर था जिसने पहली रात सुमन के साथ इमरजेंसी में ड्यूटी की थी। डॉक्टर भारद्वाज।
तीसरा आदमी? तीसरा तो… मेरा हाथ रुक गया। उसका चेहरा साफ़ था। आँखों में वही झुकी हुई नज़र। मैंने तस्वीर नाखून से खुरची — नहीं, वो छपी हुई थी। पर नीचे एक नाम लिखा था, छोटे अक्षरों में — "स्व." यानी स्वर्गीय।
तस्वीर के नीचे मेज़ पर एक कॉपी पड़ी थी। खुली हुई। मैंने उसे उठाया। भीतर बस एक पन्ना भरा था, बाक़ी खाली। उस पन्ने पर लिखा था —
"अगर मैं मरूँ, तो ये बात किसी को नहीं। पर अगर मेरा बेटा आए, तो उसे बताना — उसका बाप मरा नहीं, उसे मारा गया। मारने वाला वही है जो आज भी सफ़ेद कुर्ता पहनता है। और हाँ — रजिस्टर में जो निशान है, वो मेरा नहीं, उसका है।"
नीचे तारीख़ थी — कोई दस साल पुरानी। और उसके नीचे एक अधूरा हस्ताक्षर — "शं…"।
मेरा दिमाग़ ठंडा हो गया। शं… शंकर? शेखर का कोई? या…
फ़ौजी ने बाहर से आवाज़ दी। "साहब, कोई आ रहा है। गाड़ी की आवाज़।"
मैंने कॉपी जेब में डाली और तस्वीर उतार ली। बाहर भागा। फाटक से एक सफ़ेद गाड़ी अंदर आ रही थी।
"छिपो," मैंने फ़ौजी को खींचा। हम बरगद के पेड़ की जड़ों के पीछे दुबक गए।
गाड़ी रुकी। उसमें से दो आदमी उतरे — दोनों सफ़ेद कुर्ते में। एक ने आलमारी की तरफ़ देखा, फिर राख में हाथ डाला। "जला दिया ठीक है," उसने कहा। "पर कोई आया था। ताला टूटा है।"
दूसरे ने कहा, "जल्दी कर। साहब ने कहा है, कुछ भी बचा हो तो साफ़ कर दो।"
वो कमरे की तरफ़ बढ़े। मेरा हाथ फ़ौजी की बंदूक पर था। फ़ौजी ने धीरे से सिर हिलाया — मत करो।
मैंने जेब से टोकन निकाला। ठंडा था। मैंने उसे मुट्ठी में भींचा। कोई शब्द नहीं आया। बस ठंडक। जैसे टोकन भी दुबक गया हो।
वो दोनों कमरे में घुसे। एक ने कॉपी की जगह देखी — खाली मेज़। "यहाँ कुछ था।" दूसरा बोला, "छोड़। जो मिला वो जला दिया। साहब को बता दे।"
वो बाहर निकले। सफ़ेद गाड़ी में बैठे और चले गए।
हम कुछ देर और दुबके रहे। फिर फ़ौजी ने धीरे से कहा, "साहब, जो कॉपी आपने उठाई—"
"ये।" मैंने उसे दिखाई।
फ़ौजी ने पढ़ा। उसका चेहरा उतर गया। "साहब, ये तो… ये तो कोई मर्डर है।"
"हाँ।" मैंने कॉपी संभाली। "और उसका सुराग़ शेखर के केबिन से होता हुआ भवानी के होम तक आता है।"
गाड़ी की तरफ़ बढ़े। फ़ौजी ने इग्निशन दिया। तभी मेरा मोबाइल बजा। सुमन।
"मन्नू? अमर को होश आ गया। वो कुछ कह रहा है, बार-बार तेरा नाम ले रहा है। और…" उसकी आवाज़ रुकी। "और राजेंद्र आ गए हैं। कह रहे हैं सुनवाई आगे बढ़ गई है — आज नहीं, कल नौ बजे। जज ने एक दिन का और वक़्त दिया है।"
"क्यों?"
"क्योंकि शेखर के वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल के पास नया सबूत है। मन्नू, शेखर कुछ और लेकर आ रहा है।"
मैंने कॉपी जेब में कसकर दबाई। "मैं आ रहा हूँ।"
अस्पताल पहुँचा तो सूरज निकल चुका था। फ़ौजी गाड़ी लेकर नीचे रुका। मैं सीधा ऊपर गया। अमर का कमरा दूसरी मंज़िल पर था, आख़िरी कोने में। दरवाज़े पर सुमन खड़ी थी।
"वो कह रहा है," सुमन ने धीरे से कहा, "कि उसने सफ़ेद कुर्ते वाले की आवाज़ पहचान ली है।"
मैं भीतर गया। अमर बिस्तर पर लेटा था, सिर पर पट्टी, आँखें खुली। मुझे देखते ही उसने हाथ बढ़ाया।
"मन्नू भाई," वो फुसफुसाया। "मुझे याद आया। वो आदमी जब पर्ची ठूँस रहा था, तो हाँफ रहा था। जल्दी में था। और उसके मुँह से एक नाम निकला — 'शेखर भाई, जल्दी करो।'"
मैं सुन्न रह गया।
"मतलब वो शेखर का आदमी था," सुमन ने कहा।
"या शेखर ख़ुद था," मैंने कहा। "सफ़ेद कुर्ते में। और कल जज के सामने शेखर नया सबूत लाएगा। मतलब वो वो सबूत जला नहीं पाया जो वो आज मुझसे छीनना चाहता था।" मैंने कॉपी निकाली। "पर ये उसके पास नहीं है।"
अमर ने कॉपी देखी। "ये क्या है?"
"तेरे बाप की लिखी बात।" मैंने धीरे से कहा। "अमर, तेरे बाप को मारा गया था। और उन्हें मारने वाला आज भी सफ़ेद कुर्ता पहनता है।"
अमर की आँखें भर आईं। उसने मुँह फेर लिया।
सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर खींचा। "मन्नू, एक बात और। नर्स लक्ष्मी ने मुझे भी कुछ बताया। उसने कहा — उस रात जब वो आदमी शेखर के केबिन से निकला, तो उसके पीछे-पीछे शेखर भी निकले थे। और शेखर के हाथ में एक फ़ाइल थी, जिस पर लिखा था… 'भवानी होम — बंद'।"
"मतलब शेखर को पहले से पता था?"
"लगता है।"
मैं गलियारे में खड़ा सोचने लगा। कॉपी जेब में थी, तस्वीर भी। चार घंटे में सब कुछ पलट गया था। सुनवाई कल तक टल गई थी, पर शेखर कुछ और लेकर आने वाला था। और मेरे पास वो था जो शेखर ने जलाना चाहा था।
तभी लक्ष्मी गलियारे के आख़िर से आई। इस बार उसके हाथ में फ़ाइल नहीं थी। वो सीधी मेरे पास आई और बिना रुके बोली, "मन्नू बाबू, मुझे कुछ और याद आया। उस रात उस आदमी की कलाई पर जो ज़ख़्म था — उलटा लंबा — वो मैंने शेखर बाबू की कलाई पर भी देखा है।"
"क्या?"
"उनकी कमीज़ के कफ़ से झलकता है कभी-कभी। मैंने दो बार देखा।"
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