The Token System996 / 1154

The Token System – Chapter 996

7 min read November 6, 2026

"किशोरी लाल नहीं था," उसने कहा।

"नहीं। कोई और है।" मैंने टोकन जेब से निकाला। वो अब भी ठंडा था, पर अब उस पर एक शब्द उभरा — "कुआँ।"

"वो फिर कुआँ कह रहा है," मैंने कहा।

"तो चलो," राजेंद्र ने कहा। "कुएँ की तरफ़।"

हम पीछे की गली से भवानी के होम की तरफ़ बढ़े। दो घंटे बाकी थे, पर मुझे लग रहा था कि वक़्त तेज़ी से भाग रहा है।

॥

राजेंद्र ने गली के मोड़ पर पीछे मुड़कर देखा, फिर मेरी तरफ़। मेरी जेब से टोकन निकालकर मैंने उसे दिखाया — उस पर वही शब्द अब भी जमा था, कुआँ।

"ये क्या है?" राजेंद्र ने पूछा।

"बस एक डिबिया है," मैंने कहा। "जो अमर के पास से आई थी। इसमें पता लिखा आता रहता है।"

"तुम्हें कैसे पता कि अमर कुएँ पर है?"

मैंने टाल दिया। "बस पता है। ऐसा लग रहा है।"

राजेंद्र ने मेरी आँखों में देखा, कुछ कहता तो नहीं, पर मुझे पता था वो सवाल पीछे नहीं छोड़ेगा। उसने सिर्फ़ इतना कहा, "तो चलो। पर मैं दो सिपाही साथ लेकर चलूँगा। ये भवानी का होम है, वहाँ अकेले जाना ठीक नहीं।"

वो फ़ोन पर एक अधिकारी से बात करने लगा। मैंने उस बीच सुमन को फ़ोन मिलाया।

"सुमन, हमें भवानी के होम के पीछे वाले कुएँ पर जाना है। अमर वहाँ हो सकता है।"

"मन्नू, ये तुम्हें कैसे पता?"

"बस पता है," मैंने कहा। "तुम भी वहाँ चलो। अगर वो घायल है तो उसे डॉक्टर की ज़रूरत होगी।"

वो एक पल चुप रही, फिर बोली, "अच्छा। मैं अपना बैग लेकर पहुँचती हूँ। पर एक बात याद रखना — वहाँ भवानी के आदमी होंगे। अगर तुम मुझे वहाँ फँसाओगे, तो मैं तुम्हारी जान ले लूँगी।"

"मेरी जान तुम क्या लोगी, सुमन," मैंने कहा। "मेरी जान तो पहले ही बहन की शादी के लफ़ड़े में बंधी है।"

वो हँसी, पर उस हँसी में थकान थी।

हम तीन आदमी — मैं, राजेंद्र और उसका एक सिपाही — भवानी के होम की पिछली गली से पहुँचे। वो गली अब भी वैसी ही सूनी थी, पर रात की ठंड में जिस तरह सड़क की धूल उड़ रही थी, उससे लग रहा था कि कुछ अभी-अभी हुआ है।

पीछे का फाटक खुला था। और आँगन सूनसान।

"ये फाटक खुला क्यों है?" सिपाही ने धीरे से कहा।

"शायद इतनी जल्दी में भागे कि बंद करना भूल गए," मैंने कहा।

हम अंदर बढ़े। कुएँ की तरफ़ जाते रास्ते पर पत्थर बिखरे थे, जैसे कोई किसी को घसीटकर लाया हो। कुएँ के चारों तरफ़ लोहे की जाली थी, पर उसका एक हिस्सा टूटा पड़ा था।

और वहाँ, कुएँ के मुँह से चार हाथ दूर, व्हीलचेयर औंधी पड़ी थी। और उसके पास ही एक आदमी मुँह के बल ज़मीन पर पड़ा था।

सुमन पीछे से आई ही थी कि उसने दौड़ लगा दी। मैंने उसे देखा — वो घुटनों के बल बैठी और उस आदमी की नाड़ी पकड़ी। फिर गर्दन उठाकर बोली, "साँस चल रही है, पर बहुत धीमी। इसका सिर फटा है, बहुत खून गया है। इसे तुरंत अस्पताल ले चलो।"

राजेंद्र ने अपने सिपाही को इशारा किया। "गाड़ी लाओ। जल्दी।"

मैं अमर के पास झुका। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था और माथे पर सूखा खून जमा था। उसकी उँगलियाँ कुछ पकड़े हुए थीं। मैंने देखा — एक पीली पर्ची, मुट्ठी में दबी।

मैंने धीरे से खोली। दो लाइनें थीं, नीली स्याही में — "तेरे बाप ने भेजा है, तेरे पास रहना।"

और नीचे वही उलटा कोना-चिह्न।

मेरा दिल धक-धक करने लगा। मैंने वो पर्ची हवा में लहराते हुए पढ़ी, फिर जेब में डाल दी।

"क्या है?" सुमन ने पूछा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बकवास है। चलो इसे उठाओ।"

हमने उसे गाड़ी में डाला। सुमन ने अपना बैग खोला और उसके सिर पर पट्टी बाँधने लगी। राजेंद्र गाड़ी चलाने बैठा। मैं पीछे बैठा, अमर का सिर अपनी गोद में रखा।

गाड़ी के हिचकोले से अमर की आँखें खुलीं। वो मुझे देखने लगा।

"मन्नू…" उसकी आवाज़ फटी हुई थी।

"चुप रहो," मैंने कहा। "अस्पताल पहुँच रहे हैं।"

"सुनो," उसने मेरी कलाई पकड़ ली। "मेरे बाप ने नहीं भेजा। मैं ख़ुद भागा था — व्हीलचेयर से उतरकर, उस कमरे से जहाँ वो मुझे रखते हैं। पर जिसने मुझे पकड़ा, उसने ये पर्ची मेरी मुट्ठी में ठूँस दी।"

"कौन था?"

"मैंने चेहरा नहीं देखा। आवाज़ सुनी। सफ़ेद कुर्ते में कोई था। बस इतना कह गया कि ये तेरे बाप ने भेजी है।"

"मेरे बाप?" मैंने कहा। "मेरे बाप कहाँ हैं?"

अमर ने आँखें बंद कर लीं। "मुझे नहीं पता। वो बस यही कह गया।"

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा, फिर अमर की तरफ़। "साँस ठीक चल रही है अब। पर सिर की चोट गहरी है।"

हम अस्पताल पहुँचे। सुमन ने इमरजेंसी के दो कर्मचारियों को बुलाया और स्ट्रेचर मँगाया। अमर को अंदर ले जाया गया। मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा रह गया।

भीतर से सुमन की आवाज़ आई, "आधा मिलीग्राम, जल्दी करो। और ड्रेसिंग ट्रॉली लाओ।"

तभी मुझे कोई पीछे से छुआ। मैंने पलटकर देखा — नर्स लक्ष्मी थीं, सफ़ेद यूनिफ़ॉर्म में, हाथ में फ़ाइल दबाए।

"मन्नू बाबू," उन्होंने फुसफुसाकर कहा, "एक बात। ज़रा सुनिए।"

मैं उनके साथ एक तरफ़ खिसका।

"उस रात, जब आप अस्पताल में थे," लक्ष्मी ने धीरे से कहा, "मैंने देखा था कि कोई आपकी जेब में कुछ डाल रहा था। पीतल का टुकड़ा। वो आदमी शेखर बाबू के केबिन से निकला था।"

"मतलब?"

"मतलब ये कि वो आदमी शेखर बाबू से मिलकर आया था," उसने कहा। "और उसके हाथ में था किसी और का सामान। शेखर बाबू का अपना नहीं था।"

"किसका?"

"पता नहीं।" वो पीछे मुड़ी। "पर उस आदमी की कलाई पर एक ज़ख़्म था। उलटा लंबा। मैंने वो ज़ख़्म इससे पहले भी एक जगह देखा है।"

"कहाँ?"

लक्ष्मी ने पलटकर मेरी तरफ़ देखा। "भवानी के होम के रजिस्टर में। उस रजिस्टर में यही ज़ख़्म वाला आदमी, नाम नहीं, बस निशान ही दर्ज था।"

वो चली गई। मैं वहीं खड़ा रह गया।

जेब में टोकन अब भी ठंडा था, पर उसका शब्द बदल रहा था — "कुआँ" धुँधला हो रहा था और उसकी जगह एक नया शब्द बन रहा था, जो अभी पूरा नहीं उभरा था।

मैंने गले में हाथ डाला और बाहर की तरफ़ देखा। सुनवाई नौ बजे थी। अभी सुबह पाँच ही बजे थे। चार घंटे।

लक्ष्मी के जाने के बाद मैंने जेब से टोकन निकाला। पीतल का वो टुकड़ा हथेली में रखा तो ठंडा ही था। मैंने आँखें बंद करके उसे सुना। अब "कुआँ" नहीं आ रहा था। कोई और शब्द बन रहा था — धीमा, अधूरा, जैसे कोई रेडियो की तरंग पकड़ने की कोशिश कर रहा हो। हाथ में ज़ोर डाला। पसीना छूट गया। फिर साफ़ सुनाई दिया — "रजिस्टर"।

आँख खोली। चार घंटे बचे थे। और रजिस्टर भवानी के होम में था, जो अब ताले में बंद था।

मैं इमरजेंसी के दरवाज़े तक गया। सुमन भीतर खड़ी थी, डॉक्टर को बता रही थी कुछ। मैंने हाथ हिलाया। वो बाहर आई, दस्ताने उतारते हुए।

"अमर ख़तरे से बाहर है," उसने कहा। "सिर की चोट गहरी थी, पर टाँके लग गए। दो घंटे में होश पूरा आ जाएगा। तू कहाँ जा रहा है?"

"भवानी के होम।"

"अभी? मन्नू, सुनवाई—"

"सुनवाई से पहले वो रजिस्टर चाहिए। लक्ष्मी ने कहा उसमें उस आदमी का निशान है। अगर वो निशान किसी काम का है, तो जज के सामने लगाना पड़ेगा। वरना राजेंद्र का केस हवा में उड़ जाएगा।"

सुमन ने मेरी आँखों में देखा। "तू अकेला मत जा।"

"राजेंद्र के सिपाही नीचे खड़े हैं। एक को ले लेता हूँ।"

"मैं भी चलूँ?" उसने अपना बैग उठाया।

"तू यहीं रह। अमर को अकेला मत छोड़।" मैंने दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया। "और अगर मैं साढ़े आठ तक न लौटूँ, तो राजेंद्र को फ़ोन कर देना।"

"मोबाइल तो तेरे पास है न?"

जेब टटोली। था। बैटरी कम थी, पर था।

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