The Token System – Chapter 995
"मैंने कहा कि अमर यहाँ भर्ती नहीं है, तो मैं दवा क्यों दूँ?" सुमन ने रजिस्टर मेज़ पर रखा। "पर उसकी बात से साफ़ था कि उसे पता है कि अमर किस हाल में है। उसने ये भी कहा — 'उसे ज़्यादा देर नहीं है'।"
"यानी वो उसे कहीं और ले गए हैं," मैंने कहा, "और वो जगह भवानी का होम नहीं है, क्योंकि होम में तो दवा है। वो उसे किसी ऐसी जगह ले गए हैं जहाँ दवा नहीं है।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "या फिर वो उसे होम ले गए हैं और हमें ये दिखाना चाहते हैं कि वो कहीं और है।"
राजेंद्र ने कहा, "होम में जाना ख़तरे से खाली नहीं है। भवानी वहाँ है, उसके आदमी हैं, और अगर किशोरी लाल भी वहीं है, तो —"
"तो क्या?" मैंने कहा। "मैं अपनी माँ को और अपने भाई को छोड़कर बैठा रहूँ?"
सुमन ने हाथ उठाया। "रुको। पहले सोचो। अगर तुम सीधे होम के सामने के दरवाज़े से जाओगे, तो वो तुम्हें रोक लेंगे। पर अगर तुम पीछे से जाओ — रसोई वाले रास्ते से — तो शायद अंदर पहुँच जाओ।"
"पीछे का रास्ता बंद होता है," राजेंद्र ने कहा।
"रात दो बजे के बाद खुलता है," सुमन ने कहा। "चौकीदार बदलता है। तीन मिनट का वक़्त होता है जब दोनों चौकीदार एक-दूसरे से बात करते हैं।"
मैंने घड़ी देखी। रात के ग्यारह बज रहे थे।
"तीन घंटे हैं," मैंने कहा।
"तीन घंटे बहुत हैं," राजेंद्र ने कहा। "इस बीच हमें पता लगाना होगा कि किशोरी लाल कहाँ है। वो हवेली में नहीं है — वो कबाड़े के मोड़ पर था। और अगर वो माँ को ले गया है, तो वो उसे कहीं ऐसी जगह रखेगा जहाँ कोई न ढूँढ सके।"
"छत," मैंने कहा।
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
"टोकन पर ये शब्द उभरा था। 'छत।' मैंने सोचा कि ये हवेली की छत है, पर अब लगता है — ये कहीं और की छत है।"
सुमन ने धीरे से कहा, "भवानी के होम की छत?"
मैंने टोकन जेब से निकाला। वो अब भी ठंडा था। मैंने उसे हथेली पर रखा।
"अगर छत होम की है," मैंने कहा, "तो माँ वहीं है। और अमर भी।"
राजेंद्र ने कहा, "भवानी के होम की छत पर जाने का रास्ता सिर्फ़ एक है — तीसरी मंज़िल का कमरा, जो बाहर से बंद रहता है। पिछले हफ़्ते तुमने वहीं से छोटू को निकाला था।"
"तो रास्ता पता है," मैंने कहा।
सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा। "मन्नू, सुनो। अगर वो तुम्हें वहाँ पकड़ लें, तो कल की सुनवाई में कोई गवाह नहीं होगा। न तुम, न अमर। भवानी का केस ख़ुद-ब-ख़ुद मज़बूत हो जाएगा।"
"तो मैं नहीं जाऊँ?"
"मैंने ये नहीं कहा।" उसने मेरी आँखों में देखा। "मैंने कहा — सोच-समझकर जाओ। अंदर जाने का रास्ता मैं बताऊँगी, पर वहाँ से निकलने का रास्ता तुम्हें ख़ुद ढूँढना होगा।"
राजेंद्र ने कहा, "मैं साथ चलूँगा।"
"नहीं," सुमन ने कहा। "तुम बाहर रहो। अगर अंदर कुछ गड़बड़ हो, तो तुम्हें पुलिस लेकर आना होगा।"
राजेंद्र ने कुछ कहना चाहा, पर रुक गया। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। "ठीक है। पर एक बात — तुम टोकन के बारे में किसी को नहीं बताते, ये मुझे पता है। पर आज रात अगर टोकन कुछ कहे, तो मुझे बताओ। चाहे वो कुछ भी हो।"
मैंने सिर हिलाया।
हम अस्पताल के बाहर निकले। रात की हवा ठंडी थी और सड़क सूनी। राजेंद्र ने जेब से एक पीली पर्ची निकाली — वही जो मीरा ने दी थी।
"ये किशोरी लाल का नाम है," उसने कहा। "मैंने सुना है — किशोरी लाल भवानी के बाप का आदमी था। भवानी के बाप के ज़माने में वो हवेली का मुंशी था। फिर भवानी ने उसे अपना काम सौंपा। पर किशोरी लाल कभी भवानी के सामने नहीं आया — वो हमेशा पीछे रहा।"
"तो वो भवानी से भी पुराना है?"
"पुराना नहीं।" राजेंद्र ने पर्ची मोड़ी। "वो भवानी के बाप का आदमी था, यानी भवानी से बड़ा। और जब भवानी का बाप मरा, तो किशोरी लाल ने भवानी को संभाला — पर हमेशा पीछे से।"
"जैसे कोई साया।"
"हाँ।" राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। "और साया कभी सामने नहीं आता। वो हमेशा पीछे रहता है — तुम्हारे पीछे भी।"
मैंने पीछे देखा। सड़क सूनी थी।
तभी मेरी जेब में टोकन ठंडा हुआ — इतना ठंडा कि जेब के कपड़े से भी महसूस हुआ। मैंने उसे निकाला। वो चुप था, पर मैंने महसूस किया कि वो कुछ कहना चाहता है।
फिर एक शब्द उभरा — "कुआँ।"
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
"टोकन कह रहा है — कुआँ।"
राजेंद्र रुक गया। "हवेली का कुआँ?"
"नहीं।" मैंने टोकन जेब में रखा। "हवेली का कुआँ तो अदालत के कब्ज़े में है। ये कोई और कुआँ है।"
राजेंड्र ने सोचा। "भवानी के होम के पीछे एक पुराना कुआँ है — सूखा। बीस साल से बंद। वहाँ कोई नहीं जाता।"
"तो वहीं है," मैंने कहा। "माँ वहाँ है।"
राजेंद्र ने मेरा हाथ पकड़ा। "मन्नू, सुनो। अगर माँ वहाँ है और किशोरी लाल भी, तो ये जाल हो सकता है।"
"हो सकता है," मैंने कहा। "पर मैं जाऊँगा।"
"मैं जानता हूँ।" उसने हाथ छोड़ा। "इसीलिए मैंने कहा था — मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा। चलो, पहले अस्पताल का पिछला फाटक। वहाँ से रास्ता शुरू होता है।"
हम अस्पताल के पीछे की तरफ़ बढ़े। रास्ते में सुमन की बातें दिमाग़ में घूम रही थीं — दो बजे चौकीदार बदलता है, तीन मिनट का वक़्त, रसोई के पीछे का रास्ता।
पर मेरा दिमाग़ कुआँ पर अटका था। भवानी के होम के पीछे सूखा कुआँ। बीस साल से बंद। और माँ वहाँ।
मैंने राजेंद्र से पूछा, "तुम्हें उस कुएँ के बारे में कुछ पता है?"
"बस इतना कि वो बंद है। भवानी ने उसे बंद करवाया था — कहते हैं कि उसके बाप के ज़माने में एक आदमी उसमें गिरकर मरा था।"
"कौन?"
"पता नहीं।" राजेंद्र ने कंधे उठाए। "कोई कहता है कि वो भवानी का आदमी था, कोई कहता है कि कोई और। पर एक बात सब कहते हैं — उस कुएँ में कुछ है जो भवानी नहीं चाहता कि कोई ढूँढे।"
हम अस्पताल के पीछे पहुँचे। फाटक बंद था, पर बगल की दीवार कुछ जगह से टूटी थी। राजेंद्र ने मुझे रास्ता दिखाया — दीवार के पीछे एक खाली प्लॉट था, जिसके आगे भवानी के होम की पिछली दीवार शुरू होती थी।
"वहाँ से," राजेंद्र ने इशारा किया, "रसोई की खिड़की है। रात दो बजे के बाद वो खुली रहती है, क्योंकि चौकीदार वहाँ बैठकर चाय पीता है।"
मैंने घड़ी देखी। बारह बज रहे थे।
"दो घंटे हैं," मैंने कहा।
"दो घंटे बहुत हैं," राजेंद्र ने कहा। "इस बीच हमें कुछ और पता लगाना होगा।"
तभी मेरा फ़ोन बजा। स्क्रीन पर नाम नहीं था, सिर्फ़ नंबर।
मैंने उठाया।
"मनोहर?"
आवाज़ किसी और की थी — धीमी, रूखी, जैसे किसी बूढ़े की हो। मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"कौन?"
"तुम्हारी माँ ठीक है।" रुका। "फिलहाल।"
"किशोरी लाल?"
दूसरी तरफ़ हल्की हँसी आई। "किशोरी लाल तो मेरा काम है। मैं वो हूँ जो उसे चलाता है।"
"तो तुम कौन हो?"
"मैं वही हूँ जिसे तुम ढूँढ रहे हो।" उसकी आवाज़ में कुछ था — जैसे वो मुझे पहचानता हो। "तुम्हारी माँ ने मुझे बताया कि तुम होशियार हो। और तुम्हारे पास वो चीज़ है जो मेरे पास होनी चाहिए थी।"
"टोकन?"
"टोकन नहीं। हिसाब।" उसने कहा। "तुम्हारे दादा ने जो छिपाया था — वो हिसाब। मुझे वो चाहिए। और बदले में मैं तुम्हारी माँ और अमर दोनों को लौटा दूँगा।"
"कैसे भरोसा करूँ?"
"भरोसा मत करो।" उसकी आवाज़ में वही ठंडक थी। "पर एक बात सुन लो — अगर कल सुबह नौ बजे तक तुमने वो हिसाब मुझे नहीं दिया, तो अदालत में सिर्फ़ भवानी का बयान होगा। तुम्हारा नहीं। और तुम्हारी माँ का नहीं। और अमर का नहीं।"
फ़ोन कट गया।
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सख़्त था।
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