The Token System994 / 1154

The Token System – Chapter 994

7 min read November 6, 2026

"तीन दिन पहले की है," राजेंद्र ने पूरा किया।

"नहीं।" औरत ने सिर हिलाया। "ये कोई तारीख़ नहीं है। ये तारीख़ की जगह लिखा हुआ है — और वो क्या है, ये माँ ही बता सकती हैं।"

"माँ तो गयब है," मैंने कहा।

"मुझे पता है।" औरत ने सिर नीचा किया। "और मैंने तुम्हें इसीलिए बुलाया है। माँ के काग़ज़ों में एक और पर्ची थी — जो उन्होंने आज सुबह ही लिखी थी। उसमें एक अक्षर था और एक नाम। वो नाम भवानी का नहीं था।"

उसने पर्ची मेरी तरफ़ बढ़ाई। सिर्फ़ दो शब्द थे — "किशोरी लाल।"

मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। "किशोरी लाल?"

"भवानी का वो पुराना आदमी," राजेंद्र बोला, "जो सफ़ेद कुर्ता पहनकर अदालत के बाहर घूमता था। जो कहता था — वो भवानी का आदमी नहीं, भवानी का काम है।"

"तो माँ के गायब होने के पीछे किशोरी लाल है?"

"या फिर," औरत ने कहा, "किशोरी लाल ही वो आदमी है जो तुम्हारी माँ को बचा सकता है — अगर तुम उससे सही सवाल पूछो।"

मैंने पर्ची मेरी जेब में रखी। बाहर निकलते वक़्त मैंने औरत से पूछा, "आपका नाम?"

"मीरा।" उसने दरवाज़ा खोला। "और मन्नू — अगर तुम किशोरी लाल के पास जाओ, तो अकेले मत जाना। वो अकेले में बात नहीं करता। वो अपने आदमियों के बीच बात करता है — और उसके आदमी आज रात कहीं और भी हैं, ये मैंने खिड़की से सड़क पर गाड़ियाँ देखकर समझा है।"

"कितनी गाड़ियाँ?"

"तीन।" उसने लालटेन नीची की। "और वो तीनों हवेली की गली की तरफ़ नहीं गईं। वो मस्जिद के पीछे वाले मोड़ पर रुकीं — जहाँ पुराना कबाड़ा है।"

मैं और राजेंद्र बाहर निकले। मैंने पीछे मुड़कर देखा — नीला दरवाज़ा बंद हो रहा था, और उसकी खिड़की की बत्ती बुझ गई।

पुराने कबाड़े का मोड़ मस्जिद से दो गलियाँ दूर था। रात की हवा में मिट्टी की गंध थी, और एक कोने से जला हुआ काग़ज़ महक रहा था। राजेंद्र ने मेरा हाथ पकड़ा और इशारा किया — दूर, कबाड़े के बंद गेट के पास, एक व्हीलचेयर खड़ी थी।

मैं दौड़ा। व्हीलचेयर वीरान थी। पहिए हल्के से घूम रहे थे, जैसे किसी ने अभी छोड़ी हो। और उसके पास की दीवार पर — मैंने आँख सिकोड़कर देखा — खून की एक पतली लकीर थी, जो नीचे से ऊपर की तरफ़ खिंची थी।

जैसे किसी ने दीवार का सहारा लिया हो, और उठकर भागा हो।

अमर सिंह वहाँ नहीं था।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन अब भी ठंडा था — बिलकुल चुप। और मैंने उसे हिलाया।

तभी उस पर एक शब्द उभरा, जो किसी और ने नहीं, मैंने ख़ुद पढ़ा — "छत।"

॥

खून की लकीर दीवार पर सूख चुकी थी, पर उसका रंग अभी भी गीला लग रहा था। मैंने उँगली लगाई — सूखा था, पर ताज़ा। यानी ये पंद्रह मिनट से ज़्यादा पुराना नहीं।

व्हीलचेयर का एक पहिया अभी भी हल्का-सा घूम रहा था। मैंने चारों तरफ़ देखा। कबाड़े का बंद गेट, पीछे टूटी दीवार, और दाईं तरफ़ मस्जिद की गली का मोड़। मोड़ पर एक सफ़ेद कार खड़ी थी, हैडलाइट बंद, पर इंजन की गुनगुनाहट सुनाई दे रही थी।

मैं दौड़ा। दस कदम भी नहीं गया था कि कार की लाइटें जलीं और वो चल पड़ी। मैंने पीछे का नंबर पढ़ने की कोशिश की — धूल में ढका था। कार बाईं तरफ़ मुड़ी और अंधेरे में घुल गई।

मैंने मोबाइल निकाला। हाथ काँप रहे थे।

"सक्सेना जी," मैंने कहा, "अमर यहाँ नहीं है। व्हीलचेयर खाली पड़ी है। दीवार पर खून की लकीर है। और एक सफ़ेद कार अभी-अभी यहाँ से गई है।"

दूसरी तरफ़ एक सेकंड का सन्नाटा रहा। फिर उनकी आवाज़ आई, ठंडी और साफ़, "मन्नू, तुम वहीं रुको। मैं राजेंद्र को भेज रही हूँ। और सुनो — अमर ने जो पीली पर्ची दी थी, वो जेब में है?"

मैंने जेब टटोली। पर्ची वहाँ थी, मुड़ी हुई, कोना-चिह्न के साथ।

"है।"

"उसे मत खोना। वो अब काग़ज़ नहीं, सबूत है। और एक बात — जो भी कार गई है, वो तुम्हारे पीछे नहीं, तुम्हारे सामने से गई है। इसका मतलब उन्हें पता है कि तुम यहाँ आओगे।"

"किशोरी लाल को पता है।"

"हो सकता है। या फिर कोई और भी है जो किशोरी लाल के नाम पर चल रहा है।" उन्होंने सांस ली। "रुको वहीं। राजेंद्र पाँच मिनट में पहुँचेगा।"

फ़ोन कटा। मैंने दीवार की खून की लकीर फिर देखी। नीचे से ऊपर खिंची थी — जैसे कोई दीवार का सहारा लेकर खड़ा हुआ हो। ज़मीन पर पैरों के निशान थे — दो जोड़ी। एक जोड़ी भारी, मर्दाना। दूसरी हल्की, जैसे किसी ने घसीटते हुए चला हो।

अमर को घसीटकर ले जाया गया था।

राजेंद्र दस मिनट में आ गया। उसके साथ एक सिपाही था जिसका नाम रामदीन था — राजेंद्र का भेजा हुआ, जो कल रात मेरे दरवाज़े पर पहरा देता रहा था।

"कुछ दिखा?" राजेंद्र ने पूछा।

"सफ़ेद कार। नंबर नहीं पढ़ा। खून की लकीर। और ये पैरों के निशान।" मैंने ज़मीन की तरफ़ इशारा किया। "अमर घायल है। अगर उसे होम ले गए हैं, तो उसे डॉक्टर चाहिए, और भवानी के होम में डॉक्टर है —" मैं रुका। "या फिर वो उसे कहीं और ले गए हैं जहाँ कोई डॉक्टर नहीं।"

राजेंद्र ने चारों तरफ़ देखा। "पहले थाने चलो। इंस्पेक्टर को सब बताना होगा — लिखित में। अगर अमर कल अदालत में गवाह है, तो उसका गायब होना केस का हिस्सा बन जाएगा।"

थाना रात में भी खुला था। इंस्पेक्टर — जिसका नाम बिस्मिल था — बैठा था जींस और सफ़ेद कमीज़ में, आँखों में नींद थी, पर उसने हमें बैठने का इशारा किया।

मैंने सब बताया — कबाड़े का मोड़, खून की लकीर, सफ़ेद कार, अमर की हालत, किशोरी लाल का नाम।

बिस्मिल ने सुना, फिर काग़ज़ पर कुछ लिखा। "तुम्हारा कहना है कि अमर सिंह को उठाकर ले जाया गया। और तुम्हें शक है कि इसके पीछे भवानी सिंह का आदमी है।"

"मैं ये नहीं कह रहा कि भवानी ने करवाया," मैंने कहा, "मैं ये कह रहा हूँ कि भवानी का आदमी किशोरी लाल है जो ख़ुद को भवानी का 'काम' कहता है। और उसका नाम माँ की लिखी पर्ची में है।"

मैंने पर्ची निकाली। बिस्मिल ने पढ़ी, फिर मुझे लौटा दी। "ये पक्का सबूत नहीं है। ये सिर्फ़ एक नाम है।"

"मेरी माँ गायब है," मैंने कहा। "मेरा भाई — मेरा चचेरा भाई — घायल है और गायब है। और आप कह रहे हैं कि ये पक्का सबूत नहीं है?"

बिस्मिल ने कलम रखी। "मैंने ये नहीं कहा कि हम कुछ नहीं करेंगे। मैंने कहा कि ये काग़ज़ अदालत में कमज़ोर है। पर मैं तुम्हें एक बात बता दूँ — गाड़ी की तलाश आज रात से शुरू होगी। शहर के बाहर जाने वाले सभी रास्तों पर नाकेबंदी होगी। और अगर अमर सिंह किसी अस्पताल में लाया गया, तो हमें ख़बर मिलेगी।"

"और अगर उसे अस्पताल नहीं लाया गया?" राजेंद्र ने पूछा।

बिस्मिल ने उसकी तरफ़ देखा। "तो हमें तुम्हारी ज़रूरत होगी। तुम भवानी के लोगों के बीच घूमते हो, तुम्हें रास्ते पता हैं। पर एक बात — भवानी सिंह का आदमी कुछ भी कर सकता है। अपना ध्यान रखो।"

बाहर निकलते वक़्त राजेंद्र ने मेरा कंधा पकड़ा। "मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा।"

"मुझे पहले अस्पताल जाना है," मैंने कहा। "हो सकता है उसे वहीं लाया गया हो। सुमन वहाँ है, उसे पता होगा।"

अस्पताल की इमरजेंसी के बाहर सुमन खड़ी थी — सफ़ेद कोट, हाथ में रजिस्टर, चेहरे पर थकान। उसने हमें देखकर रजिस्टर बंद किया।

"अमर यहाँ नहीं है," उसने कहा, बिना पूछे। "पर उसके बारे में पूछने के लिए भवानी के आदमी आए थे — सफ़ेद कुर्ते वाला, वो जो पहले भी आता था। उसने कहा कि अमर के लिए दवा चाहिए, जो उसके होम में है, और उसे वहाँ ले जाना है।"

"तुमने क्या कहा?"

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