The Token System – Chapter 993
"यहाँ सिर्फ़ मैं हूँ," मैंने कहा, "और मैं तो रोज़ बाहर ही रहता हूँ। तुम लोगों को इतनी रात किसने भेजा — बताओ ना, मैं भी जान लूँ।"
मोटे ने हाथ बढ़ाकर मेरा गला पकड़ने की कोशिश की। उसका हाथ मेरी कॉलर तक पहुँचा ही था कि पीछे से सक्सेना की आवाज़ आई।
"अपना हाथ हटाओ।" वो सीढ़ी से नीचे उतरी, हाथ में काग़ज़ का बंडल। "ये मेरा मुवक्किल है, और ये मेरा दफ़्तार है — मतलब ये घर भी। तुम्हारी हरकत का नोटिस अभी थाने जाएगा, और साथ में तुम्हारी शक्ल का हुलिया। तुम दोनों यहाँ से निकलो।"
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। पतले ने आवाज़ नीची की।
"मैडम, हमारा कोई झगड़ा नहीं है। हमें सिर्फ़ अमर सिंह चाहिए। वो बीमार है, उसे अस्पताल वापस ले जाना है।"
सक्सेना आगे आई। "अमर सिंह यहाँ नहीं है। और अगर तुम्हें उसकी सच में चिंता है, तो जाकर उसके बाप से पूछो — उसने अपने बेटे का साँस की ट्यूब हटाने का हुक्म क्यों दिया?"
पतले का चेहरा बदल गया। उसने मोटे की तरफ़ देखा, फिर ज़मीन की तरफ़।
"ये हमें नहीं पता," मोटा बोला, पर आवाज़ में पहले वाली सख़्ती नहीं थी।
"तो जाकर पता करो।" सक्सेना ने हाथ का काग़ज़ ऊपर किया। "और याद रखना — कल सुबह नौ बजे अदालत है। तुम जिसके लिए काम करते हो, वो ख़ुद आने का वादा कर चुका है। तो जो वो कहे, वही करना। अपनी अक्ल मत लगाना।"
दोनों पीछे हटे। जाते-जाते मोटे ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "तू बहुत आगे बढ़ गया है मन्नू। भवानी सिंह तुझे अकेला नहीं छोड़ेगा।"
मैं हँसा। सच में हँसी आ गई।
"मैं तो पहले से ही अकेला हूँ भाई। तेरे भवानी के पास भीड़ बहुत है, पर उस भीड़ में एक भी आदमी अपना नाम नहीं बता सकता। मेरे पास भीड़ नहीं, पर जो है, वो नाम लेकर सामने आता है।"
दोनों गली के मोड़ पर मुड़े और अंधेरे में ग़ायब हो गए।
सक्सेना ने दरवाज़ा बंद किया और पलटकर मेरी तरफ़ देखा।
"अब जल्दी करो। अमर का बयान लिखो।" उसने बैग से काग़ज़ निकाला। "मैं तुम्हें बेटी का पता देती हूँ। तुम ख़ुद उसे लेकर जाओ।"
"आप क्यों नहीं जातीं?"
"क्योंकि भवानी का आदमी मेरे पीछे लग जाएगा। मैं निकली कि वो मेरा पीछा करेगा, और तुम्हें पीछे से जाने का मौक़ा नहीं मिलेगा।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "और एक बात — अमर जब यहाँ से निकले, उसकी निगाह में कुछ था। उसे अकेला मत छोड़ना।"
मैंने काग़ज़ उठाया और अमर की तरफ़ बढ़ा, जो अभी भी व्हीलचेयर पर गेट के पास बैठा था।
"तुम्हारा बयान।" मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ रखा। "जो तुमने रात में दफ़्तार में बताया — तीनों काग़ज़, ट्यूब हटाने का हुक्म, हस्ताक्षर का ढंग। सब कुछ, शब्द-दर-शब्द। मैं लिखता हूँ, तुम देखते जाओ। और जहाँ मैं कुछ ग़लत लिखूँ, वहीं टोकते रहना।"
अमर के हाथ काँप रहे थे। उसने चाय का कप साइड में रखा।
"मन्नू।" उसकी आवाज़ बैठी हुई थी। "तुम्हारी माँ के लिए — मुझे माफ़ कर देना। मैंने उसे बचाने की कोशिश नहीं की। मैं दरवाज़े पर बैठा था, उसके अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई।"
"तुम बीमार हो। अभी ट्यूब हटी है। कमज़ोर शरीर से हिम्मत की बात मत करो। जब हिम्मत चाहिए होगी, तब मैं ख़ुद तुम्हें बुला लूँगा — अदालत में, गवाही के लिए।"
वो मुस्कुराया। पहली बार उसकी आँखों में थकान के साथ कुछ और दिखा — जैसे पहली बार वो किसी के भरोसे पर टिक रहा हो।
बयान लिखने में करीब आधा घंटा लगा। अमर बीच-बीच में रुकता, याद करता, फिर बोलता। जब हमने आख़िरी लाइन लिखी, सक्सेना ने काग़ज़ उठाया और पढ़ा।
"अच्छा है।" उसने काग़ज़ अपने बैग में रखा। "अब सुनो। मेरी बेटी रहती है पुराने शहर में, मस्जिद के पीछे तीसरी गली में। घर का नाम नहीं, पहचान नीला दरवाज़ा। वो तुम्हें एक चीज़ देगी — मेरे पास जो कुछ भी है, उसका एक हिस्सा। उसे अदालत में दिखाना होगा।"
"अभी रात में?" राजेंद्र ने पूछा।
"अभी।" सक्सेना ने घड़ी देखी। "क्योंकि सुबह नौ बजे सब कुछ हो जाएगा, और भवानी के आदमी इस बीच जो चाहें कर सकते हैं। जो कुछ बचाना है, अभी बचाओ।"
मैंने कोट पहना। अमर ने मेरा हाथ पकड़ा।
"मन्नू — तुम्हारी माँ को जिसने उठाया है, वो उसे किसी ऐसी जगह ले गया है जहाँ से तुम्हें लौटना पड़े। समझ रहे हो ना? शर्त रखी जाएगी।"
"मुझे पता है।" मैंने उसका हाथ हटाया। "और मैं शर्त मानूँगा भी, अगर माँ की जान बचानी होगी।"
सक्सेना ने मुझे रोका। "मन्नू, मैं एक बात साफ़ कह दूँ — शर्त मानना और हार मानना, दोनों अलग हैं। तुम शर्त मानोगे, तो भी अदालत जाओगे। दोनों एक साथ हो सकते हैं।"
मैंने सिर हिलाया और पीछे के दरवाज़े से बाहर निकला। राजेंद्र साथ था। घर के पीछे की गली लगभग खाली थी, बस एक बंद पड़ी साइकिल और दूर से किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़।
मैंने गली पार की। पुराने शहर की तरफ़ जाने वाला रास्ता सीधा मस्जिद की तरफ़ जाता था। राजेंद्र ने मेरी जेब की तरफ़ देखा।
"टोकन?"
"ठंडा है।"
"तो मतलब अभी कुछ बड़ा होने वाला नहीं।"
"या फिर ये शांति इसलिए है कि अभी हम जिस काम पर जा रहे हैं, वो टोकन का नहीं, हमारा अपना है।"
राजेंद्र हँसा। "यही बात है जो मुझे तुझमें पसंद है। तू टोकन से पहले ख़ुद को मानता है।"
हम मस्जिद की गली में घुसे। तीसरी गली का मोड़ आया, और वहाँ नीला दरवाज़ा था — बाकी दरवाज़ों से थोड़ा हटकर, रंग उतरा हुआ, ऊपर एक छोटी खिड़की।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से आवाज़ नहीं आई। दूसरी बार खटखटाया, ज़ोर से।
दरवाज़ा धीरे से खुला। सामने एक औरत खड़ी थी, चालीस के आसपास, सिर पर दुपट्टा, हाथ में लालटेन। उसने मुझे देखा, फिर राजेंद्र को, फिर मेरे हाथ में पकड़ा काग़ज़ देखा — और दरवाज़ा और खोल दिया।
"तुम मन्नू हो," उसने कहा, आवाज़ में सवाल नहीं, पहचान। "माँ ने बताया था तुम आओगे। पर उसने ये नहीं कहा था कि तुम इतनी रात आओगे।"
"आपकी माँ —"
"सक्सेना मेरी माँ हैं।" उसने लालटेन ऊपर उठाई। "अंदर आओ। बैठो। और मेरी बात ध्यान से सुनो, क्योंकि मैं एक ही बार बोलूँगी।"
अंदर का कमरा छोटा था, पर साफ़। दीवार पर तीन तस्वीरें टँगी थीं, और एक कोने में लोहे की छोटी तिजोरी रखी थी। औरत ने लालटेन मेज़ पर रखी और तिजोरी खोली।
"ये सब माँ ने मेरे पास रखा था — बीस साल से।" उसने काग़ज़ों का बंडल निकाला। "उन्होंने कभी नहीं बताया किसके हैं। बस कहा था — जिस दिन मन्नू आए, उसे दे देना।"
मैंने बंडल खोला। ऊपर एक पीली पर्ची थी, सक्सेना की लिखाई में — "माँ के हस्ताक्षर के नीचे की तारीख़।" और नीचे, एक पुरानी रसीद थी जिस पर एक तारीख़ और एक मुहर थी, और तीन नाम — जिनमें से एक नाम आधा मिटा हुआ था।
राजेंद्र ने झुककर देखा। "ये तो —"
"ये वो काग़ज़ है," औरत बोली, "जिस पर तुम्हारी माँ ने हस्ताक्षर किए थे। पर ये नक़ल नहीं है —" उसने मेरी तरफ़ देखा, "ये असली है। असली का असली।"
मेरे हाथ रुक गए। "असली कहाँ है?"
"माँ ने बताया था — असली वो काग़ज़ है जो भवानी के पास है, और उसमें एक छिपी लाइन है। पर ये —" उसने रसीद की तरफ़ इशारा किया, "ये उस लाइन की कॉपी है जो असली में है। माँ ने बीस साल पहले ये कॉपी अपने पास रखी थी, ताकि अगर असली ग़ायब हो जाए, तो कोई सबूत तो बचे।"
मैंने रसीद ध्यान से पढ़ी। उस पर लिखा था — "यह सौदा तभी मान्य होगा जब मेरा बेटा ख़ुद आकर हिसाब चुकाए।" और उसके नीचे माँ का नाम, और उसके नीचे — तारीख़।
"ये तारीख़," मैंने कहा, "ये तो —"
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