The Token System – Chapter 992
"सोदा कभी था ही नहीं," मैंने कहा, और उठ गया। "कल अदालत में जो बोलेगा, वो अमर ख़ुद बोलेगा। आप उसकी आवाज़ नहीं ख़रीद सकते।"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा — लंबी, थकी नज़र से। "तुम अपने पापा जैसे हो। वो भी यहीं खड़ा था, बीस साल पहले। और मैंने उसे भी यही कहा था — अपनी चुप्पी के बदले हवेली ले लो।"
"और उसने क्या कहा?"
"उसने कहा — मेरी चुप्पी मेरी है, तुम्हारी नहीं।" भवानी ने लाठी टेक दी। "फिर वो गायब हो गया। और मैंने तुम्हारी माँ को धमकाया।"
मैंने अपनी जेब से टोकन निकाला। वो अब गरम था, बहुत गरम — इतना कि मेरी हथेली जलने लगी। उस पर एक शब्द उभरा, साफ़ मोटे अक्षरों में — "देख।"
मैंने टोकन उठाया और भवानी की तरफ़ बढ़ाया। "आप जानते हैं ये क्या है?"
भवानी ने देखा। उसका चेहरा बदला। "ये —"
"ये वो हिसाब है," मैंने कहा, "जो आपने पाँच पीढ़ियों में दूसरों से करवाया। और ये —" मैंने टोकन उसके सामने रखा, "— ये आज रात गवाही दे रहा है। आपके ख़िलाफ़।"
टोकन पत्थर पर रखते ही उस पर लकीरें उभरने लगीं — एक, दो, तीन — बहुत सी। भवानी पीछे हटा, जैसे उसने आग देखी हो।
"ये नहीं," उसने धीमे से कहा। "ये नहीं हो सकता।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि —" उसकी आवाज़ अटकी, "— क्योंकि ये टोकन मेरे पास है। बीस साल से।"
"अब नहीं है।"
पिछली गली से राजेंद्र और सक्सेना आ गए थे। सक्सेना ने पत्थर पर पड़े काग़ज़ को उठाया — वो काग़ज़ जो भवानी ने कुछ पल पहले रखा था — और पढ़कर मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू। ये बसंत सिंह के हिस्से की ज़ब्ती का काग़ज़ है। असली है।" उसने काग़ज़ ऊपर उठाया। "और इस पर भवानी के बाप के हस्ताक्षर हैं।"
भवानी ने अपनी लाठी उठाई। राजेंद्र आगे बढ़ा, पर भवानी ने लाठी नहीं चलाई। उसने बस लाठी पत्थर पर टेक दी और वहीं बैठ गया — वैसे ही जैसे कोई बोझ उतार दे।
"कल नौ बजे," उसने कहा, बिना किसी की तरफ़ देखे। "अदालत में। मैं ख़ुद आऊँगा।"
"आप हार मान रहे हैं?" मैंने पूछा।
भवानी ने सिर उठाया। "मैं हार नहीं मान रहा। मैं हिसाब चुका रहा हूँ।" उसने एक गहरी साँस ली। "बीस साल से मैंने इस हवेली को बचाने के लिए हर चीज़ बेची — अपना नाम, अपने बेटे का नाम, गेंदा की जान। आज पता चला कि हवेली मेरी थी ही नहीं।"
वो उठा और पीछे के कमरे की तरफ़ चला गया। दरवाज़े पर रुककर बोला, बिना मुड़े — "अमर से कह देना, उसके पास जो चीज़ है, वो उसकी माँ ने छोड़ी थी। मेरे पास नहीं। और मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी। एक बार। पर —" उसकी आवाज़ जैसे फँस गई, "— एक बार ही।"
वो अंदर चला गया। दरवाज़ा बंद हुआ।
सक्सेना ने काग़ज़ बैग में रखा और मेरी तरफ़ देखा। "ये काग़ज़ कल अदालत में पेश होगा। और ये —" उसने तस्वीर उठाई, "ये भी।"
राजेंद्र ने आँगन में चारों तरफ़ देखा। "टोकन कहाँ है?"
मैंने पत्थर की तरफ़ देखा। टोकन वहाँ नहीं था।
"कहाँ गया?" मैंने जेब टटोली। नहीं।
सक्सेना ने कमरे की तरफ़ देखा। "भवानी —"
"नहीं।" मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। टोकन मेरी जेब में गरमी की तरह लौट आया। मैंने हाथ डाला। वो वहीं था — ठंडा, पर उस पर एक नई लकीर उभरी थी। और लकीर के नीचे शब्द — "आधा।"
"आधा क्या?" राजेंद्र ने पूछा।
सक्सेना ने मेरी तरफ़ देखा। "आधा हिसाब खुल गया। आधा बाकी।" उसने बैग उठाया। "चलो, रात यहाँ नहीं रुकना। सुबह अदालत है।"
हम बाहर निकले। गली में गाड़ी खड़ी थी। मैंने पीछे मुड़कर हवेली देखी। पिछवाड़े का दरवाज़ा बंद था, पर खिड़की की बत्ती जल रही थी।
सक्सेना ने गाड़ी शुरू की। "मन्नू।"
"हाँ।"
"आज रात तुमने जो सुना, वो कल अदालत में बोलोगे?"
"हाँ।"
"और अमर?"
मैंने खिड़की से बाहर देखा। शहर की बत्तियाँ धुँधली हो रही थीं, सुबह नज़दीक थी।
"अमर से मैं ख़ुद बोलूँगा," मैंने कहा। "वो मेरा भाई है। भाई से भाई की बात हो जाएगी।"
गाड़ी मुड़ी और हवेली की गली पीछे छूट गई। मेरी जेब में टोकन ठंडा था, चुप था — पर उस चुप्पी में वो सब कुछ था जो कल सुबह नौ बजे अदालत में बोलना था। और मेरे सामने सक्सेना का बैग रखा था, जिसमें सबसे पुराना काग़ज़, सबसे बड़ी तस्वीर, और सबसे भारी सच था।
तभी सक्सेना का फ़ोन बजा। उसने देखा, और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। "अमर का नंबर है।"
मैंने फ़ोन कान पर रखा।
"मन्नू?" अमर की आवाज़ घबराई हुई थी। "मैं तुम्हारी माँ के घर के बाहर हूँ। दरवाज़ा खुला है। और माँ — माँ कहीं नहीं है।"
॥
फ़ोन कान पर था और अमर की आवाज़ काँप रही थी। मैंने सक्सेना को इशारा किया कि गाड़ी रोके। वो घबराई हुई मेरी तरफ़ बढ़ी।
"अमर, सुन मेरी बात।" मैंने आवाज़ नीची रखी। "दरवाज़ा छोड़कर अंदर मत जाना। पड़ोस में किसी को आवाज़ दे। किसी भी हालत में अकेले अंदर मत जाना। हम पंद्रह मिनट में पहुँच रहे हैं।"
"मैं देख रहा हूँ, मन्नू —" अमर की आवाज़ फँसी थी, "चूल्हे पर चाय रखी है, गरम है। माँ कहीं दूर नहीं गई। कोई उसे ले गया।"
फ़ोन कट गया। सक्सेना पहले ही गाड़ी पलट चुकी थी।
"कहाँ?" उसने पूछा।
"सीधे घर। रामगंज।" राजेंद्र पीछे से बोला। "पर सुनो — भवानी का आदमी इसी वक़्त हमारे पीछे लगा होगा। वो चाहता था हम हवेली से निकलें। शायद इसीलिए उसने सच इतनी आसानी से कबूल किया।"
गाड़ी सड़क पर भाग रही थी, पर मैं बैठा नहीं रह सका। घर के मोड़ पर हमने गाड़ी छोड़ी और पैदल गली में घुसे। घर का दरवाज़ा खुला था, अंदर बत्ती जल रही थी, और अमर व्हीलचेयर पर दरवाज़े के बाहर ही बैठा था, हाथ में चाय का कप लिए।
"मैंने सोचा," उसने झुककर कहा, "किसी की हिम्मत नहीं होगी बाहर रहने की, अगर मैं दरवाज़े पर बैठा दिखूँ।"
मैं अंदर गया। चूल्हे की आग धीमी थी, चाय रखी हुई तप रही थी। माँ की चप्पलें पलंग के पास पड़ी थीं — एक जगह, दूसरी दूर। उसका दुपट्टा तवे के पास ज़मीन पर था।
"जब मैं पहुँचा तो दरवाज़ा ऐसे ही खुला था," अमर बोला। "बत्ती जल रही थी। चाय बन रही थी। पर —" उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा, "एक बात और है। तुम्हारे घर के पीछे वाली कोठरी का ताला खुला था। और वो कोठरी खाली थी।"
"रज्जू?" मैंने पूछा।
"तुमने जिसे रज्जू बताया था — वो नहीं था। कोठरी में कोई नहीं था। फ़र्श पर बस एक बीड़ी का टूटा टुकड़ा पड़ा था।"
सक्सेना ने घर में चारों तरफ़ नज़र घुमाई और फिर मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू, माँ अकेली नहीं गई है। उसे उठाया गया है। पर एक बात समझ लो — जो उठाकर ले जाता है, वो भवानी नहीं हो सकता। भवानी आज रात टूट चुका है। उसने ख़ुद कबूल किया कि हवेली उसकी नहीं। ऐसा आदमी आगे बढ़कर कोई नया काम नहीं करता।"
"तो कौन?" राजेंद्र ने पूछा।
"जो ये चाहता है कि कल की अदालत न हो।"
हम सब चुप हो गए। तभी गली के मोड़ से आवाज़ आई — जूतों की चाप। दो आदमी सफ़ेद कुर्ते में आ रहे थे, दोनों हाथ जेब में, दोनों के कंधे सीधे।
"अंदर जाओ," राजेंद्र ने कहा। "मैं देखता हूँ।"
"नहीं।" मैं आगे बढ़ा। "ये घर मेरा है। मैं ही खड़ा रहूँगा।"
दोनों आदमी गेट पर रुके। एक मोटा था, मुँह पर दाढ़ी का छोटा हिस्सा, दूसरा लंबा और पतला, आँखें छोटी। मोटे ने अंदर झाँका।
"अमर सिंह यहाँ है। बाहर बुलाओ उसे।"
"यहाँ कोई अमर सिंह नहीं रहता," मैंने कहा।
"हमें पता है वो यहाँ आया है। बीमार है, अस्पताल वापस ले जाना है।" पतले ने कदम बढ़ाया। "हम बुरा नहीं चाहते।"
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