The Token System990 / 1154

The Token System – Chapter 990

7 min read November 6, 2026

रात के ग्यारह बज चुके थे और सक्सेना के दफ़्तार की बत्ती अभी भी जल रही थी। मैंने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से कुर्सी घसीटने की आवाज़ आई, फिर दरवाज़ा खुला।

सक्सेना ने पहले मुझे देखा, फिर मेरे पीछे व्हीलचेयर पर बैठे अमर को। उसका हाथ दरवाज़े के हैंडल पर जम गया। उसने एक पल के लिए पीछे मुड़कर गली में देखा — सूनी गली, बुझी बत्तियाँ — और फिर दरवाज़ा भीतर से बंद कर दिया।

"अगर भवानी को पता चला," उसने धीमी आवाज़ में कहा, "तो यह लड़का अस्पताल में वापस नहीं पहुँचेगा।"

"वकील साहिबा," अमर की आवाज़ काँप रही थी, पर शब्द साफ़ थे, "मैं आज रात यहाँ इसलिए आया हूँ कि कल सुबह मेरी साँस की ट्यूब हटा दी जाएगी।"

सक्सेना ने उसकी कलाई पर बँधी पट्टी देखी, फिर मेरी तरफ़ देखा। "इसे यहाँ कौन लाया?"

"यह ख़ुद आया है," मैंने कहा। "और ख़ुद ही अपने बाप के ख़िलाफ़ बोलना चाहता है।"

सक्सेना ने कुर्सी खींचकर बैठने को कहा। "तो बोलो। पर एक-एक बात सोच-समझकर। यहाँ जो बोला जाएगा, वो कल अदालत में दोहराना पड़ेगा।"

अमर ने अपनी जेब से तीन मुड़े हुए काग़ज़ निकाले और मेज़ पर रख दिए। "यह मेरे बाप के होम का असली रजिस्टर है। यह उनकी लिखी चिट्ठी है। और यह — यह बसंत सिंह के हिस्से की ज़ब्ती का काग़ज़ है।"

सक्सेना ने पहला काग़ज़ उठाया। पढ़ती गई, और उसका चेहरा गंभीर होता गया। पन्ने पलटे, उँगली एक लाइन पर रुकी, फिर दूसरे काग़ज़ पर आई।

"यह तो बहुत बड़ा मामला है," उसने कहा। "इस रजिस्टर में पचास से ज़्यादा नाम हैं। हर नाम के आगे एक तारीख़, एक रकम। और यह चिट्ठी —" उसने मेरी तरफ़ देखा, "इसमें भवानी ने लिखा है कि कौशल्या का काग़ज़ जला दिया जाए। लिखा हुआ, अपने हाथ से।"

अमर ने अपना सिर नीचे कर लिया। "इससे भी बड़ी बात यह है कि मेरे बाप ने मुझे अपनी ढाल बनाया।"

"कैसे?" मैंने पूछा।

"मेरी बीमारी के नाम पर उन्होंने अस्पताल से दान लिया। सरकारी योजनाओं का पैसा लिया — मेरे नाम पर, मेरी तस्वीर के साथ। अख़बार में मेरी तस्वीर छपवाकर लोगों से चंदा जुटाया।" अमर ने सक्सेना की तरफ़ देखा। "वकील साहिबा, मेरे इलाज पर जो पैसा ख़र्च हुआ, वो उसी पैसे का दसवाँ हिस्सा भी नहीं है।"

सक्सेना ने कलम उठाई। "यह सब काग़ज़ पर लिखवाना पड़ेगा। और तुम्हें अदालत में ख़ुद खड़ा होना पड़ेगा।"

"मैं खड़ा होऊँगा," अमर ने कहा। "चाहे ट्यूब के साथ ही सही।"

मैंने देखा कि बोलते-बोलते उसकी आवाज़ में एक झिझक आ गई थी, जैसे कोई बात बाकी हो। मैंने पूछा, "कुछ और है?"

अमर ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें भर आईं। "मनोहर, तुमने पूछा था कि टुकड़े किसने दिए। मैंने कहा था मैंने नहीं दिए। सच यह है कि मुझे भी पता नहीं। पर एक बात और है।"

"क्या?"

"मेरे बाप के कमरे में मेरी माँ की तस्वीर है। छोटी, धुँधली, एक चौखटे में। उस तस्वीर को वो कभी किसी को नहीं छूने देते। और जिस दिन मैं होश में आया, वही तस्वीर मेरे तकिये के नीचे थी।"

सक्सेना ने कलम नीचे रख दी। "मतलब कोई है जो भवानी के घर में आता-जाता है।"

"और जो चाहता है कि यह हिसाब खुले," अमर ने कहा। "वरना वो तस्वीर वहाँ क्यों रखता?"

तभी बाहर गली में गाड़ी की तेज़ रोशनी खिड़की के पर्दे पर पड़ी और फिर बुझ गई। सक्सेना एक झटके में उठी और खिड़की के पर्दे की दरार से बाहर झाँका।

"भवानी के दो आदमी हैं," उसने धीमे से कहा। "गाड़ी से उतर रहे हैं।"

उसने तुरंत पीछे के दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया। "अमर, तुम पीछे से जाओ। पीछे की गली से मेरी बेटी के घर — पता मन्नू को दे दूँगी। वहाँ रात रुक जाओ, सुबह मैं ख़ुद गाड़ी भेजूँगी।"

अमर व्हीलचेयर घुमाने लगा, पर रुक गया। "वकील साहिबा, एक बात।"

"क्या?"

"मेरी माँ की तस्वीर मेरे तकिये के नीचे किसी ने रखी थी। मेरे बाप ने नहीं। मैं जानता हूँ, क्योंकि मेरे बाप तस्वीर को हाथ भी नहीं लगाते।" उसने एक गहरी साँस ली। "यानी उनके घर में कोई है जो उनके ख़िलाफ़ काम कर रहा है। और मुझे लगता है — वो मेरे बाप को जानता है। अंदर से।"

सक्सेना ने पीछे का दरवाज़ा खोल दिया। एक तंग गलियारा, फिर छोटा आँगन और पीछे की गली का गेट। उसने अमर को रास्ता दिखाया और पीछे का गेट बंद कर दिया।

फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ी। उसके चेहरे पर वो सख़्ती वापस आ गई थी जो अदालत में होती थी।

"तुम सामने रहो। दरवाज़ा खोलो, कहो मैं सो गई हूँ। जो काग़ज़ देने आए हैं, वो मैं सुबह देखूँगी।"

"और अगर वो न मानें?"

सक्सेना ने अपनी मेज़ की दराज़ खोली और उसमें से एक छोटी लाल डायरी निकाली, जिसमें काग़ज़ भरे थे। उसने उसे अपने बैग में रखा। "तो उन्हें बता देना कि अमर का बयान दर्ज हो चुका है और उसकी कॉपी मेरे साथ नहीं, दो जगह और है। झूठ है, पर उन्हें डराने के लिए काफ़ी है।"

बाहर फिर दस्तक हुई। इस बार पहले से ज़ोर की।

मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। सक्सेना ने मेरा हाथ पकड़ा। "मन्नू। एक बात। अगर ये लोग ज़बरदस्ती करें तो लड़ना नहीं। लड़ाई से काग़ज़ नहीं जीतता, हिसाब जीतता है। तुम देर करो, बहस करो, पर हाथ मत उठाना।"

मैंने सिर हिलाया और दरवाज़ा खोला।

पहला आदमी मोटा था, दूसरा साथ में दुबला, दोनों सफ़ेद कुर्ते में। मोटे के हाथ में भवानी का ठप्पा लगा एक बड़ा लिफ़ाफ़ा था।

"वकील साहिबा कहाँ हैं?" मोटे ने पूछा, गर्दन अंदर घुसाकर।

"सो गई हैं।" मैंने दरवाज़े में खड़े होकर कहा। "क्या काम है?"

"लिफ़ाफ़ा है। ठाकुर साहब का। ख़ुद देना था, पर —" उसने मेरे पीछे झाँका, "लगता है कोई और भी है अंदर।"

"कोई नहीं है।" मैंने दरवाज़ा थोड़ा और बंद किया।

दुबले ने मोटे के कान में कुछ कहा। मोटे का भाव बदला।

"लिफ़ाफ़ा नहीं," उसने अचानक कहा, आवाज़ कड़ी हो गई। "हमें वो लड़का चाहिए। भवानी सिंह का हुक्म है — अंदर जो भी है, बाहर आए।"

मेरा दिल धड़का, पर मैंने अपनी आवाज़ सीधी रखी। "इस दफ़्तार में सिर्फ़ वकील साहिबा और मैं हैं। तुम्हें किसी लड़के का पता है तो जाकर ढूँढो।"

"वो अस्पताल में नहीं है," दुबले ने कहा, पहली बार बोलकर। "उसका कमरा खाली मिला। और उसके कमरे से बाहर जो पगडंडी है, वो सीधे इसी गली में आती है।"

अंदर से सक्सेना की आवाज़ आई, जान-बूझकर सोई जैसी, भारी — "मन्नू, कौन है? सुबह आने को बोल दो।"

"सुन लिया?" मैंने कहा। "सुबह आना।"

मैंने दरवाज़ा बंद करना शुरू किया, पर मोटे ने अपना जूता दरवाज़े और दीवार के बीच फँसा दिया।

"लिफ़ाफ़ा तो ले जाओ," उसने कहा, और इस बार आवाज़ में वो धमक नहीं थी, जो पहले थी। एक अजीब-सी जल्दबाज़ी थी। उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ा दिया, मेरा हाथ पकड़कर उसमें थमा दिया, और जूता खींच लिया।

"ठाकुर साहब ने कहा है," वो पीछे हटते हुए बोला, "ये लिफ़ाफ़ा खोलने के बाद तुम ख़ुद अंदर आना चाहोगे।"

दोनों उतर गए। गाड़ी की बत्ती फिर जली और गली से निकल गई।

मैंने दरवाज़ा बंद किया और लिफ़ाफ़ा हाथ में लेकर खड़ा रह गया। सक्सेना बाहर आई, चेहरे पर चादर का कोना बेतरतीब पड़ा था।

"क्या हुआ?"

"ये लिफ़ाफ़ा दे गए। और कह गए — खोलने के बाद मैं ख़ुद जाना चाहूँगा।"

सक्सेना ने लिफ़ाफ़ा देखा। भवानी का ठप्पा साफ़ था। "खोलो।"

मैंने लिफ़ाफ़ा फाड़ा। अंदर एक काग़ज़ था, और उसके साथ एक तस्वीर।

तस्वीर में तीन आदमी थे — एक बूढ़ा, एक जवान, और बीच में — बीच में भवानी था। पर तस्वीर पुरानी थी, बीस साल से भी ज़्यादा पुरानी। भवानी उसमें जवान था, दाढ़ी काली, आँखों में वो सख़्ती नहीं जो आज थी।

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