The Token System – Chapter 989
सक्सेना उठ खड़ी हुईं। "तुम अमर हो? भवानी का बेटा?"
"हाँ।" अमर ने कुर्सी आगे सरकाई। "पर आज से मैं किसी का बेटा नहीं रहूँगा।"
"बेटा," सक्सेना ने कहा, "तुम अस्पताल में होने चाहिए। तुम्हारी हालत —"
"मेरी हालत का हिसाब मैं ख़ुद रखता हूँ," अमर ने कहा। "आज चार बजे अदालत में मैं अपने बाप के ख़िलाफ़ बयान दूँगा।" उसने थैला मेज़ पर रखा। "इसमें तीन काग़ज़ हैं। पहला — मेरे बाप के होम का असली रजिस्टर, जिसमें उन बच्चों के नाम हैं जिन्हें बाहर भेजा गया। दूसरा — मेरे बाप के हाथ की लिखाई में एक चिट्ठी, जिसमें वो अपने मुंशी को हुक्म देते हैं कि कौशल्या के काग़ज़ को फाड़कर जला दिया जाए। और तीसरा —" वो रुका, साँस लेने के लिए। "तीसरा वो काग़ज़ है जो मेरे दादा ने अपने बेटे को दिया था, ये कहकर — 'जिस दिन हिसाब खुले, इसे अदालत में रख देना।'"
सक्सेना ने थैला खोला। पहला काग़ज़ — मोटा, भूरा, कोने से फटा। दूसरा — पीला, छोटा, सिक्के जैसी लिखाई। तीसरा — एक मुड़ा हुआ पन्ना, जिस पर सील लगी थी, टूटी हुई।
"ये सील कौन तोड़ेगा?" सक्सेना ने कहा।
"मैंने नहीं तोड़ी," अमर ने कहा। "ये टूटी मिली थी। मेरे दादा ने ख़ुद तोड़ी थी, जिस दिन उन्हें पता चला कि मेरे बाप उनका नाम मिटा रहे हैं।"
सक्सेना ने पन्ना खोला और पढ़ने लगीं। उनका चेहरा बदला — पहले सफ़ेद, फिर लाल। "हे भगवान।"
"क्या है?" मैंने पूछा।
"ये काग़ज़ कहता है," सक्सेना ने धीरे से कहा, "कि हवेली का पाँचवाँ हिस्सा बसंत सिंह का था — और उसका हिस्सा उस वक़्त ज़ब्त हो गया जब उसने भवानी के दादा के ख़िलाफ़ गवाही देने की कोशिश की। अंग्रेज़ों के ज़माने का काग़ज़ है। और नीचे लिखा है — 'जो इस हिस्से का दावा करेगा, उसे पहले ये साबित करना होगा कि बसंत सिंह को ज़बरदस्ती हटाया गया था।'"
"तो हमें बसंत को ढूँढना होगा," मैंने कहा।
"नहीं," अमर ने कहा। सबने उसकी तरफ़ देखा। "बसंत को नहीं ढूँढना। बसंत मेरे दादा का भाई था। और वो —" उसकी आवाज़ टूटी। "वो ज़िंदा है। मुझे पता है। मेरे बाप उसे जानता है, और मेरे बाप ने उसे कभी नहीं ढूँढा, क्योंकि वो जानता था कि अगर बसंत मिल गया तो उसका हिसाब ख़त्म।"
सक्सेना ने अमर की तरफ़ झुककर देखा। "तुम्हें ये सब कैसे पता?"
अमर ने अपनी कलाई उठाई। उस पर एक पुराना, मोटा निशान था — गोल, सपाट, जैसे कोई सिक्का गरम करके दबाया गया हो।
"ये निशान मेरे जन्म से है," उसने कहा। "मेरी माँ कहती थी — ये टोकन का निशान है। और जो इस निशान को छू ले, वो मेरे बाप के हिसाब को पढ़ सकता है।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन अभी भी ठंडा था। "अमर," मैंने कहा, "क्या तुमने कभी वो काग़ज़ देखा है जिस पर तुम्हारे दादा के हस्ताक्षर हैं?"
"देखा है," अमर ने कहा। "तीन साल पहले। मेरे बाप की तिजोरी में। और उस पर हस्ताक्षर नीचे से ऊपर की तरफ़ चढ़े हुए थे — जैसे कोई बैठा हुआ आदमी लिखता है, खड़ा नहीं। मेरे दादा खड़े होकर हस्ताक्षर करते थे। हमेशा।"
सक्सेना ने सिर उठाया। "ये अहम है। बहुत अहम।"
"पर एक बात है," अमर ने कहा। उसकी आवाज़ अब भी धीमी थी, पर आँखें जल रही थीं। "कल सुबह मेरी साँस की ट्यूब हटा दी जाएगी। डॉक्टर कहते हैं — दो दिन से ज़्यादा मशीन पर नहीं रख सकते।"
"क्यों?" मैंने कहा।
"क्योंकि मेरे बाप ने हुक्म दिया है," अमर ने कहा। "मेरी माँ ने मुझे छुपाकर बचाया था, पर अब वो नहीं है। और मेरे बाप को लगता है कि अगर मैं ज़िंदा रहा तो उनका हिसाब ख़त्म।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। बंसी ने अपना सिर पकड़ लिया। शेखर बाबू की चश्मे के पीछे आँखें भर आईं।
सक्सेना इकट्ठा हुईं, काग़ज़ों को करीने से रखा और बोलीं, "अमर, तुम चार बजे अदालत में बयान दोगे। पर मुझे एक और चीज़ चाहिए — तुम्हारा बयान लिखित में, तुम्हारे हस्ताक्षर के साथ, आज सुबह। अगर कल तुम्हें कुछ हो जाए —"
"मुझे कुछ नहीं होगा," अमर ने कहा। "मैं मरने से पहले अपना हिसाब चुकाना चाहता हूँ। मेरी माँ भी यही चाहती थी।"
मैंने कुर्सी से उठते हुए कहा, "अमर, एक बात। तुमने मुझे अस्पताल में जो टुकड़े दिए थे — वो कहाँ से आए थे?"
अमर ने मेरी तरफ़ देखा। "कौन से टुकड़े?"
"वो पीतल के टुकड़े। जो मेरे टोकन से जुड़े थे।"
अमर का चेहरा बदला। "मैंने तुम्हें कोई टुकड़ा नहीं दिया, मनोहर।"
मेरा दिल धड़का। "क्या?"
"मैंने तुम्हें सिर्फ़ काग़ज़ का लिफ़ाफ़ा दिया था। टोकन वाला लिफ़ाफ़ा — मेरे बाप का ठंडा टोकन — मैंने तुम्हें नहीं दिया। वो तुम्हारी जेब में आया था तुम्हारे किसी और के ज़रिए।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। "तो किसने दिया?"
अमर ने कमरे में चारों तरफ़ देखा, जैसे किसी चीज़ को ढूँढ रहा हो। "मुझे नहीं पता। पर जब मैं होश में आया, मेरी माँ की तस्वीर मेरे तकिये के नीचे थी — और वो तस्वीर मेरे बाप के कमरे में थी, जिसकी चाबी सिर्फ़ मेरे बाप के पास है।"
सक्सेना ने कलम उठाई। "मतलब कोई है जो भवानी के घर में आता-जाता है, और जो चाहता है कि ये हिसाब खुले।"
"कोई है," शेखर बाबू ने कहा। "वो कोई है जो बीस साल से चुप है और आज बोलने की तैयारी कर रहा है।"
मैंने जेब से टोकन निकाला और उसे मेज़ पर रखा। ठंडा था — एकदम ठंडा। पर जैसे ही सक्सेना ने पर्ची उसके पास रखी, उस पर हल्की सी गरमाहट आई और एक शब्द उभरा — "दो।"
"दो क्या?" बंसी ने पूछा।
"दो हाथ," सक्सेना ने कहा। उन्होंने पर्ची की तरफ़ इशारा किया। "पर्ची कहती है — हिसाब दो हाथों से चलता है। यानी अब दो हाथ बचे हैं — एक मन्नू का, और एक —" उन्होंने अमर की तरफ़ देखा। अमर ने अपनी कलाई उठाई, जिस पर वो गोल निशान था।
"और एक बसंत का," अमर ने कहा। "मुझे यक़ीन है वो ज़िंदा है। और मैं जानता हूँ वो कहाँ है।"
सक्सेना ने देखा। "कहाँ?"
अमर ने अपनी जेब से एक पीली पर्ची निकाली और मेज़ पर रखी। उस पर एक पता लिखा था — शहर के बाहर, एक पुराना घर, जो अब किसी के नाम पर नहीं।
"ये पता मुझे मेरी माँ ने दिया था," अमर ने कहा। "उसने कहा था — जिस दिन तुम्हें हिम्मत आए, उस दिन इस पते पर जाना।"
मैंने पर्ची उठाई। मेरे हाथ काँप रहे थे। "तो चलिए।"
"नहीं," सक्सेना ने कहा। "तुम नहीं जाओगे। मैं जाऊँगी। और राजेंद्र साहब साथ चलेंगे। क्योंकि अगर वो आदमी ज़िंदा है, तो उसे पहले पुलिस की मौजूदगी में सामने लाना होगा। वरना भवानी का वकील कहेगा — ये कोई और है।"
राजेंद्र ने सिर हिलाया। "मैं चलूँगा। और दो सिपाही भी।"
"मैं क्या करूँ?" मैंने पूछा।
"तुम," सक्सेना ने कहा, "तुम यहाँ रुको। और अमर से उसका बयान लिखवाओ। हर शब्द। हर तारीख़। और —" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "उस पर्ची को मेरी मेज़ की दराज़ में रख दो। अदालत में पेश करने के लिए।"
सक्सेना और राजेंद्र निकल गए। बंसी भी उनके साथ गया। मैं अमर के सामने बैठा, काग़ज़ और कलम लेकर।
अमर ने काँपते हाथ से काग़ज़ छुआ और बोला, "मनोहर, मेरे बयान का पहला वाक्य ये है — 'मेरे बाप ने मेरी माँ को मारा, और मुझे ज़िंदा जलाने की कोशिश की।'"
मैंने लिखा। कलम मेरे हाथ में बोझ लग रही थी। और मेरी जेब में टोकन अब बिलकुल चुप था — इतना चुप कि जैसे वो भी सुन रहा हो।
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