The Token System – Chapter 988
"नहीं," शेखर बाबू ने कहा। "वो पाँचवें का नहीं। वो हवेली का है — जिस पर पाँच हिस्सों की लकीरें हैं। पाँचवें का काग़ज़ अभी किसी और की जेब में है।"
"किसकी?"
"अगर मैं सही हूँ," शेखर बाबू ने कहा, "तो भवानी की जेब में। और वो उसे आज सुबह जलाने वाला था — पर जला नहीं।"
तभी सक्सेना का तीसरा हॉर्न आया। राजेंद्र ने दरवाज़ा खोला। गली में सफ़ेद गाड़ी की रोशनी दिख रही थी, पर आदमी दूर जा चुके थे।
"अब निकलो," सक्सेना ने दरवाज़े से आवाज़ दी। "सुबह चार बजे की सुनवाई — और अब ये नया काग़ज़। मुझे ये पर्चियाँ चाहिए।"
"पहले मुझे एक बात बताइए," मैंने कहा। "जज साहब काग़ज़ पर नाम देखकर क्या कहेंगे? अगर काग़ज़ हरि सिंह के नाम पर है — तो क्या हवेली भवानी को मिल सकती है?"
सक्सेना रुके। उन्होंने पर्चियाँ देखीं। "पाँचवें का नाम अगर काग़ज़ पर नहीं है, तो उसका हक़ ख़ारिज नहीं होता। पर उसे साबित करने के लिए ज़िंदा गवाह चाहिए। और अगर वो ज़िंदा है — तो उसका हक़ पहले है।"
"तो उसे ढूँढना होगा," मैंने कहा।
सक्सेना ने पर्ची मेरी तरफ़ बढ़ाई। "जज साहब से पहले मुझे चाहिए। हवेली लौटते हैं।"
रास्ते में मैं गाड़ी की पिछली सीट पर बैठा था। टोकन मेरी जेब में ठंडा था, पर उसका वज़न वापस आ गया था। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। " अब क्या?"
"अब हमें हवेली में जाना है," मैंने कहा। "और इस बार — दीवार के पीछे जो है, वो अब खुलने वाला है।"
"किससे?"
"उससे," मैंने कहा, "जिसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं — पर जो हर काग़ज़ में है।"
गाड़ी हवेली की तरफ़ मुड़ी। और मेरी जेब में टोकन फिर ठंडा होकर एक नाम की तरह जम गया — 'बसंत।'
॥
गाड़ी हवेली की तरफ़ मुड़ी थी कि सक्सेना ने अचानक ब्रेक मारे और मुड़कर पीछे देखा।
"रुको।" उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो वकील के मुँह से कम निकलती है — घबराहट। "शेखर बाबू, तुमने अभी कहा — भवानी उस काग़ज़ को जलाने वाला था?"
"जी," शेखर बाबू ने कहा। "पर जला नहीं।"
"तो वो काग़ज़ आज भी उसके पास है। और सुनवाई चार बजे है।" सक्सेना ने गाड़ी की चाबी घुमाई। "तुम लोग बैठो। हम अदालत नहीं जा रहे। पहले मेरा दफ़्तार।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि भवानी उस काग़ज़ को लेकर ही चार बजे आएगा," सक्सेना ने कहा। "और अगर उस काग़ज़ पर उसके दादा का हस्ताक्षर है, तो मेरी बहस के सारे काग़ज़ उलटे पड़ जाएँगे। मुझे पहले देखना होगा कि उस काग़ज़ में क्या लिखा हो सकता है।"
बंसी गाड़ी में बैठते हुए बोला, "हमें कैसे पता चलेगा? हमने वो काग़ज़ देखा भी नहीं।"
"तुमने देखा है," शेखर बाबू ने कहा। "हम सबने देखा है। याद करो — कल दीवार खोदते वक़्त जो संदूक निकला था, उसमें काग़ज़ हरि सिंह के नाम पर था। पर उसके नीचे एक और काग़ज़ था — पतला, मुड़ा हुआ, मैंने उँगली से छुआ और सक्सेना साहिबा ने मुझे रोक दिया था।"
सक्सेना ने गाड़ी को गली के मोड़ पर रोका और मुड़कर देखा। "वो काग़ज़ मेरे पास है। अदालत की सील में।"
"तो वो क्यों नहीं खोला?" मैंने पूछा।
"क्योंकि वो सील में है," सक्सेना ने कहा। "और सील खोलने के लिए जज का हुक्म चाहिए। पर एक चीज़ है जो सील में नहीं है।" उन्होंने अपना बैग खोला। "दीवार के खाँचे से मिली दादा की पर्ची। ये मेरे कब्ज़े में है, अदालत की सील में नहीं। और ये काग़ज़ से पुरानी है।"
उन्होंने पर्ची रोशनी में उठाई। मैंने गर्दन आगे की। पर्ची मेरे दादा की लिखाई में थी — मोटी, झुकी, हर अक्षर के नीचे दबाव। "हिसाब दो हाथों से चलता है।"
"ये मैंने पढ़ ली थी," मैंने कहा।
"आधी पढ़ी थी," सक्सेना ने कहा। "काग़ज़ का किनारा मोड़ा हुआ है।" उन्होंने उँगली से किनारा खोला। पर्ची के पीछे, किनारे के नीचे, छोटी सी तारीख़ थी — दिन, महीना, साल, सब शब्दों में।
बंसी ने आगे झुककर देखा। "ये तारीख़ तो…"
"उस दिन से तीन दिन पहले की है," सक्सेना ने कहा, "जिस दिन सेठ गोवर्धनदास ने हवेली का बँटवारा लिखा था। मतलब ये पर्ची हर काग़ज़ से पुरानी है। भवानी के दादा के हस्ताक्षर वाले काग़ज़ से भी।"
"तो इसे अदालत में पहले पेश करना होगा," मैंने कहा।
सक्सेना ने सिर हिलाया। "सबसे पहले। चार बजे जब जज साहब बैठेंगे, मैं उनके सामने यही पर्ची रखूँगी। और कहूँगी कि हवेली का हिसाब इस स्याही से शुरू हुआ था — और ये स्याही उस आदमी के हाथ की है जिसका नाम किसी रजिस्ट्री में नहीं, सिर्फ़ इस पर्ची में है।"
"सुखदेव," मैंने कहा।
"तेरे दादा," शेखर बाबू ने कहा। उनकी आवाज़ भारी थी।
गाड़ी सक्सेना के दफ़्तार पहुँची। सुबह के पाँच बजे थे और आसमान में हल्की लाली थी। सक्सेना ने तीन बत्तियाँ जलाईं, अपनी मेज़ पर सब कुछ रखा और सामने की कुर्सी मेरी तरफ़ सरकाई।
"बैठ। और जो जो तुझे पता है, बता। सब। बीच से नहीं, शुरू से।"
मैंने शुरू किया — टोकन, पहला काम, वो आवाज़, भवानी, नर्सिंग होम, माँ का हस्ताक्षर, दीवार, संदूक, दादा की डायरी। बोलते-बोलते मेरा गला सूखने लगा। बंसी ने पानी का गिलास बढ़ाया।
सक्सेना एक भी बात बीच में नहीं रोकी। वो सिर्फ़ लिखती रहीं। जब मैं रुका, तो उन्होंने कलम रखी और देर तक मेरी तरफ़ देखा।
"मनोहर," उन्होंने कहा, "तू समझ रहा है कि तेरे पास क्या है?"
"नहीं," मैंने सच कहा।
"तेरे पास एक ऐसी चीज़ है जो बताती है कि हवेली का हिसाब तीन हाथों से नहीं, दो हाथों से शुरू हुआ था। और उन दो हाथों में एक तेरे दादा का था।" उन्होंने पर्ची उठाई। "भवानी का काग़ज़ चाहे जितना पुराना हो, इस पर्ची के सामने वो नया है। और अदालत में सबसे पुरानी निशानी पहले बोलती है।"
"तो हम जीत जाएँगे?" बंसी ने पूछा।
सक्सेना ने उसकी तरफ़ देखा। "जीत का मतलब तुम क्या समझते हो?"
"कि हवेली मन्नू की हो जाएगी।"
"हवेली किसी की नहीं होगी," सक्सेना ने कहा। "हवेली का हिसाब होगा। और हिसाब जब बराबर होता है, तो किसी को हवेली नहीं मिलती — सबको उनका हिस्सा मिलता है।" उन्होंने पर्ची वापस मेरी तरफ़ बढ़ाई। "पर एक अड़चन है। भवानी का वकील आज चार बजे वो काग़ज़ पेश करेगा, जिस पर भवानी के दादा के हस्ताक्षर हैं। मेरे पास अभी तक वो काग़ज़ देखने का हुक्म नहीं है। जज साहब चार बजे से पहले वो नहीं खोलेंगे।"
"तो?"
"तो हमें एक गवाह चाहिए जो कहे कि उसने वो काग़ज़ अपनी आँखों से देखा है और उस पर का हस्ताक्षर बाद में जोड़ा गया था।"
"मोहन लाल," मैंने कहा।
"मोहन लाल मिल गए," सक्सेना ने कहा। "पर वो डरता है। भवानी के नाम से काँपता है।"
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। एक नहीं — तीन, छोटी, मोटी, जैसे किसी ने हथेली से खटखटाया हो।
सक्सेना ने कलम रखी और दरवाज़े की तरफ़ देखा। "इतनी सुबह कौन?"
"मैं खोलता हूँ," बंसी ने कहा और उठा।
दरवाज़ा खुला और मेरा हाथ अपने आप कुर्सी के पीछे चला गया। सामने अमर सिंह खड़ा था — व्हीलचेयर पर बैठा, पीला चेहरा, आँखों के नीचे काले घेरे, और नाक में एक पतली नली जो उसके कुर्ते के नीचे जाकर छुप जाती थी। हाथ में एक पुराना कपड़े का थैला था।
"दादा जी," वो बोला, और आवाज़ जैसे किसी दूर के कुएँ से आई। "मैंने सुना आप वकील हैं।"
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