The Token System – Chapter 987
लालटेन की रोशनी में सफ़ेद कुर्ता दिखा। फिर चेहरा। और मैं सुन्न रह गया।
शेखर बाबू थे।
उनकी साँस फूली हुई थी, चश्मा नहीं था, बाल बिखरे, कुर्ते पर धूल। हाथ में एक लिफ़ाफ़ा दबाए खड़े थे। वो काँप रहे थे और कमरे में हवा भी कम थी।
"शेखर बाबू?" मैंने कहा। "आप? आप यहाँ?"
"अंदर नहीं आ सकता था," वो फुसफुसाए। "भवानी के आदमी गली में हैं। मैं पिछवाड़े से आया।"
"आप चले गए थे — अस्पताल से गायब थे।"
"छिपा हुआ था। बाबूलाल की कोठरी में। उसने मुझे खाना दिया।" उन्होंने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पर पहले सुन। जाँच से पहले अदालत को पता चल गया है कि काग़ज़ किसी और नाम पर है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया। हाथ ठंडे थे, पर चेहरा गरम।
"किसके नाम पर?"
शेखर बाबू ने गला साफ़ किया। "काग़ज़ पर नाम है — तेरे दादा का नहीं। भवानी के दादा का है।"
कमरे में एक पल के लिए कुछ नहीं सुनाई दिया। बंसी का हाथ रुक गया। राजेंद्र दरवाज़े के पास ठिठका।
"क्या बोल रहे हैं?" मैंने कहा। "वो काग़ज़ दादा ने दीवार में रखा था।"
"हाँ," शेखर बाबू ने कहा। "पर उस पर नाम बाद में लिखा गया। मूल काग़ज़ पर दादा का नाम था। और जब उन्होंने इस हवेली के काग़ज़ भवानी के दादा हरि सिंह के सामने रखे, तो वो पढ़कर हँसे — 'ये तो मेरा ही काग़ज़ है।'"
"कैसे?"
"दादा ने अपना चौथा हिस्सा जिस काग़ज़ से बचाया, वो काग़ज़ हरि सिंह के नाम पर था। मतलब — जो दीवार में छिपा था, वो दादा का हिस्सा नहीं, हरि सिंह के दावे का हिससा था। मन्नू, तेरा दादा शायद इसलिए दीवार में रख गया, जिससे हरि सिंह को पता न लगे कि उसका काग़ज़ गायब है।"
"तो फिर वो हिसाब जो दादा ने दीवार में छिपाया —"
"वो भवानी का नहीं। पर भवानी के नाम से नहीं — हरि सिंह के नाम से। हरि सिंह का बेटा भवानी है। यानी काग़ज़ की क़ीमत —"
"भवानी को मिलेगी," मैंने कहा। मेरे हाथ की गर्मी कहीं खो गई।
शेखर बाबू ने सिर झुकाया। "हाँ।"
"पर आपने कहा था, काग़ज़ में चौथा हिस्सा कौशल्या का है।"
"है," शेखर बाबू ने कहा। "काग़ज़ पर कौशल्या का नाम है। पर उसके साथ एक शर्त भी है — माँ ने लिखी थी, 'यह सौदा तभी मान्य होगा जब मेरा बेटा ख़ुद आकर हिसाब चुकाए।' और यही शर्त हरि सिंह को चुभी थी। उसने वो काग़ज़ माँगकर अपने नाम पर करने की कोशिश की, और उस रात —"
वो रुक गए।
"क्या हुआ उस रात?" बंसी ने कहा।
"उस रात दादा ने काग़ज़ छिपाया। और हरि सिंह उसे ढूँढने आया। पर उसे मिला नहीं।" शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि दादा ने काग़ज़ नहीं छिपाया था। उसने काग़ज़ के नीचे दूसरा दरवाज़ा छिपाया था। और उस दरवाज़े के पीछे — असली काग़ज़।"
"असली काग़ज़?" मेरा गला सूख रहा था। "तो ये जो हमने निकाला?"
"ये बाहरी हिस्सा है। जो किसी को दिखाने के लिए है।" शेखर बाबू ने वो खाँचा देखा, जहाँ मैंने कील टेकी थी। "जो अंदर है, वो दादा ने आख़िरी रात लिखा। उसमें ये भी लिखा है — 'हरि सिंह का हिस्सा काग़ज़ से, पर हवेली से नहीं।'"
बंसी ने कुछ कहना चाहा, पर बाहर से फिर गाड़ी का हॉर्न आया — इस बार एक लंबा।
"सक्सेना बुला रहे हैं," राजेंद्र ने कहा।
"रुको," मैंने कहा। मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। "आप ये सब बता रहे हैं — ये आपको कहाँ से पता चला?"
शेखर बाबू ने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक पुरानी पर्ची थी, दादा की लिखाई में। "ये काग़ज़ खाँचे से नहीं निकला। ये मेरे पास था।"
"कब से?"
"आठ साल से," शेखर बाबू ने कहा। "दादा ने मुझे दिया था। कहा — जब तेरा हिसाब पूरा हो, तो इसे उस बच्चे को देना जो दीवार के नीचे खड़ा होगा।"
मैंने पर्ची पढ़ी। दादा की मोटी लिखाई में लिखा था — "हवेली का हिसाब तीन जनों में नहीं बँटा। पाँच में बँटा। जो पाँचवा है, उसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं। वो खुद काग़ज़ है।"
इसके नीचे एक लकीर थी, और उस लकीर के नीचे छोटे अक्षरों में — "बा."
केवल "बा." — बाकी अधूरा।
"क्या है ये?" मैंने पूछा।
"ये मैं नहीं जानता," शेखर बाबू ने कहा। "पर दादा ने कहा था — जिस दिन ये हाथ लगेगा, उस दिन असली हिसाब खुलेगा।"
मैंने पर्ची अपनी जेब में रखी। उस वक़्त मेरी जेब में दो पर्चियाँ थीं — खाँचे वाली और शेखर बाबू वाली। और दोनों पर एक ही बात थी — हिसाब दो हाथों से चलता है, और पाँचवा कोई है जो काग़ज़ों में नहीं है।
राजेंद्र ने बाहर झाँका। "सर, सक्सेना कह रहे हैं — गली में भवानी के आदमी और आ गए हैं। हमें अभी निकलना होगा।"
"एक मिनट," मैंने कहा।
मैंने टोकन वापस जेब में रखा। पर उससे पहले मैंने उसे खाँचे के उस पत्थर पर फिर रखा — वो पत्थर, जिस पर सीधा कोना-चिह्न था। टोकन अब भी ठंडा था, पर पत्थर के नीचे मेरी उँगली को एक दरार मिली। मैंने कील दरार में डाली और हल्का दबाया।
पत्थर अंदर की तरफ़ धँसा। और अंदर से एक पुरानी लकड़ी की परत दिखी, जिस पर सीधी लकीरें थीं — जैसे कोई तिजोरी का ढक्कन हो। पर उस पर कोई ताला नहीं था। बस एक छोटा गड्ढा, जिसमें टोकन का कोना ठीक बैठ रहा था।
"ये तो खुला हुआ है," बंसी ने फुसफुसाया।
"नहीं," मैंने कहा। "ये खुला हुआ नहीं है। ये इंतज़ार कर रहा है।"
"किसका?"
मैंने पर्ची को जेब से निकालकर दोनों पर्चियों को एक साथ रखा — खाँचे वाली और शेखर बाबू वाली। दोनों पर दादा की लिखाई। दोनों पर एक-सी लकीर।
और तभी मेरे कान में आवाज़ आई — बहुत हल्की, टोकन की आवाज़। "पाँचवाँ।"
मैं पलटा। शेखर बाबू मेरी तरफ़ देख रहे थे। बंसी ने मेरी जेब की तरफ़ देखा।
"तुमने कुछ सुना?" बंसी ने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा।
"क्या?"
मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा — उनका चेहरा पीला था। "शेखर बाबू, आपने कभी सुना — हवेली का पाँचवाँ हिस्सा?"
शेखर बाबू ने गला साफ़ किया। "पाँचवें की बात सिर्फ़ बड़े बुज़ुर्ग जानते थे। मैंने ये नाम अपने कान से दादा के मुँह से सुना था — और वो भी एक बार। फिर दादा ने कहा — ' इसका नाम नहीं लेना।' "
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। "भवानी के दादा हरि सिंह का कोई भाई था?"
राजेंद्र ने सोचा। "मन्नू, मैंने थाने में पुराने काग़ज़ देखे हैं। हरि सिंह के एक भाई का ज़िक्र आता है — बड़ा भाई, जो हवेली के काग़ज़ों से गायब है।"
"नाम?"
"बसंत सिंह," राजेंद्र ने कहा। "काग़ज़ों में बस इतना — हवेली की पहली मंज़िल पर उसका कमरा था, और बीस साल पहले वो ज़िंदा था।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। "बसंत।"
"हाँ। क्यों?"
मैंने वो पर्ची उठाई, जिस पर दादा ने लिखा था — "बा."
"ये 'बसंत' का पहला हिस्सा है," मैंने कहा। "दादा ने पूरा नाम नहीं लिखा, क्योंकि शायद उस वक़्त वो नाम भी ख़तरे में था।"
"पर ये कौन है?" बंसी ने पूछा।
राजेंद्र ने कहा, "अगर हरि सिंह का बड़ा भाई था, तो हवेली का हिस्सा उसका भी होना चाहिए। पर किसी काग़ज़ पर उसका नाम नहीं।"
"क्योंकि वो नाम मिटा दिया गया," शेखर बाबू ने कहा। "भवानी के बाप ने मिटाया। मैंने एक बार काग़ज़ देखा था, जिस पर तीन नाम थे — और चौथी लकीर के बाद एक जगह थी जो खुरची हुई थी। खुरचन के नीचे सिर्फ़ 'ब' बचा था।"
मैं खड़ा हो गया। मेरी जेब में टोकन ठंडा था, पर मेरे हाथ काँप रहे थे। "तो ये काग़ज़ जो हमें मिला, वो पाँचवें का है?"
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