The Token System – Chapter 986
"क्या ख़त्म?"
लड़के ने डिब्बा रखा और पलटकर भाग गया। मैंने ढक्कन खोला। अंदर एक काग़ज़ और एक पीतल की छोटी कील थी — वही आकर, जो दीवार की सीमेंट में मिली थी।
काग़ज़ पर बाबूलाल की लिखाई में तीन लाइनें थीं। "भवानी ने आज रात फिर सीमेंट मँगवाया है। दीवार में जो खाँचा है, वो उसने नहीं बनवाया। वो तो पहले से था।"
मैंने सक्सेना को काग़ज़ दिखाया। सक्सेना ने पढ़ा और तुरंत उठे।
"चलो, फिर से हवेली। अभी।"
दो बजे हम फिर हवेली के आँगन में थे। दीवार का वो हिस्सा वैसा ही खुला था, पर राजमिस्त्री वहाँ नहीं था। एक नया आदमी बाल्टी लेकर खड़ा था।
सक्सेना ने उससे पूछा — "तुम क्या कर रहे हो?"
"मालकिन ने कहा है, दीवार फिर पुतवा दो।"
"अभी नहीं।" सक्सेना ने बाल्टी रखवा दी।
मैंने पीतल की कील जेब से निकाली और दीवार के उस खुले हिस्से में देखा। जहाँ से संदूक निकला था, वहाँ से अंदर एक और परत दिख रही थी — सीमेंट की नहीं, ईंट की नहीं। कुछ और।
मैंने सक्सेना की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर मैंने कील उठाई और उस परत पर रखी। कील धीरे-धीरे अंदर गई, जैसे मक्खन में, और फिर रुकी।
और तभी अंदर से आवाज़ आई। हल्की, खोखली, जैसे किसी खाली कमरे में हवा हो।
मैंने हाथ पीछे खींचा। सक्सेना ने सिपाहियों को तैयार रहने का इशारा किया।
मैंने कील फिर डाली और दबी आवाज़ में कहा, "राजेंद्र, ये दीवार नई नहीं है। ये सिर्फ़ ऊपर से पुती है — अंदर खाँचा अभी ज़िंदा है।"
॥
कील अंदर गई और वो खोखली आवाज़ आई। मैंने हाथ पीछे खींच लिया। सक्सेना ने सिपाहियों को इशारा किया — लाठियाँ तैयार।
"इस परत के पीछे कोई जगह है," सक्सेना ने धीरे से कहा। "पर रात में नहीं। सुबह अदालत की टीम के साथ।"
"सुबह तक भवानी इसे फिर पुतवा देगी," मैंने कहा।
सक्सेना रुके। फिर बोले, "ठीक है। पर शोर नहीं।"
हम तीन — मैं, बंसी और राजेंद्र। सक्सेना गली के मोड़ पर गाड़ी में रहे, ताकि कोई बाहर से न आ सके। राजेंद्र ने अपनी जेब से एक छोटी सी रेती निकाली, जो उसने पहरे के लिए रखी थी। बंसी ने बाल्टी से पानी उठाया और परत पर डाला। सीमेंट गीला होकर मुलायम हुआ, और मेरी कील उसमें धँसती चली गई।
आधी रात ढल चुकी थी। आँगन में लालटेन की पीली रोशनी थी। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे।
"मन्नू," बंसी ने फुसफुसाया, "तेज़ी से।"
सीमेंट की परत उतरने लगी। मैंने हाथ लगाया तो वो टुकड़ों में झड़ने लगी — जैसे सूखी मिट्टी। राजेंद्र ने अपनी सिपाही की टोपी उतारकर पीछे रखी और दोनों हाथों से परत खुरचने लगा।
और तभी गली से आवाज़ आई। धातु के दरवाज़े पर किसी ने हाथ मारा।
बंसी ने लालटेन नीचे कर दी।
"कौन?" राजेंद्र ने आवाज़ दी।
"मालिक ने भेजा है," बाहर से आवाज़ आई। "दीवार का काम अधूरा है। खोलो।"
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने होंठों से कहा — रोको।
वो दरवाज़े के पीछे गया। बाहर दो आवाज़ें थीं — एक मोटी, एक हल्की। बंसी ने रेती मेरे हाथ से ली और परत पर तेज़ी से चलाने लगा। चूरा उड़ने लगा।
"सुन," बाहर वाला फिर बोला, "गाड़ी लेकर खड़े हैं। पत्थर गिरे तो ज़िम्मा तेरा।"
"तो फिर गाड़ी हटाओ," राजेंद्र ने कहा। "अंदर कोई काम नहीं हो रहा। अदालत की मुहर लगी है, पढ़ लो।"
"पढ़ने से क्या? ठाकुर साहब ने कहा है — अंदर जाओ।"
"फिर ठाकुर साहब से पूछ लो — अदालत की मुहर तोड़ने का हुक्म है क्या?"
"फिर पूछेंगे," आवाज़ लौटी। थोड़ी देर रुकने के बाद मोटी आवाज़ बोली — "ठीक है। ज़मीन है, ढही तो तक्लीफ़ उठाओगे।" और पैरों की आवाज़ दूर गई।
मैंने राहत की साँस ली। पर बंसी नहीं हिला। वो परत पर काम कर रहा था और उसका हाथ काँप रहा था।
"जा रहे हैं?" उसने पूछा।
"अभी," राजेंद्र ने कहा। "गली के मोड़ पर गाड़ी है। दो आदमी हैं। जगह छिपकर देख रहे हैं।"
मैं परत पर झुका। रेती से सीमेंट उतरती गई और मुझे दो गहरे निशान दिखे — ईंट के नीचे, खाली जगह। दो खाँचे। एक बाईं तरफ़, एक दाईं तरफ़। मेरी जेब में रखा टोकन ठंडा था, पर उसका वज़न बढ़ गया था — मैंने उसे थामा तो हाथ नीचे की तरफ़ खिंचा।
मैंने बाईं तरफ़ का खाँचा छुआ। धूल थी। बहुत पुरानी, सूखी धूल। मैंने उसमें उँगली डाली तो नीचे कुछ सख़्त मिला। कुछ रखा हुआ था, और वो चला गया। बस धूल भरी जगह बची।
"यहाँ तो कुछ नहीं," बंसी ने कहा।
"होना चाहिए था," मैंने कहा। "कौशल्या की मुहर वाला संदूक यहीं से निकला था। उसका जोड़ीदार भी यहीं था।"
दाईं तरफ़ के खाँचे में मेरी उँगली अटकी। कुछ सख़्त — काग़ज़, मुड़ा हुआ। मैंने उसे बाहर खींचा। पुरानी पीली पर्ची थी, किनारों से जर्जर, पर स्याही अभी पढ़ी जा सकती थी।
मैंने लालटेन के नीचे पर्ची खोली। दादा की लिखाई थी — मोटी, टेढ़ी-मेढ़ी, वही जो मैंने डायरी में देखी थी।
"जो इसे पढ़े, वह जाने कि हिसाब दो हाथों से चलता है, एक से नहीं।"
बंसी ने मेरे कंधे के ऊपर से पढ़ा। "दो हाथ?"
"हाँ," मैंने कहा। "दो हाथ। एक हिसाब — दो हाथ।"
राजेंद्र पास आया। "मतलब भवानी के पास भी टोकन था।"
"हो सकता है," मैंने कहा। "पर उसका टोकन टूटा हुआ निकला। टोटा हुआ। पीतल का कोना जोड़ते ही उसका रंग बदल गया। दोनों टोकन एक ही खाते के हैं?"
"या एक ही खाता दो हाथों से चला," बंसी ने कहा। "और हिसाब भी दोनों ने बाँटा। पर इसका हिसाब आधा-अधूरा। भवानी ने कभी अपना हाथ साफ़ नहीं किया।"
मैंने पर्ची जेब में रखी। मैंने फिर खाँचे में हाथ डाला — बाईं तरफ़ वाले में, जहाँ धूल थी। उसकी दीवार अंदर से मुलायम थी। मैंने कील उस पर टेका और हल्का दबाया। अंदर से आवाज़ आई — पर वो खोखली नहीं थी। वो किसी चीज़ के मुड़ने जैसी थी, जैसे कोई पुरानी कुंडी अंदर से हिली हो।
"ये तिजोरी नहीं है," मैंने कहा। "ये कोई दरवाज़ा है।"
राजेंद्र ने सिपाही की लाठी उठाई और खाँचे के बीच में रखी। "सर, इसके पीछे सीढ़ियाँ हैं। गहरा है।"
तभी पीछे कुछ गिरा — धातु की आवाज़, आँगन के दूसरे कोने से। तीनों पलटे।
लालटेन की रोशनी में एक परछाईं गाड़ी के पास से हिली, फिर आँगन के पुराने नीम के पेड़ के पीछे गई। राजेंद्र ने लाठी उठाई और दौड़ा।
"रुको!" उसकी आवाज़ गूँजी। फिर भागने की आवाज़, और फिर राजेंद्र लौटा, साँस फूली हुई। "नहीं मिला। गाड़ी के पीछे से निकला। पर गली में भवानी के आदमी नहीं हैं — वो जा चुके।"
"तेज़ था," बंसी ने कहा। "भवानी का आदमी होता तो दौड़ता नहीं। वो जानता है उसे क्या करना है।"
"फिर कौन था?" राजेंद्र ने पूछा।
कोई जवाब नहीं दिया।
मैं वापस दीवार पर झुका। परत को और खुरचा। खाँचे के नीचे एक पत्थर था, जिस पर टोकन से मिलता कोना-चिह्न खुदा था — वो वाला सीधा निशान, दो लकीरें और बिंदु। मैंने टोकन उस पर रखा। निशान में पूरा बैठ गया।
टोकन ठंडा था, पर पत्थर गरम होने लगा। अंदर से फिर वो मुड़ने की आवाज़ आई।
"मन्नू," बंसी ने कहा, "गाड़ी के पीछे कोई गिरा। ज़रा देख लें?"
"पहले ये," मैंने कहा।
तभी बाहर से आवाज़ आई — सक्सेना की गाड़ी का हॉर्न, दो बार। मतलब सावधान।
राजेंद्र दरवाज़े की तरफ़ दौड़ा। पर दरवाज़े तक पहुँचने से पहले पीछे के पुराने बरामदे से खड़खड़ाहट हुई। मैं पलटा।
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