The Token System – Chapter 985
"हाँ," मैंने कहा।
"तो सुबह भेजी पीली पर्ची सच कह रही थी। ये सचमुच तेरा है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। मुहर के नीचे एक कोना-चिह्न खुदा था — वही, जो मेरे टोकन पर था। मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक छोटी चिट्ठी थी, जिस पर माँ की लिखाई में चार शब्द थे — "अब हिसाब पूरा कर।"
बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "देखा? हवेली ने तुझे दिया।"
मैंने चिट्ठी जेब में रखी और टोकन निकाला। वो गरम था, बहुत गरम। उस पर नई लकीर के नीचे एक शब्द उभर रहा था — "अब।"
"सक्सेना," मैंने कहा, "अदालत चलें।"
सक्सेना ने फ़ाइल अपने बैग में रखी और हम सब गाड़ी की तरफ़ बढ़े। पीछे, दीवार के सामने, राजमिस्त्री हथौड़ी उठाए खड़ा था और आँगन में सिपाही। मैंने आख़िरी बार हवेली की तरफ़ देखा। सुबह की रोशनी में उसकी छत पर बबूल का पेड़ हिल रहा था और दीवार का वो हिस्सा, जो अब खुला था, गहरा काला दिख रहा था — जैसे हवेली ने अपना मुँह खोल दिया हो, और अंदर से कुछ बोल रहा हो।
गाड़ी चली। मेरी जेब में टोकन था, फ़ाइल थी, और माँ की चिट्ठी। पर मुझे एक बात खटक रही थी।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या सोच रहा है?"
"सोच रहा हूँ — आज सुबह जो लिफ़ाफ़ा मिला, उसमें "बाबूलाल" लिखा था।"
"तो?"
"तो बाबूलाल ने ख़ुद जाकर लिफ़ाफ़ा क्यों नहीं दिया? क्यों दुकान के शटर के नीचे रखकर गया?"
बंसी ने कुछ सोचा। "क्योंकि वो चाहता था कि कोई उसे देखे।"
"या कोई उसे देख न सके।"
गाड़ी ने अदालत की गली में मोड़ लिया। मैंने जेब में हाथ डाला और टोकन को छुआ। वो अब भी गरम था। और उस पर एक नई लकीर उभर रही थी, जो बहुत धीमी थी, जैसे किसी ने उसे बाहर से, बहुत दूर से, छुआ हो।
गाड़ी अदालत के गेट पर रुकी। सक्सेना पहले उतरे, फ़ाइल सीने से लगाए। पीछे से जज का क्लर्क भागा आया।
"सर, आज तो सुनवाई नहीं है। चीफ़ जस्टिस ने ख़ुद बुलाया है?"
"बुलाया क्या," सक्सेना ने कहा, "ये सब देखकर बुलाना पड़ेगा। भवानी का वकील आ चुका?"
"आ गया, सर। दो वकील हैं उसके।"
मैं गाड़ी से उतरा। पैर रखते ही आँगन के पत्थर पर ठंडक महसूस हुई — टोकन। जेब से निकाला। उस पर कोई नई लकीर नहीं थी। बस वो पुरानी लकीरें, और सबसे नीचे वो एक शब्द — "अब।"
हम लिफ़्ट से ऊपर गए। कोर्ट रूम के बाहर भवानी का वकील मिला — छोटा, गोल चश्मा, हाथ में लाल फ़ाइल। मैंने उसे देखा। उसने मुझे देखा।
"तुम वही हो?" उसने कहा। "जो हवेली का दावा कर रहा है?"
"हाँ।"
"सबूत क्या है? एक पुरानी लिफ़ाफ़ा?"
"लिफ़ाफ़ा नहीं," सक्सेना ने बीच में आते हुए कहा, "एक संदूक। दीवार के अंदर से। और एक मुहर लगी फ़ाइल।"
वकील का चेहरा बदला। उसने पीछे मुड़कर भवानी की तरफ़ देखा, जो बेंच पर बैठी थी। भवानी ने कुछ कहा जो मैं सुन नहीं पाया, पर वकील ने सिर हिलाया और हमारी तरफ़ मुड़ गया।
"अदालत में सब देखेंगे," उसने कहा और अंदर चला गया।
भवानी हमें देखकर उठी। उसने साड़ी ठीक की और मेरे सामने आ खड़ी हुई। इतने करीब, कि उसके हाथ की मेहंदी की महक आई।
"तूने दीवार तुड़वा दी?" उसकी आवाज़ धीमी थी, पर तेज़।
"दीवार के अंदर क्या था, वो आप जानती हैं," मैंने कहा।
"उस दीवार में मेरी माँ की राख है। तू उसे…"
"माफ़ कीजिए," मैंने कहा, "पर आपकी माँ की राख अदालत में नहीं जाती। आपने रात में सीमेंट लगवाई थी। क्यों?"
भवानी का हाथ उसकी साड़ी के पल्लू पर कस गया। वकील तुरंत आगे आया। "ये सवाल की जगह नहीं है —"
"सवाल की जगह अदालत तय करेगी," सक्सेना ने कहा। "अंदर चलिए।"
अंदर जज का कमरा था — बड़ी मेज़, दीवार पर गांधी की तस्वीर, खिड़की से धूप। जज बैठे थे, सामने चश्मा. सक्सेना ने संदूक मेज़ पर रखा।
जज ने चश्मा उतारा। "ये क्या है?"
"सर, आज सुबह हवेली की दीवार के अंदर से निकला है। राजमिस्त्री और दो गवाह मौजूद थे।"
जज ने फ़ाइल खोली। मुहर देखी। फिर चिट्ठी देखी। कमरे में सन्नाटा था, पर वो सन्नाटा नहीं जो डर से आता है — वो जो किसी चीज़ के भारी होने से आता है।
"कौशल्या," जज ने पढ़ा। "ये नाम मुझे कहीं सुना है।"
"सर," सक्सेना ने कहा, "उन्नीस सौ बावन का एक केस है, दुर्गा हवेली का। उसमें एक हिस्सा उस औरत का था जिसका नाम कागज़ों से ग़ायब कर दिया गया था।"
जज ने भवानी की तरफ़ देखा। "भवानी देवी, आपके पास बोलने को कुछ है?"
भवानी खड़ी हुई। मैंने देखा — उसके होठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। कुछ सेकंड बाद बोली।
"वो हिस्सा कभी उसका था ही नहीं।"
"यह कागज़ कहता है कि था," जज ने कहा।
"कागज़ झूठ बोलते हैं।"
"तो झूठ साबित कीजिए। आपके पास अदालत में सुनवाई का मौका है।"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। ऐसे, जैसे किसी ने उसकी जमीन खींच ली हो। फिर वो बैठ गई, और उसका वकील कुछ फुसफुसाने लगा।
तभी मेरी जेब में टोकन ठंडा हुआ। एक झटका सा लगा। मैंने हाथ डाला। टोकन अब बर्फ़ जैसा ठंडा था, और उस पर पुरानी सारी लकीरें ग़ायब थीं। सिर्फ़ एक नई लकीर, चौड़ी और गहरी, जैसे किसी ने कील से खींची हो।
मैंने टोकन जेब में रखा और सक्सेना को कोने में ले गया।
"टोकन ठंडा हो गया," मैंने कहा।
"कब से?"
"अभी। जैसे भवानी ने कुछ बोला।"
सक्सेना ने सोचा। "टोकन जिसके क़रीब होता है, उसकी हालत बताता है। तेरे पास होता है तो गरम। भवानी के पास क्या तूने कभी पकड़ा?"
"नहीं।"
"तो पकड़ना पड़ेगा।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। "अभी?"
"नहीं, अभी नहीं। पर आज। जज के सामने टोकन पकड़ेंगे तो भवानी का पूरा रंग सामने आ जाएगा।"
जज ने कागज़ात देखकर कहा — "चार बजे तक सुनवाई टाली जाती है। दोनों पक्ष अपने सबूत लाएँ। और सक्सेना, ये संदूक अदालत की कस्टडी में रहेगा।"
बाहर निकले तो बंसी दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में चाय का कुल्हड़। उसने एक मुझे दिया।
"तेरा चेहरा देखकर लग रहा है, अंदर कुछ बड़ा हुआ।"
"हुआ," मैंने कहा। "और चार बजे से पहले मुझे भवानी के हाथ से कुछ लेना है।"
बंसी ने चाय की चुस्की ली। "क्या?"
"उसका हाथ। टोकन पकड़ना है उसके हाथ में।"
बंसी रुका। "पागल हो गया है? वो औरत तुझे हाथ लगाने भी नहीं देगी।"
"तो हाथ लगवाना पड़ेगा।"
हम बाहर आँगन में बैठे। दोपहर की धूप तेज़ थी। मैंने टोकन जेब से निकाला — वो ठंडा ही था, पर उस पर नई लकीर अब धुँधली हो रही थी, जैसे कोई स्याही सूख रही हो।
"बंसी," मैंने कहा, "अब सुबह का सवाल याद है? बाबूलाल ने शटर के नीचे लिफ़ाफ़ा क्यों रखा?"
"क्यों?"
"क्योंकि वो चाहता था कि भवानी को पता चले कि लिफ़ाफ़ा मिल गया।"
बंसी ने माथा सिकोड़ा। "मतलब?"
"मतलब, बाबूलाल हमारी तरफ़ है, पर भवानी को लगता है वो उसकी तरफ़ है। उसने रात में सीमेंट लगवाया। उसे कैसे पता चला कि हम दीवार के पास जा रहे हैं?"
बंसी का कुल्हड़ हाथ में रुक गया। "बाबूलाल ने बताया।"
"या किसी और ने।"
तभी गेट की तरफ़ से आवाज़ आई। एक सिपाही दौड़ता आया।
"सर, बाहर कोई आदमी आपसे मिलना चाहता है। कह रहा है बाबूलाल का बेटा है।"
मैं उठा। आँगन के बाहर एक लड़का खड़ा था — उम्र पंद्रह-सोलह, फटी कमीज़, हाथ में एक डिब्बा। उसने डिब्बा मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"पिताजी ने भेजा है। कहा — अब दे देना। ख़त्म हो गया।"
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