The Token System – Chapter 984
"ये क्या है?" मैंने कहा।
"सीमेंट," बंसी ने उँगली लगाई। "ताज़ा। अभी नहीं सूखा।"
मैंने दीवार को छुआ। सच में — ताज़ा सीमेंट। जहाँ मशाल से गारा ढीला हुआ था, वहाँ किसी ने नया गारा लगा दिया था। रात में। जब हम सो रहे थे।
"भवानी," मैंने कहा।
"भवानी नहीं," राजेंद्र ने कहा। वो सीढ़ियों से उतरकर आया था, हाथ में लाठी। "देख — काम साफ़ है। कोई मज़दूर नहीं, कोई शोर नहीं। कोई जानकार आदमी था।"
बंसी ने दीवार के नीचे फ़र्श पर देखा। मिट्टी पर पैरों के निशान थे।
"दो जोड़ी," बंसी ने कहा। "और एक जोड़ी जूतों के।" उसने लालटेन नीचे झुकाई। "ये जूते हैं, चप्पल नहीं।"
"तो आदमी भवानी का नहीं," राजेंद्र ने कहा। "भवानी के लोग चप्पल पहनते हैं।"
मैंने टोकन निकाला। उसे दीवार के उस नए सीमेंट पर रखा। कुछ नहीं हुआ। मैंने उसे जेब में रखा और दीवार पर कान लगाया। मुझे सिर्फ़ अपनी साँस सुनाई दी। फिर, बहुत दूर से, जैसे किसी कमरे में हवा चली हो — एक हल्की सी आवाज़। मैंने दीवार पर हाथ फेरा। जहाँ सीमेंट ख़त्म होता था, वहाँ पुरानी ईंट थी। उस पर कोई आकृति खुदी थी।
"बंसी," मैंने कहा, "लालटेन इधर ला।"
लालटेन की रोशनी में ईंट पर उलटा कोना-चिह्न दिखा। वही जो माँ की पीतल की डिबिया पर था। वही जो टोकन के कोने पर था।
"ये नया नहीं है," मैंने कहा। "ये ईंट पुरानी है। सिर्फ़ ऊपर से पुती है।"
राजेंद्र मेरे पास आया। "मतलब?"
"मतलब — दीवार के अंदर जो खाँचा है, वो अभी ज़िंदा है। ऊपर सिर्फ़ प्लास्टर है।"
राजेंद्र ने अपनी जेब से कुछ निकाला। वो पीतल की छोटी कील थी, जो कमलेश के लिफ़ाफ़े में आई थी।
"ये रख," उसने कहा। "सुबह से पहले कुछ और हो, तो काम आएगी।"
"कील से दीवार क्या खुलेगी?" बंसी हँसा।
राजेंद्र ने कील उलटी पकड़ी और सीमेंट में धकेली। वो आसानी से घुस गई — जैसे मक्खन में। फिर रुकी। फिर अंदर जाकर खड़ी हो गई।
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। "यह दीवार नई नहीं, यह सिर्फ़ ऊपर से पुती है — अंदर खाँचा अभी ज़िंदा है।"
"तो अंदर कुछ है," मैंने कहा।
"या कुछ था," बंसी ने कहा। "और कोई उसे निकालने आया था।"
हम तीनों चुप हो गए। रात की हवा में आँगन का बबूल काँपा। मुझे पीछे से एक आवाज़ आई — हल्की, जैसे कोई हँसा हो। मैं पलटा। कोई नहीं था। सिर्फ़ दीवार का वो हिस्सा, जो अब पूरी तरह सूखा नहीं था और नमी में चमक रहा था।
"आज रात हम यहीं रहेंगे," मैंने कहा। "कील अंदर है। सुबह जज की टीम आएगी — तब तक कोई इसे नहीं छुएगा।"
बंसी ने लालटेन नीचे रखी। राजेंद्र ने सिपाहियों को दोनों तरफ़ बैठाया। मैं दीवार के सामने बैठा, चादर ओढ़े।
"मन्नू," बंसी ने पास आकर कहा, "एक बात कहूँ?"
"कह।"
"जब तू दीवार छू रहा था, तब तेरी जेब से आवाज़ आई थी।"
"कैसी आवाज़?"
"जैसे कोई चीज़ हिली हो।"
मैंने टोकन निकाला। अब वो ठंडा नहीं था। हल्का गरम था। और उस पर एक लकीर उभर रही थी — धीमी, जैसे किसी ने उँगली से पीतल पर रेखा खींची हो। लकीर के नीचे कोई शब्द नहीं था।
"क्या लिखा है?" बंसी ने पूछा।
"कुछ नहीं। सिर्फ़ लकीर।"
"तो टोकन कह रहा है — कुछ होने वाला है।"
मैंने टोकन जेब में रखा। "सुबह जल्दी आए।"
रात कटी। सुबह पाँच बजे आसमान में पहली रोशनी आई। राजेंद्र ने सिपाहियों को हटाया और हमने चाय बनाई। छह बजे बंसी की दुकान से छोटू आया, हाथ में एक थैला था।
"बंसी चाचा," छोटू ने कहा, "सुबह मैं दुकान खोलने गया तो शटर के नीचे ये था।"
थैले में एक पीली लिफ़ाफ़ा था। मैंने खोला। अंदर एक छोटा काग़ज़ था, जिस पर सिर्फ़ एक लाइन थी — "आज दस बजे दीवार खुलेगी — पर उसकी अंदर वाली परत पहले ही खुल चुकी है।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"किसकी लिखाई है?" राजेंद्र ने पूछा।
"पहचान नहीं," मैंने कहा। "पर ये जानता है कि कल रात क्या हुआ।"
बंसी ने थैला उलटा किया। उसमें से एक तिनका गिरा। और एक छोटा सा पीतल का टुकड़ा — बिना किसी निशान का।
"ये तो…" बंसी ने टुकड़ा उठाया।
"हाँ," मैंने कहा। "टोकन जैसा। पर अधूरा।"
मैंने टोकन जेब से निकालकर दोनों को पास रखा। वो टुकड़ा हिला नहीं। गरम नहीं हुआ। जैसे वो ज़िंदा न हो।
"ये टोकन नहीं," मैंने कहा। "ये कोई और चीज़ है।"
"या कोई भेजने वाला चाहता है कि हम यही समझें," राजेंद्र ने कहा।
छह बजे मैंने सुमन को फ़ोन किया। उसने कहा कि जज साहब ने दस बजे का वक़्त पक्का कर दिया है और टीम साढ़े नौ बजे हवेली पहुँचेगी। मैंने उसे पीली लिफ़ाफ़े की बात बताई।
"मन्नू," सुमन ने कहा, "ये लिफ़ाफ़ा कोई भवानी का आदमी नहीं भेजेगा। भवानी तो चाहता है कि दीवार पुती रहे। जो लिफ़ाफ़ा भेज रहा है, वो चाहता है कि तू आज दीवार खोले।"
"तो वो कौन है?"
"वही," सुमन ने कहा, "जो कल अदालत में आने वाला है।"
सात बजे मैंने बंसी को दुकान की चाबी दी।
"तू जा," मैंने कहा, "और देख — उस पीली लिफ़ाफ़े को किसने शटर के नीचे रखा।"
बंसी गया। आठ बजे लौटा। उसके हाथ में एक और काग़ज़ था — छोटा, मुड़ा हुआ।
"कुछ नहीं मिला," बंसी ने कहा। "न किसी ने देखा। पर दुकान के पीछे वाली गली में ये पड़ा था।"
मैंने काग़ज़ खोला। उस पर सिर्फ़ एक नाम था — "बाबूलाल।"
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। "बाबूलाल। हवेली का पुराना चौकीदार। जो कल रात ये सब देख रहा था।"
"तो ये उसने भेजा है?" बंसी ने कहा।
"या उसका नाम कोई और भेज रहा है," मैंने कहा।
नौ बजे हम अदालत के बाहर थे। टीम आ चुकी थी। जज का मुंहलगा, दो गवाह, चार सिपाही और एक राजमिस्त्री। सक्सेना भी आए थे, हाथ में फ़ाइल।
"टीम तैयार है," सक्सेना ने कहा। "अब चलें?"
मैंने उन्हें रात की बात बताई। सक्सेना ने सुना और दीवार के पास गए। उन्होंने गीला सीमेंट देखा, फिर राजेंद्र की गई कील देखी।
"ये कील अंदर है," सक्सेना ने कहा। "मतलब ऊपर की परत पतली है। राजमिस्त्री — यहाँ से हटाओ।"
राजमिस्त्री ने हथौड़ी उठाई। पहली चोट पर सीमेंट उखड़ा। दूसरी पर ईंट निकली। तीसरी पर — कुछ और।
"रुको," सक्सेना ने हाथ उठाया। "ये दीवार के अंदर एक और दीवार है। पुरानी ईंटें।"
मैं आगे बढ़ा। मेरी जेब में टोकन अब गरम था। मैंने उसे निकाला। उस पर नई लकीर के साथ एक शब्द उभरा — "खोल।"
"खोलो," मैंने कहा।
राजमिस्त्री ने हथौड़ी चलाई। ईंटें एक-एक करके गिरीं। दसवीं ईंट के पीछे एक अंधेरा खाँचा दिखा। मैंने हाथ डाला। अंदर एक छोटा संदूक था, लकड़ी का, जिस पर ज़ंग लगी थी।
मैंने उसे बाहर निकाला। सक्सेना ने देखा और कहा — "इसे अदालत में खोला जाएगा।"
"नहीं," मैंने कहा। "इसे यहीं खोलेंगे। सबके सामने।"
सक्सेना कुछ सोचकर रुके, फिर बोले — "ठीक है। पर हर चीज़ की फ़ोटो जाएगी।"
संदूक में एक मोटी पीली फ़ाइल थी, जिस पर लिखा था — "हवेली का चौथा हिस्सा — कौशल्या।" और उसके नीचे एक लिफ़ाफ़ा, जिस पर सिर्फ़ दो शब्द — "मेरे बेटे के लिए।"
मेरे हाथ काँपे। मैंने फ़ाइल खोली। अंदर एक पुराना काग़ज़ था, मुहर लगा हुआ, और उस पर साफ़-साफ़ लिखा था — "यह हिस्सा उस औरत का है जिसे किसी काग़ज़ में जगह नहीं मिली। जो इसे पढ़े, वो इसे उसके बेटे को दे।"
"कौशल्या," सक्सेना ने कहा। "तेरी माँ।"
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