The Token System – Chapter 983
"ये निशान…" मैंने कहा।
"वही," सुमन ने कहा। "जो हवेली की दीवार पर है।"
पापा उठे और खिड़की के पास गए। "तो मोहन लाल का बेटा भवानी के होम में मरा, और उसके काग़ज़ पर ये निशान — यानी मोहन लाल सिर्फ़ गवाह नहीं। वो उस हिसाब का भी गवाह है जो इस शहर में चलता आया है।"
"तभी उसने काग़ज़ चालीस साल संभाला," मैंने कहा।
मैंने रसीद वापस सुमन को दी और अपना काग़ज़ संभालकर जेब में रखा।
"अब चलते हैं," मैंने कहा। "हवेली तैयार करनी है।"
शाम को हवेली पहुँचे तो आसमान पर बादल थे। राजेंद्र के दो सिपाही बाहर गेट पर खड़े थे। बंसी ने अंदर जाकर लालटेन जलाई। मैंने हवेली की पहली मंज़िल पर वो कमरा देखा जहाँ दीवार थी — वही उत्तर वाली दीवार, जिस पर कोना-चिह्न और तीन लकीरें खुदी थीं। मैंने हाथ लगाया। ईंटें सख़्त थीं, पर जहाँ लकीरें थीं, वहाँ गारा थोड़ा ढीला लगा।
"यहाँ से शुरू करेंगे कल," बंसी ने कहा।
"कल नहीं," मैंने कहा। "कल अदालत खोदेगी। आज रात हम सिर्फ़ पहरा देंगे।"
हम नीचे आए। बंसी ने चारपाई बिछाई, मैं दरवाज़े के पास बैठा। रात के ग्यारह बजे थे जब दरवाज़े पर खटखट हुई। राजेंद्र ने दरवाज़ा खोला। बाहर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था, सफ़ेद दाढ़ी, कंधे पर कंबल, हाथ में लाठी। वही जो सुबह गली में मिला था।
"मैं मोहन लाल का भाई हूँ," उसने कहा। "श्यामलाल।"
मैं खड़ा हो गया। "श्यामलाल? वो जो अदालत से भागा था?"
"हाँ," उसने कहा। "वही। पर मैं भवानी का आदमी नहीं हूँ। मैं उसका आदमी था, जब उसे लगता था कि हवेली का हिसाब उसके हाथ में है। जब मुझे पता चला कि भवानी ने मेरे भाई के बेटे का काग़ज़ बदला, मैं चला आया।"
"कल अदालत में आओ," मैंने कहा। "वहाँ सब बोलना।"
"मैं आऊँगा," उसने कहा। "पर पहले एक बात सुनो। भवानी ने आज रात कुछ लोगों को हवेली की तरफ़ भेजा है। वो दीवार नहीं तोड़ेंगे — वो दीवार के सामने कुछ रखेंगे।"
"क्या?"
"एक संदूक," श्यामलाल ने कहा। "जिसमें ऐसी चीज़ें हैं जो कल जज के सामने रखी जाएँगी, और जो साबित करेंगी कि दीवार तुमने खोदी, भवानी ने नहीं।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। "कब?"
"अभी," श्यामलाल ने कहा। "वो रास्ते में हैं।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
"बंसी," मैंने कहा, "लालटेन लेकर पीछे की गली में जा। राजेंद्र, तू सामने रह। मैं छत पर जाता हूँ।"
हम भागे। मैं सीढ़ियों से छत पर पहुँचा, और वहाँ से पीछे की गली दिख रही थी। दो आदमी एक संदूक उठाए आ रहे थे। उनके पीछे एक तीसरा था — सफ़ेद कुर्ता, हाथ में मशाल।
मैंने नीचे देखा। बंसी लालटेन लेकर गली के मोड़ पर खड़ा था।
"रुको!" बंसी ने कहा। "हवेली का पिछला रास्ता बंद है आज रात।"
आदमी रुके। मशाल वाले ने मशाल ऊपर उठाई।
"ये संदूक रखकर जाएँगे," उसने कहा। "वरना जला देंगे।"
मैंने छत से पुकारा। "जलाओ! पर याद रखना — हवेली में आग लगी तो पहले तुम्हारा ही आदमी अंदर फँसेगा।"
मशाल वाले ने ऊपर देखा। मेरी आवाज़ पहचानी। "मनोहर?"
"हाँ," मैंने कहा। "और मेरे पास अदालत का आदेश है। अगर तुमने संदूक यहाँ रखा, तो कल जज साहब देखेंगे कि संदूक किसने लाया। तुम्हारा नाम लिखा होगा उस पर।"
मशाल वाले ने संदूक उठाने वालों को इशारा किया। वो रुके। फिर उन्होंने संदूक वापस उठाया और पीछे मुड़कर भागे। मशाल वाला भी गया, पर जाते-जाते दीवार पर मशाल मारकर गया — ईंटें काली पड़ गईं, चिंगारी उड़ी।
मैं नीचे दौड़ा। बंसी ने आग बुझाई। राजेंद्र ने सिपाहियों को भेजा। मैंने दीवार देखी। जहाँ मशाल लगी थी, वहाँ गारा और ढीला हो गया था।
"अब कल जल्दी खुलेगी," बंसी ने कहा।
श्यामलाल दरवाज़े पर खड़ा था। मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तुमने सही बताया," मैंने कहा। "कल अदालत में आना।"
रात के तीन बजे मैं दरवाज़े पर बैठा था। बंसी चारपाई पर पड़ा था, आँखें खुली। टोकन मेरी जेब में हल्का गरम था। मैंने निकाला। उस पर एक नई लकीर उभर रही थी, और उसके नीचे एक शब्द — "सुबह।"
"सुबह," मैंने धीरे से कहा।
बंसी ने करवट बदली। "क्या?"
"टोकन कह रहा है — सुबह।"
बंसी मुस्कुराया। "तो सुबह होगी।"
मैंने टोकन जेब में रखा और दरवाज़े की तरफ़ देखा। आसमान में थोड़ी रोशनी आ रही थी। पक्षी बोलने लगे थे।
सुबह छह बजे राजेंद्र ने गाड़ी भेजी। मैंने काग़ज़ जेब में रखा, टोकन संभाला, और हवेली का दरवाज़ा खोला।
बाहर गली में श्यामलाल खड़ा था, हाथ में लाठी, कंधे पर वही कंबल।
"अदालत चलें?" उसने पूछा।
"चलें," मैंने कहा।
गाड़ी चली। पीछे हवेली रह गई — सुबह की हल्की रोशनी में उसकी छत पर बबूल का पेड़ काँप रहा था, और दीवार पर वो जली हुई जगह, जहाँ मशाल लगी थी, ऐसे दिख रही थी जैसे हवेली ख़ुद अपना घाव दिखा रही हो।
बंसी ने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा।
"दस बजे जो दीवार खुलेगी," उसने कहा, "उसमें क्या मिलेगा, तुझे पता है?"
"नहीं," मैंने कहा।
"तो उस पर्ची की बात सोच," बंसी ने कहा। "'जो तेरा है, वह दीवार में है।'"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन वहाँ था, ठंडा, चुप। मैंने कुछ नहीं कहा। गाड़ी अदालत की तरफ़ मुड़ी, और मैं अपनी खिड़की से देखता रहा — सुबह की सड़क पर दो आदमी सफ़ेद कुर्ते में, एक कोने पर खड़े, हमारी गाड़ी को जाता हुआ देख रहे थे।
॥
गाड़ी अदालत की सड़क पर भाग रही थी और मेरे सामने वो दो सफ़ेद कुर्ते वाले कोने पर खड़े थे। बंसी ने भी देखा।
"ये दोनों वही हैं," बंसी ने कहा। "जो रात हवेली की गली में खड़े थे।"
"हमारी गाड़ी देख रहे हैं," मैंने कहा। "मतलब हवेली में कुछ होने वाला है।"
राजेंद्र ने गाड़ी रोकी। "अदालत जाना है या हवेली?"
मैंने टोकन जेब में छुआ। वो ठंडा था, चुप। मैंने सोचा — दस बजे दीवार खुलेगी, टीम आएगी, गवाह आएँगे। पर अगर रात में हवेली में कुछ गड़बड़ हुई, तो दस बजे क्या खुलेगा?
"हवेली," मैंने कहा।
राजेंद्र ने गाड़ी पलटी और हम वापस हवेली की तरफ़ चले। वो दोनों आदमी गाड़ी देखकर टेढ़े मुड़े और भागे नहीं, सीधे खड़े रहे — जैसे इंतज़ार कर रहे हों कि हम क्या करते हैं।
हवेली पहुँचते ही मैंने बंसी को बुलाया।
"तू आँगन में बैठ। सुबह तक यहीं। राजेंद्र, तू कुएँ के पास।"
"और तू?" बंसी ने पूछा।
"मैं अंदर, दीवार के पास। जहाँ मशाल लगी थी।"
"अकेला?" बंसी ने भौंहें चढ़ाईं।
"टोकन मेरे पास है," मैंने कहा। "और अब मैं जानता हूँ — ये दीवार क्या है।"
राजेंद्र ने कुएँ के पास जाकर लालटेन जलाई। मैं अंदर गया। हवेली के अंदर हवा ठंडी थी, पर दीवार के उस हिस्से से, जहाँ मशाल मारी गई थी, जली हुई गंध आ रही थी। मैंने अपनी चादर बिछाई और दीवार के सामने बैठ गया। बंसी आँगन में बैठा, राजेंद्र बाहर। रात के दो बजे होंगे।
मैंने टोकन निकाला। वो हल्का ठंडा था। कई दिनों बाद। मैंने उसे हथेली पर रखकर देखा। कोई शब्द नहीं। कोई लकीर नहीं। सिर्फ़ ठंडा।
मुझे लगा — कहीं ऐसा तो नहीं कि टोकन कह रहा हो, अब हिसाब का कोई काम नहीं बचा। मैंने उसे जेब में वापस रखा। बाहर से आवाज़ आई।
बंसी की आवाज़। "राजेंद्र! इधर आ!"
मैं दौड़ा। बाहर आँगन में बंसी दीवार के पास खड़ा था, लालटेन हाथ में। उसकी रोशनी में दीवार दिख रही थी — वो हिस्सा जो रात मशाल से जला था, अब चिकना और गीला था।
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