The Token System – Chapter 982
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "मोहन लाल।"
अस्पताल के बाहर सड़क सुनसान थी। सफ़ेद गाड़ी दूर जा चुकी थी। पर उसके पीछे की धूल में मैंने एक पीली पर्ची उड़ती देखी। मैंने दौड़कर उठाई। उस पर एक ही लाइन थी।
"कल अदालत में वो आदमी होगा जो तेरे बाप को जानता था। — तीसरा।"
मैंने पर्ची जेब में रखी और बंसी की तरफ़ देखा।
"कल बड़ा दिन है," मैंने कहा।
अस्पताल के गलियारे में टोकन की आवाज़ सी गूँजी, हल्की, दूर से — "कल।"
॥
पीली पर्ची मेरी जेब में थी और सक्सेना का दफ़्तार उसी गली के मोड़ पर। बंसी ने गाड़ी रोकी। मैं सीढ़ियाँ चढ़ा, दरवाज़ा खुला था, और सक्सेना मेज़ पर फैले काग़ज़ों के बीच बैठी थीं, हाथ में एक मोटा शीशा।
"आओ," उन्होंने कहा। "मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी। जज साहब ने फ़ोन किया था।"
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा। सक्सेना ने शीशा काग़ज़ पर रखा और देर तक देखती रहीं, फिर उँगली उस लाइन पर रखी जहाँ माँ के हस्ताक्षर थे।
"ये देखो," उन्होंने कहा। "एक ही काग़ज़ पर दो स्याहियाँ। नीचे वाली स्याही पुरानी है — हल्की, पीली पड़ी हुई। ऊपर वाली स्याही नई है — काली, चमकदार। भवानी के हस्ताक्षर ऊपर वाली स्याही से बने हैं।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि ये काग़ज़ पहले लिखा गया था, और भवानी के दस्तख़त बाद में जोड़े गए।" उसने शीशा हटाया। "और देखो — ऊपर वाले हस्ताक्षर के नीचे काग़ज़ थोड़ा सा खुरचा हुआ है। किसी ने पहले कुछ मिटाया है, फिर उसके ऊपर भवानी का नाम लिखा है।"
मेरा दिल तेज़ चलने लगा। "यानी नीचे किसी और का नाम था?"
"हाँ," सक्सेना ने कहा। "और वो नाम अब भी ज़रा-सा दिख रहा है। शीशे से देखो — 'कौ' वाले अक्षर की एक लकीर बची है।"
मैंने शीशे से देखा। हल्की, फीकी सी एक लकीर थी, जो 'कौ' से 'ख' की तरफ़ जाती थी।
"कौशल्या," मैंने धीरे से कहा।
"तुम्हारी माँ," सक्सेना ने कहा। "जिसने आठ साल पहले इस काग़ज़ पर हस्ताक्षर किए थे, और उसके ऊपर भवानी ने अपना नाम जोड़ दिया। अब ये काग़ज़ अकेला सबूत नहीं है — ये ख़ुद भवानी के ख़िलाफ़ गवाह है।"
"पर एक बात है," मैंने कहा। "अगर भवानी ने हस्ताक्षर ख़ुद जोड़े, तो उसे पता था कि उसका हक़ कहाँ नहीं है। फिर भी उसने ये काग़ज़ जज के पास भेजा?"
सक्सेना मुस्कुराईं। "उसने सोचा होगा कि जज सिर्फ़ नाम देखेगा, स्याही नहीं। भवानी आदमियों को खरीदता आया है, काग़ज़ नहीं पढ़ता।"
वो उठीं और अलमारी से एक मोटी फ़ाइल निकाली।
"अब दूसरी बात सुनो," उन्होंने कहा। "काग़ज़ तो सबूत है, पर हवेली की दीवार में जो है, उसके बिना ये अधूरा है। जज साहब ने मेरी अर्ज़ी मंज़ूर कर ली है। कल सुबह दस बजे अदालत की टीम, दो गवाह और पुलिस — सब हवेली पर होंगे। दीवार खुलेगी, और जो भी मिलेगा, वो सीधे अदालत जाएगा।"
"कल सुबह दस बजे?"
"हाँ। पर एक शर्त है — आदेश में लिखा है, दीवार खोदने से पहले उस कमरे की सारी चीज़ें वैसी ही रहनी चाहिए। एक ईंट भी इधर-उधर नहीं।"
"मैं समझ गया," मैंने कहा। "कल सुबह तक हवेली में कोई नहीं घुसेगा।"
सक्सेना ने फ़ाइल बंद की और मेरी तरफ़ देखा, आँखें सिकोड़कर।
"मनोहर," उन्होंने कहा। "एक बात मान लो। भवानी आज रात कुछ भी कर सकता है। वो जानता है कि कल सुबह उसका सब कुछ खत्म हो जाएगा। ऐसे आदमी को हारने से पहले कोई डर नहीं रहता।"
"तो?"
"तो आज रात हवेली में रहना। पहरा लगाना। कोई भी आए, उसे अंदर मत आने देना — और अगर ज़रूरत पड़े तो राजेंद्र को बुला लेना।"
"मैं यही सोच रहा था," मैंने कहा।
"और एक बात," सक्सेना ने कहा। "जो आदमी कल अदालत में आने वाला है — जो तुम्हारे बाप को जानता था — उसका पता लगाओ। अगर वो सच बोलेगा, तो भवानी का आख़िरी सहारा भी टूट जाएगा।"
मैंने सिर हिलाया और काग़ज़ उठाया। सक्सेना ने मेरा हाथ पकड़ा।
"ये काग़ज़ अपने पास रखो। किसी को मत देना। कल अदालत में ख़ुद लाना।"
"और कॉपियाँ?"
"कॉपियाँ जिनके पास हैं, उन्हें बता दो — कल सुबह नौ बजे सब अदालत में हों।"
मैं बाहर निकला। बरामदे में सूरज चढ़ आया था। बंसी नीचे गाड़ी पर बैठा था। मैंने सीढ़ियाँ उतरनी शुरू कीं, तभी सड़क की तरफ़ से एक सफ़ेद गाड़ी आई, धीमी हुई, और उसकी खिड़की से एक लिफ़ाफ़ा बाहर आया। वो हवा में घूमकर मेरे पैरों के पास गिरा। गाड़ी वापस भागी, और उसके पीछे धूल उड़ी।
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। ऊपर कोई नाम नहीं था, बस एक लाइन।
"दीवार खोदने से पहले सोच ले — जो तुझे मिलेगा, वह मेरा है, और जो तेरा है, वह दीवार में है।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो भी लिफ़ाफ़े की तरफ़ देख रहा था।
"किसकी गाड़ी थी?" मैंने पूछा।
"सफ़ेद। नंबर पर धूल। पर गाड़ी पुरानी थी — वही जो मोहल्ले में घूमती है।"
"भवानी की?"
"या उसके किसी का," बंसी ने कहा। "पर सुन, ये लिफ़ाफ़ा सीधा नहीं है। इसमें धमकी नहीं है। इसमें सवाल है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा। "कौन सा सवाल?"
"'जो तेरा है, वह दीवार में है।'" बंसी ने दोहराया। "मतलब वो जानता है कि दीवार में क्या है, और वो चाहता है कि तू सोचे — क्या सचमुच वो चीज़ तेरी है?"
मैं कुछ देर खड़ा रहा। गली के उस पार एक बूढ़ा आदमी जा रहा था, कंधे पर टाट, हाथ में लाठी। वो रुका, मेरी तरफ़ देखा, और फिर चलता बना।
"अब क्या?" बंसी ने कहा।
"अब हवेली," मैंने कहा। "आज रात वहीं रुकना है।"
हम अस्पताल पहुँचे तो सुमन के केबिन में पापा और शेखर बाबू बैठे थे। मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा और सक्सेना की बात सुनाई — स्याही की दो परतें, भवानी के हस्ताक्षर बाद में जोड़े गए, और कल सुबह दस बजे दीवार खुलेगी।
"दस बजे?" पापा ने कहा। "अदालत में तो नौ बजे है।"
"नौ बजे अदालत," मैंने कहा। "और दस बजे हवेली। एक घंटे में सब वहाँ पहुँचना होगा।"
शेखर बाबू ने काग़ज़ उठाया और शीशे से देखा, फिर धीरे से बोले, "भवानी ने अपने हाथ से अपना काम खराब कर दिया है। जिस काग़ज़ को वो जज के पास भेजकर मेरा बयान डुबोना चाहता था, वही उसका बयान डुबोएगा।"
"पर वो आज रात कुछ करेगा," मैंने कहा। "सक्सेना ने चेताया है।"
"तो हम पहले से तैयार रहेंगे," राजेंद्र ने कहा, जो दरवाज़े पर खड़ा था। "मैं दो सिपाही हवेली के बाहर लगा दूँगा। रात भर पहरा।"
"और मैं?" बंसी ने कहा।
"तू मेरे साथ अंदर," मैंने कहा। "अगर दीवार की तरफ़ कोई आया, तो हम पहले होंगे।"
सुमन ने अपनी दराज़ से एक लिफ़ाफ़ा निकाला और मुझे दिया।
"ये मेरे पुराने मरीज़ की कॉपी है," उन्होंने कहा। "जो आदमी कल अदालत में आएगा — अगर वो मोहन लाल का कोई है, तो इसमें उसका नाम मिल सकता है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। पुरानी रसीदें थीं — भवानी के होम की, ग्यारह साल पुरानी। एक रसीद पर नाम था — "सोहन लाल, पुत्र मोहन लाल।"
"सोहन लाल?" मैंने कहा।
"हाँ," सुमन ने कहा। "मोहन लाल का बेटा। जो भवानी के होम में भर्ती था, और जिसकी रसीद पर भर्ती की तारीख़ मुहर से चार दिन बाद की थी।"
"यानी वो पहले भर्ती हुआ, फिर काग़ज़ बना?"
"हाँ," सुमन ने कहा। "और जिस दिन वो मरा, उस दिन मोहन लाल ने काग़ज़ माँगा। उसे नहीं दिया गया।"
मैंने रसीद को ध्यान से देखा। नीचे कोने पर एक छोटा निशान था — दो लकीरें और एक बिंदु। कोना-चिह्न।
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