The Token System – Chapter 981
मैंने काग़ज़ बंसी को दिखाया। उसने पढ़ा, फिर बोला, "तो अब वो तीन दिन किस चक्कर में माँग रहा है? जब उसे पता है कि उसका काग़ज़ कुछ नहीं है।"
"क्योंकि वो जानता है कि ये काग़ज़ मेरे पास है," मैंने कहा। "और वो चाहता है कि मैं इसे अदालत में देर से लाऊँ। या लाऊँ ही नहीं।"
शेखर बाबू उठे। "मन्नू, काग़ज़ की एक कॉपी बनवाओ। दो। तीन जगह रखो। ये काग़ज़ अब सबसे ज़रूरी चीज़ है।"
"पहले से ज़रूरी थी," मैंने कहा। "अब सबसे ज़्यादा।"
मैं काग़ज़ की कॉपी कराने गया। अस्पताल के बाहर, सड़क के उस पार, एक चाय की दुकान थी। मैं वहाँ बैठा और नकल करने वाले काग़ज़ों की तरफ़ देखता रहा। बंसी साथ आया और चुपचाप चाय पीता रहा।
"मन्नू," बंसी ने कहा, "एक बात सोच रहा हूँ।"
"क्या?"
"भवानी ने अगर ये काग़ज़ पढ़ा था, तो उसने माँ को क्यों नहीं मरवाया? जब उसे पता था कि माँ का हक़ है?"
मैंने चाय का प्याला रखा। यही सवाल मेरे दिमाग़ में भी था।
"क्योंकि," मैंने धीरे कहा, "माँ ज़िंदा रहना उसके लिए ज़्यादा काम का था। मरी हुई माँ का काग़ज़ किसी और के हाथ लग जाता। ज़िंदा माँ से वो हर वक़्त डरा सकता था, हस्ताक्षर करवा सकता था।"
बंसी ने सिर हिलाया। "तो उसने माँ को ज़िंदा रखा — गिरवी की तरह।"
"हाँ," मैंने कहा। "और माँ को यही डर था। शायद इसीलिए उसने ये काग़ज़ शेखर बाबू के पास छिपाया।"
मैंने कॉपियाँ उठाईं। एक अपनी जेब में, एक बंसी को दी, और एक लिफ़ाफ़े में बंद करके कहा, "ये सुमन को।"
अस्पताल लौटकर मैंने शेखर बाबू को काग़ज़ दिखाया। उन्होंने उसे फिर पढ़ा, बहुत देर तक देखा।
"मन्नू," उन्होंने कहा, "जब भवानी ने ये पढ़ा होगा, तो उसने क्या सोचा होगा?"
"यही कि ये काग़ज़ कभी सामने नहीं आना चाहिए," मैंने कहा।
"और आज ये काग़ज़ जज के पास पहुँच गया है," शेखर बाबू ने कहा। "क्योंकि उसने ख़ुद उसे भेजा है। वो नहीं जानता कि इस पर उसके हस्ताक्षर भी हैं।"
मैं उनकी तरफ़ देखता रहा।
"मैं जानता हूँ," शेखर बाबू ने धीरे कहा, "क्योंकि मैं वहाँ था। आठ साल पहले, उसी कमरे में, जब भवानी ने ये काग़ज़ पढ़ा था और मुझे कहा था — इस पर मेरे दस्तख़त लगा दो।"
"और आपने लगा दिए?" मैंने पूछा।
"नहीं," शेखर बाबू ने कहा। "उसने ख़ुद लगाए और बोला — अब ये काग़ज़ मेरा है। जो इसे पढ़ेगा, मुझसे मिलेगा।"
मैंने टोकन निकाला। वो ठंडा था, पर उस पर नई लकीर बनी थी। मैंने उसे ध्यान से देखा। एक नया शब्द उभर रहा था — "पढ़।"
मैंने टोकन शेखर बाबू को दिखाया। वो नहीं समझे। "क्या है ये?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "कुछ सोच रहा था।"
बाहर गलियारे में पैरों की आहट आई। बंसी दौड़कर आया।
"मन्नू, बाहर फिर वो सफ़ेद गाड़ी है। और इसमें से एक आदमी उतरा है।"
मैं खिड़की के पास गया। गाड़ी से एक आदमी उतरा, बहुत बूढ़ा, सफ़ेद बाल, टोपी, हाथ में लाठी। उसकी लाठी पर छोटा उलटा कोना-चिह्न था। वो लंगड़ाकर सामने की तरफ़ आ रहा था।
शेखर बाबू ने जैसे पहचान लिया। "ये तो मोहन लाल है।"
"कौन?"
"वही जिसने काग़ज़ लिखा था — भवानी के बाप के ज़माने का मुंशी। सत्तर के ऊपर, चश्मा, मोटी किताब।" उन्होंने काग़ज़ की तरफ़ देखा। "मन्नू, ये काग़ज़ उसने ही लिखा था।"
"अंदर मत आने देना," बंसी ने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "आने दो। चलो बाहर चलें।"
हम बाहर निकले। मोहन लाल ने मुझे देखकर ठहर गया। उसके चश्मे के पीछे आँखें पानी से भरी थीं।
"मनोहर," उसने कहा। "मैं तुम्हारा बाप का दोस्त हूँ।"
"सब दोस्त ही हैं," मैंने कहा। "जिसने काग़ज़ लिखा, वो कबूल करे — ये जो काग़ज़ है, ये भवानी के पास कैसे पहुँचा?"
मोहन लाल ने लाठी टिकाई और कुछ देर साँस लेता रहा।
"मैंने लिखा," उसने कहा। "तेरे दादा के कहने पर। काग़ज़ में तेरी माँ का हक़ लिखा। पर तेरे बाप के जाने के बाद भवानी ने मुझे बुलाया। मेरी बेटी की शादी रुकवा दी। बोला — काग़ज़ दे दे, वरना सब मिटा दूँगा।"
"तो आपने दे दिया?"
"हाँ," उसने कहा। "मैं डर गया। पर जो काग़ज़ मैंने दिया, वो नक़ल थी। असली मैंने छिपा दिया था।"
मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। वो चुप थे।
"असली कहाँ है?" मैंने पूछा।
मोहन लाल ने अपनी लाठी उठाई। हैंडल खोला। अंदर से एक पीली लिपटी चीज़ निकाली।
"असली यही है," उसने कहा और मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पर मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस, याद रखना — तू जितना काग़ज़ खींचेगा, भवानी उतना ही ज़ोर लगाएगा। वो काग़ज़ों का नहीं, आदमियों का खेल खेलता है।"
मैंने असली काग़ज़ लिया। हाथ में पकड़ते ही टोकन जेब में ठंडा हुआ। मैंने देखा — शब्द "पूरा" मिटने लगा था, और एक नई लकीर उभर रही थी।
"ये काग़ज़," मोहन लाल ने कहा, "तेरे दादा की पहचान है। मैंने इसे चालीस साल संभाला। अब तेरे हवाले।"
वो मुड़ा। लाठी टेकता हुआ गाड़ी तक गया। गाड़ी का दरवाज़ा खुला। वो बैठा। गाड़ी चली गई।
मैंने काग़ज़ खोला। माँ के हस्ताक्षर, फिर वो लाइन जो मैंने पहले देखी थी — "अगर भवानी ने पढ़ा, तो वो जान जाएगा कि उसका हक़ कहाँ नहीं है।" और उसके नीचे, बहुत छोटी लिखाई में, मोहन लाल का नाम और तारीख़।
"शेखर बाबू," मैंने कहा, "इस पर मोहन लाल के हस्ताक्षर भी हैं।"
"तो गवाह अब पूरा है," शेखर बाबू ने कहा। "तुम्हारे पास काग़ज़ है, गवाह है, और भवानी के हस्ताक्षर वाला काग़ज़ भी।"
"पर वो अदालत में है," मैंने कहा। "जज के पास।"
"अदालत में जो है, वो सबका है," शेखर बाबू ने कहा। "भवानी ने गलती की है। उसने सोचा कि काग़ज़ अपने पास रख के वो मर्डर कर देगा। पर उसने ये नहीं सोचा कि काग़ज़ में उसके हस्ताक्षर भी हैं, और अब वो ख़ुद बताएँगे कि भवानी इस काग़ज़ को पहले से जानता था।"
मैं उसी वक़्त सुमन का केबिन छोड़कर बाहर आया। सुमन का फ़ोन बजा। उसने उठाया, सुना, और चेहरा गंभीर हो गया।
"मन्नू," उसने कहा, "जज साहब का फ़ोन है।"
मैंने फ़ोन लिया।
"मनोहर," जज की आवाज़ थी। "तुमने मुझे काग़ज़ दिया था। उस पर भवानी के हस्ताक्षर हैं। तुमने देखा?"
"अभी देखा।"
"मुझे बताना चाहिए," जज ने कहा। "सुनवाई टली ज़रूर है, पर काग़ज़ की जाँच मैंने शुरू करवा दी है। तीन दिन नहीं। कल सुबह नौ बजे।"
मेरा दिल धड़का।
"कल?"
"कल," जज ने कहा। "क्योंकि अगर काग़ज़ पर भवानी के हस्ताक्षर हैं, तो ये एक नया मोड़ है। और इसका फ़ैसला जल्दी चाहिए।"
फ़ोन कटा। मैंने सुमन की तरफ़ देखा।
"कल सुबह नौ बजे," मैंने कहा।
बंसी ने चाय का प्याला नीचे रखा और मुस्कुराया। "देख, तू चाहता था कुछ जो काट दे। तेरा ही काग़ज़ उसके पैर काट रहा है।"
शेखर बाबू उठे। "मैं कल अदालत में होऊँगा। कोई मुझे रोक नहीं सकता।"
मैं और बंसी बाहर निकले। सड़क की धूल में सूरज चढ़ रहा था। मैंने टोकन जेब से निकाला। उस पर नई लकीर पर शब्द उभर रहा था — "कल।"
"अब?" बंसी ने कहा।
"अब," मैंने कहा, "हमें अदालत में खड़े होने से पहले एक आख़िरी चीज़ चाहिए। ऐसा आदमी जो कहे कि उसने भवानी के हाथ से वो काग़ज़ लिया था। एक ज़िंदा गवाह, जो भवानी के दस्तख़त लगते वक़्त वहाँ था।"
बंसी ने सिर घुमाया। "कौन?"
मैंने टोकन की तरफ़ देखा। वो गरम था, पर कुछ नहीं बोला।
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