The Token System – Chapter 980
पर मैं खुद नहीं सोया। मैंने दादा की किताब अपने सीने से लगाई और खिड़की के पास बैठ गया।
सफ़ेद गाड़ी रात भर वहीं खड़ी रही। और सुबह चार बजे, जब मैंने खिड़की से देखा, तो गाड़ी के बोनट पर एक पीला काग़ज़ चिपका था।
मैं बाहर गया। काग़ज़ उठाया। उस पर उलटा कोना-चिह्न था और एक लाइन — "काग़ज़ पर लिखी लाइन से हिसाब नहीं मिटता। हिसाब मिटता है खून से।"
मैंने काग़ज़ मुड़ाकर जेब में डाला। पीछे मुड़ा तो माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।
"क्या है?" माँ ने कहा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "सिर्फ़ डर।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "डर अच्छा है," माँ ने कहा। "डर वाला आदमी सोचता है।"
मैंने सिर हिलाया और अंदर चला गया।
सुबह दस बजे अदालत में जो होने वाला था — वो सिर्फ़ हवेली का फ़ैसला नहीं था। वो माँ की उस लाइन का फ़ैसला था जो उन्होंने बीस साल पहले जल्दबाज़ी में लिखी थी। और वो लाइन आज भवानी के पूरे साम्राज्य को हिला देने वाली थी।
पर सुबह सात बजे सुमन का फ़ोन आया। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"मन्नू, अदालत का आदेश आया है। जज साहब ने सुनवाई टाल दी है।"
"क्या?"
"भवानी ने अर्ज़ी डाली है — नया सबूत है। काग़ज़ की सच्चाई जाँचने के लिए तीन दिन का वक़्त चाहिए।"
मेरी मुट्ठी भिंच गई।
"तीन दिन?" मैंने कहा। "ये तो बस काग़ज़ ख़त्म करने का बहाना है।"
"हाँ," सुमन ने कहा। "और सबसे बुरी बात — भवानी ने वो काग़ज़ जज को सौंप दिया है। हमारे पास अब सिर्फ़ शेखर बाबू की गवाही है। काग़ज़ जज के पास है।"
मेरा दिमाग़ सुन्न हो गया। बीस साल की मेहनत, एक लाइन, एक काग़ज़ — और अब वो सब जज के पास।
"मन्नू, सुन रहा है?"
"हाँ," मैंने कहा। "सुन रहा हूँ।"
मैंने खिड़की से बाहर देखा। सफ़ेद गाड़ी अब भी खड़ी थी।
"सुमन," मैंने कहा। "तीन दिन में हमें कुछ और चाहिए। कुछ ऐसा जो भवानी के नए सबूत को काट दे।"
"क्या?"
मैंने टोकन जेब से निकाला। वो गरम था।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर टोकन जानता है।"
॥
अस्पताल का गलियारा सुबह-सुबह खाली था, पर सुमन के केबिन के बाहर एक जोड़ी जूते चमक रहे थे। बंसी ने मेरी कलाई पकड़ी और धीरे से बोला, "रुक, अंदर कोई है।"
मैंने दरवाज़े की झिरी से झाँका। शेखर बाबू कुर्सी पर बैठे थे, हाथ गोद में, चश्मा नाक पर। उनके सामने एक आदमी झुका खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, चमड़े का ब्रीफ़केस, और उँगली पर वही पीली पत्थर की अँगूठी। वकील। मैंने उसे अदालत की सीढ़ियों पर देखा था, भवानी के साथ।
"इस पर हस्ताक्षर कर दो, शेखर बाबू," वकील बोल रहा था, आवाज़ में मीठा ज़हर। "सिर्फ़ एक काग़ज़ है। बयान वापस। कह दो कि दबाव में दिया था। बेटी की शादी है — सोचो।"
शेखर बाबू ने कुछ नहीं कहा।
"ठाकुर साहब नाराज़ न हों, इसलिए कह रहा हूँ। आपकी बेटी का रिश्ता भी उन्हीं के हाथ में है।"
मैंने दरवाज़ा खोला। "शेखर बाबू अब किसी के दबाव में हस्ताक्षर नहीं करेंगे।"
वकील घूमा। मुझे देखकर उसके चेहरे पर झुंझलाहट आई, पर आवाज़ वही रही। "मनोहर जी। बीच में मत आओ। ये पारिवारिक बात है।"
"पारिवारिक?" मैंने कहा। "काग़ज़ पर हस्ताक्षर करवाने आए हो और पारिवारिक कह रहे हो?"
"तुम्हारी बहन की शादी भी तो रुक सकती है," वकील ने काग़ज़ ब्रीफ़केस से निकालते हुए कहा। "सोच लो।"
बंसी ने पीछे से कहा, "भाई साहब, शादी हमारी रुके या चले — हस्ताक्षर आपके नहीं होने।"
वकील ने बंसी को देखा, फिर शेखर बाबू को। "आख़िरी बार पूछ रहा हूँ।"
शेखर बाबू उठे। उनका हाथ काँप रहा था, पर आवाज़ साफ़ थी। "मैंने आज तक जो किया, उसका हिसाब बाकी है। अब मैं किसी के कहे पर हस्ताक्षर नहीं करूँगा।"
वकील का चेहरा कठोर हुआ। "अच्छा।" उसने काग़ज़ ब्रीफ़केस में रखा। "तो अदालत में मिलते हैं।" वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा, मेरे पास रुका और धीरे से बोला, "तेरे पास तीन दिन हैं, मनोहर। तीन दिन बाद जो काग़ज़ जज के पास है, वो भवानी साहब का होगा। तेरा कुछ नहीं बचेगा।"
वो चला गया। दरवाज़ा बंद हुआ। कमरे में सन्नाटा था।
शेखर बाबू फिर कुर्सी पर बैठ गए और कुछ देर छत की तरफ़ देखते रहे। फिर बोले, "बैठो, मन्नू।"
मैं बैठ गया। बंसी दरवाज़े के पास खड़ा रहा।
"मैंने तुमसे कहा था न, कि मेरे पास एक काग़ज़ है," शेखर बाबू ने कहा। "वो काग़ज़ मैंने छिपाया था। आठ साल। और यही वजह है कि भवानी मुझे आठ साल से डरा रहा था।"
"कौन सा काग़ज़?" मैंने पूछा।
"तेरी माँ के हस्ताक्षर वाला।" उन्होंने चश्मा उतारा और आँखें मलीं। "रिकॉर्ड कमरे में, पुरानी फाइलों के पीछे, एक लोहे के दराज़ में। मेरी ही मेज़ की चाबी से खुलता है। पर आज वो खोलेंगे — तुम। मैं नहीं। अब मैं उस दराज़ को छूना नहीं चाहता।"
हम उठे। बंसी ने कहा, "मैं साथ चलूँ?"
"तुम बाहर रुको," मैंने कहा। "अगर वो फिर आया, तो फोन करना।"
शेखर बाबू ने मुझे अपनी कुर्सी की छोटी चाबी दी। "तीसरी मंज़िल, पीछे का कमरा। फाइलों का ढेर है। दराज़ सबसे नीचे, दीवार की तरफ़।"
मैं निकल पड़ा।
रिकॉर्ड कमरे में पुरानी फाइलों की गंध थी — धूल और स्याही। मैंने ढेर हटाए। सबसे नीचे का दराज़ ज़ंग खा रहा था। चाबी घुमाई, दराज़ खुला। अंदर कुछ फाइलें, और एक मोटा पीला लिफ़ाफ़ा।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक ही काग़ज़ था, दो बार मुड़ा। मैंने खोला और उँगलियाँ ठंडी हो गईं।
काग़ज़ के नीचे माँ के हस्ताक्षर थे। वही हस्ताक्षर जो मैंने उस काग़ज़ पर देखे थे जो शेखर बाबू ने दिया था। पर इस काग़ज़ पर ऊपर एक और हस्ताक्षर था — ठाकुर भवानी सिंह। और पास में तारीख़ — आठ साल पुरानी। उसी महीने की, जिस महीने पापा गए थे।
यानी भवानी ने ये काग़ज़ पहले भी पढ़ा था। उसने इसे हाथ में लिया था। और फिर वापस रख दिया — जानबूझकर। क्यों?
मैंने काग़ज़ ध्यान से पढ़ा। दो हिस्सों में बँटा था। ऊपर वाला हिस्सा हवेली के चौथे हिस्से के बारे में था — जो माँ के नाम। नीचे एक लाइन थी, माँ की लिखाई में, जो मैंने पहले नहीं देखी थी।
"अगर मेरे बेटे ने ये काग़ज़ पढ़ा, तो वो जान जाएगा कि उसका हक़ कहाँ है। और अगर भवानी ने पढ़ा, तो वो जान जाएगा कि उसका हक़ कहाँ नहीं है।"
मेरे हाथ काँपे। माँ ने ये काग़ज़ ऐसे लिखा था कि जो भी पढ़े, उसकी नीयत खुल जाए। भवानी ने पढ़ा और समझ गया — उसका हक़ हवेली में कहीं नहीं था। इसलिए उसने ये काग़ज़ कभी सामने नहीं आने दिया। उसने इसे ज़ब्त कर लिया। पर शेखर बाबू ने एक कॉपी बचा ली थी।
यानी भवानी आठ साल से जानता था। आठ साल से वो एक ऐसे काग़ज़ के डर पर जी रहा था जो उसके अपने हाथ में था।
मैं काग़ज़ लेकर केबिन लौटा। शेखर बाबू ने मुझे देखा और चेहरा पढ़ लिया।
"मिल गया?" उन्होंने पूछा।
"मिल गया," मैंने कहा। "और शेखर बाबू, इस पर भवानी के हस्ताक्षर भी हैं। वो इसे पढ़ चुका है।"
शेखर बाबू कुछ देर सन्न बैठे रहे। फिर धीरे बोले, "तो वो जानता था।"
"जानता था," मैंने कहा।
"और फिर भी आठ साल मुझे डराता रहा," शेखर बाबू ने कहा। "मुझे डराता रहा, जबकि उसके पास ये काग़ज़ था ही नहीं।"
बंसी अंदर आया। "क्या हुआ?"
"भवानी के पास हवेली का हक़ कभी नहीं था," मैंने कहा। "और वो ये बात आठ साल से जानता था।"
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