The Token System – Chapter 979
दो मिनट बाद केबिन का दरवाज़ा खुला और सुमन की आवाज़ आई — ऊँची, साफ़।
"मैं डॉक्टर हूँ और मुझे मरीज़ की जाँच करनी है। ये आदेश है। अगर आप इसे नहीं मानेंगे, तो मैं मुख्य अधिकारी को फ़ोन करूँगी।"
वकील की आवाज़ आई — "डॉक्टर साहिबा, हम बस एक छोटा काम—"
"काग़ज़ वाला काम अब नहीं होगा। मरीज़ का ब्लड प्रेशर गिर रहा है।"
मैंने राजेंद्र को इशारा किया। हम तेज़ी से अंदर बढ़े।
केबिन में घुसते ही वकील ने हमें देखा। उसकी आँखें फैल गईं।
"ये कौन है?" वकील ने कहा।
"मैं?" मैंने कहा। "मैं वो हूँ जिसका नाम उस काग़ज़ पर लिखा है जिस पर आप ज़बरदस्ती हस्ताक्षर करवा रहे हैं।"
शेखर बाबू कुर्सी पर बैठे थे। उनका चश्मा टूटा हुआ था, हाथ काँप रहे थे, सामने मेज़ पर काग़ज़ पड़ा था और स्याही की दवात खुली थी।
"मन्नू," शेखर बाबू ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी।
"आप ठीक हैं?" सुमन ने कहा।
"मैं… मैंने हस्ताक्षर नहीं किए," शेखर बाबू ने कहा। "उन्होंने कहा — भवानी जी का हुक्म है। मैंने कहा — मुझे पहले पढ़ने दो। वकील कहने लगा — ज़्यादा मत सोचो।"
मैंने मेज़ की तरफ़ बढ़ा और काग़ज़ उठाया।
वो पीला काग़ज़ था, किनारे से घिसा। ऊपर लिखा था — हवेली का चौथा हिस्सा, भवानी सिंह के नाम। और नीचे, छोटी बारीक लिखाई में, स्याही के उस पुराने रंग में — "यह सौदा तभी मान्य होगा जब मेरा बेटा ख़ुद आकर हिसाब चुकाए।"
मैंने उसे सुमन को दिखाया। सुमन ने पढ़ा और उसकी साँस रुक गई।
"ये है," सुमन ने कहा। "ये है माँ की लाइन।"
वकील ने आगे बढ़ने की कोशिश की। "ये काग़ज़ भवानी जी की जायदाद का है—"
"रुकिए," राजेंद्र ने कहा। उसने डंडा बीच में कर दिया। "ये काग़ज़ अब थाने की जायदाद है।"
वकील का चेहरा बदल गया। "आपको पता है मैं किसका वकील हूँ?"
"हाँ," राजेंद्र ने कहा। "और मुझे पता है मैं किसका सिपाही हूँ।"
वकील ने अपने दोनों आदमियों की तरफ़ देखा। काले कुर्ते वाला पीछे हट गया। दूसरा दरवाज़े की तरफ़ देखने लगा।
"अभी जाइए," सुमन ने कहा। "वरना मैं फ़ोन करके बुलवाती हूँ।"
वकील ने अपना ब्रीफ़केस उठाया। उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू अभी भी समझता है कि तू जीत गया?"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं अभी भी हिसाब कर रहा हूँ।"
वकील चला गया।
शेखर बाबू ने अपनी कुर्सी से उठने की कोशिश की और सुमन ने उन्हें नीचे बिठाया।
"मन्नू," शेखर बाबू ने कहा। "मुझे माफ़ कर दे। मैंने तुम्हारे पापा के साथ जो किया—"
"बाद में," मैंने कहा। "पहले ये बताइए — ये काग़ज़ कहाँ रखा था सब इन साल?"
"रिकॉर्ड कमरे की उस दराज़ में," शेखर बाबू ने कहा, "जिसकी चाबी भवानी के बाप के पास थी। मैंने एक दिन उसे पीछे से खोल दिया था। उसके बाद से मैं इसे अपने केबिन की दराज़ में रखता आया हूँ।"
"और भवानी को पता नहीं चला?"
शेखर बाबू ने अपना टूटा चश्मा उठाया। "पता चल गया होता, तो आज मैं ज़िंदा न होता।"
राजेंद्र ने काग़ज़ अपनी जेब में रखा। "ये थाने जाएगा।"
"आज नहीं," सुमन ने कहा। "कल सुबह दस बजे अदालत में। जज के सामने। अगर ये अभी थाने जाएगा, तो भवानी का कोई आदमी इसे गायब कर देगा।"
"मैं इसे अपने डायरी के साथ रखूँगा," राजेंद्र ने कहा। "सीलबंद। तीन जगह। ठीक वैसे जैसे मन्नू ने किया था।"
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, एक बात और। वो काग़ज़ जो तेरे पापा ने दादा से छीनकर भवानी के बाप को दिया था — वो असली नहीं था। वो नकली था। असली तेरे पापा के पास है।"
"पता है," मैंने कहा। "दादा की किताब।"
"नहीं, सिर्फ़ किताब नहीं," शेखर बाबू ने कहा। "किताब के साथ एक और काग़ज़ है। हवेली के बँटवारे का पहला पन्ना। जिस पर चारों हिस्सों के नाम हैं। और जिस पर…" शेखर बाबू रुके। "और जिस पर तेरे दादा की लिखाई में ये भी लिखा है — 'जिस दिन मेरा पोता इस काग़ज़ को ख़ुद उठाएगा, उस दिन हवेली का असली हिसाब शुरू होगा।'"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था।
"कल सुबह," मैंने कहा। "दस बजे।"
"पर एक बात," सुमन ने कहा। "भवानी के वकील ने ये काग़ज़ देखा है। वो अब इसको फ़र्ज़ी कहने की तैयारी करेगा। हमें इस काग़ज़ की सच्चाई साबित करनी होगी।"
"शेखर बाबू साबित करेंगे," मैंने कहा।
"मैं?" शेखर बाबू ने काँपते हाथ से अपना टूटा चश्मा पकड़ा।
"आप," मैंने कहा। "आपने ये काग़ज़ बीस साल सम्भाला है। आपने इसे भवानी से छिपाया है। आप ही बताइए — ये असली है?"
शेखर बाबू ने हम सबको देखा। उनकी आँखों में पानी आ गया। "असली है," उन्होंने कहा। "और इस पर हस्ताक्षर मैंने ख़ुद करवाए थे। मैं गवाह हूँ।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "तो चल। कल का दिन बड़ा है।"
बाहर आते हुए मैंने आसमान देखा। तारे थे, पर बादल भी। हवा में ठंडक थी।
राजेंद्र ने गाड़ी स्टार्ट की।
"एक बात समझ नहीं आई," बंसी ने पीछे से कहा। "अगर माँ ने ये लाइन बीस साल पहले जोड़ दी थी, तो भवानी ने आज तक इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया? वो तो हर काग़ज़ पढ़ता है।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। "क्योंकि वो काग़ज़ कभी उसके हाथ नहीं आया। शेखर बाबू ने इसे छिपाकर रखा। भवानी के पास इसकी सिर्फ़ फोटो होगी — जो उसने शायद कभी ध्यान से नहीं देखी। उसे लगा होगा कि ये बस एक पुराना काग़ज़ है जो शेखर बाबू के पास है। और शेखर बाबू ने हमेशा कहा होगा — काग़ज़ सुरक्षित है।"
"तो भवानी आज तक ये नहीं जानता कि उसके पास हवेली का हक़ ही नहीं था?" बंसी ने कहा।
"वो जानता," सुमन ने कहा। "पर उसे लगता था कि काग़ज़ पर सिर्फ़ माँ के हस्ताक्षर हैं। लाइन को उसने कभी नहीं पढ़ा। आज उसके वकील ने देखा होगा।"
मेरा हाथ जेब में गया। टोकन अब भी ठंडा था।
घर पहुँचे तो दरवाज़े पर माँ खड़ी थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मिल गया?" माँ ने कहा।
मैंने सिर हिलाया।
"तो अब?" माँ ने कहा।
"कल सुबह दस बजे," मैंने कहा। "अदालत। और इस बार कोई ज़बरदस्ती नहीं।"
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और अंदर खींच लिया। पापा मेज़ के पास बैठे थे, सामने दादा की किताब खुली थी।
"देख," पापा ने कहा। "किताब का पहला पन्ना।"
मैंने झुककर देखा। पुरानी स्याही में चार नाम थे। और सबसे नीचे, दादा की लिखाई में, वो लाइन — "जिस दिन मेरा पोता इस काग़ज़ को ख़ुद उठाएगा, उस दिन हवेली का असली हिसाब शुरू होगा।"
"ये काग़ज़ मैंने आज तक नहीं उठाया," मैंने कहा।
"तो उठा," पापा ने कहा।
मैंने किताब को दोनों हाथों से उठाया। कमरे में लालटेन की लौ काँपी। टोकन मेरी जेब में हल्का गरम हुआ — पहली बार उस दिन।
मैंने टोकन निकाला। उस पर एक नई लकीर उभर रही थी। और शब्द — "खुला।"
"क्या हुआ?" सुमन ने कहा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा और टोकन जेब में रख लिया। "कल के लिए तैयार हो जाओ।"
पर मैं जानता था — ये सिर्फ़ काग़ज़ का मामला नहीं था। भवानी को आज पता चल गया था कि उसके पास हवेली का हक़ कभी था ही नहीं। और जो आदमी बीस साल एक झूठ पर जिया हो, वो अपना झूठ टूटते देख कुछ भी कर सकता था।
रात के ग्यारह बज रहे थे। मैंने बाहर की तरफ़ देखा — गली में सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। इंजन बंद। कोई नहीं उतरा।
बंसी ने भी देखा। "क्या करें?"
"सो जाओ," मैंने कहा। "कल अदालत में जो होगा, उसके लिए दिमाग़ ठंडा चाहिए।"
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