The Token System – Chapter 98
"वो गाँव भवानी का सबसे अंधेरा कोना है। वहाँ अंदर जाना आसान है, लेकिन बाहर आना नहीं।"
मैंने अपना गिलास उठाया और एक घूँट में पी लिया।
"तो फिर सुबह हवेली में मिलेंगे। पहले मेनेजर और रजिस्टर। फिर बसवा।"
तभी दुकान के सामने एक लड़का दौड़ता हुआ आया। हाँफ रहा था। हाथ में मुड़ी पर्ची।
"मन्नू भैया कौन है?"
"मैं हूँ।"
"ये पर्ची फेंककर गई एक बच्ची। छोटी, आठ-नौ साल की रही होगी। काले फ्रॉक में। दौड़कर गली में गायब हो गई।"
मैंने पर्ची खोली।
मेरी ही लिखाई थी। "छोटू की माँ को देना। तीन सौ में से। दो सौ। बाकी सौ।"
मेरे हाथ काँप गए। बंसी ने पर्ची देखी, फिर मेरी तरफ़ देखा।
"ये तेरी लिखाई है?"
"लग रही है।"
"कब लिखी?"
"कुछ याद नहीं।"
"तो ये कैसे आई?"
मैंने पर्ची पलटी। पीछे कुछ नहीं था। पर सामने, नीचे, एक कोने पर दो आड़ी-खड़ी लकीरों का निशान था — मेरे टोकन के कोने का निशान।
॥
पर्ची हाथ में लिए मैं वहीं खड़ा रह गया। बंसी ने दुकान के बाहर झाँका, गली खाली थी।
"मन्नू, ये पर्ची तेरे हाथ से निकली है और तुझे याद नहीं?"
"बंसी, सच में याद नहीं।"
"कभी लिखा होगा किसी काग़ज़ के पीछे। फाड़कर फेंका होगा।"
"मैंने कोई पर्ची नहीं फाड़ी।"
"तो फिर ये लिखाई?"
मैंने पर्ची को दूबारा देखा। मेरी ही लिखाई। हर अक्षर वैसा ही। मैंने उसे पोटली में रख लिया और साइकिल उठाई।
"तू जा कहाँ रहा है?"
"तहसील।"
"फिर तहसील? मेनेजर का नाम सुनकर भी तू तहसील जाएगा?"
"बंसी, मेनेजर सात बजे हवेली में है। अभी साढ़े छह हुए हैं। रास्ते में एक काम हो जाएगा।"
बंसी ने गिलास धोया और पोंछते हुए कहा, "चल, मैं भी साथ।"
रास्ते में मैंने उसे रामकिशन के बारे में सब कुछ बताया — पेंशन की फ़ाइल, बदले के काग़ज़, हाशिये पर टोकन का निशान।
"मन्नू," बंसी ने कहा, "ये बूढ़ा जो तहसील में मिला था, वो कोई खास आदमी है।"
"क्यों?"
"क्योंकि ऐसा काग़ज़ उसके पास आया कि वो अपने पास रख सका। और भवानी का आदमी उसका काग़ज़ छीनने नहीं आया — ये बात खटक रही है।"
तहसील पहुँचे तो गेट पर सिपाही राजेंद्र मिला। वह उस वक़्त गेट से हटकर बाहर चाय पी रहा था।
"मन्नू, अभी तो लौटा था। फिर आ गया?"
"राजेंद्र भाई, रामकिशन जी कहाँ रहते हैं?"
"बूढ़ा रामकिशन? तहसील के पीछे, पुराने क्वार्टर में। वहाँ कोई रहने नहीं आता अब। वो अकेला पड़ा है।"
पुराने क्वार्टर में पहुँचे। दरवाज़ा खुला था। अंदर एक बूढ़ा, झुकी कमर, सिर पर गमछा, चारपाई के कोने पर बैठा मोटी लाल बही में कुछ लिख रहा था।
"रामकिशन जी?"
"खटिया पर बैठ बेटा। पानी पी ले।"
"आपको मैंने तहसील में देखा था।"
"मुझे? मैं वहाँ हर रोज़ आता हूँ। अपनी फ़ाइल का हिस्सा ढूँढता हूँ। तू वो लड़का है जिसने मेरी पेंशन की फ़ाइल छिपी दराज़ से निकाली थी।"
"हाँ।"
"तू काग़ज़ों की इज़्ज़त करता है। ये बात मैंने तेरी आँखों में देख ली थी। इसीलिए ज़मीन का काग़ज़ तेरे हाथ में दिया।"
बंसी वहीं बैठ गया। "रामकिशन जी, हम एक बात पूछेंगे।"
"पूछ।"
"आपकी ज़मीन का काग़ज़ भवानी के नाम पर कैसे गया?"
बूढ़े की बही हाथ में रुक गई। उसने सिर उठाया। आँखें बड़ी थीं, फटी हुई।
"तू कौन है?"
"बंसी। चाय की दुकान चलाता हूँ।"
"बंसी…" बूढ़े ने सोचा। "तहसील का बंसी? जो कभी बाबू लोगों के लिए चिट्ठी लिखता था?"
"वही।"
बूढ़े ने बही बंद की और दीवार से टिक गया।
"बारह साल पहले की बात है। मेरा बेटा साजन था। तीस साल का। सीधा-सीधा। लड़की का रिश्ता पक्का हो रहा था। एक दिन शाम को भवानी के दो आदमी आए। कहा — सेठ जी ने बुलाया है, एक छोटा काग़ज़ साइन करना है। बेटा कहता — बापा, पढ़ लूँ? वो आदमी झुंझलाया — अरे, तेरे बाप का दोस्त है भवानी, क्या पढ़ेगा? बेटा चला गया।"
"और?"
"और शाम को काग़ज़ आया। मेरी ज़मीन का। ऊपर साफ़ लिखा था, बेचने की रज़ामंदी। नीचे साजन का अँगूठा। मैंने कहा — मेरा बेटा ये नहीं करेगा। उसी रात वो सड़क दुर्घटना में मर गया।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। बंसी चुप बैठा रहा।
"मुझे पता था," बूढ़े ने कहा, "किसने कराया। पर मेरे पास कुछ नहीं था। न गवाह, न पैसा, न हिम्मत। ज़मीन तीसरे महीने में भवानी के नाम पर हो गई। मेरी बहू दूसरे शहर चली गई। पोती कभी-कभी आती है। पेंशन रुक गई थी। बस इतना ही।"
मैंने अपनी पोटली से वो काग़ज़ निकाला। "ये देखिए। आपका ही दिया काग़ज़।"
बूढ़े ने पढ़ा। हाशिये पर उँगली रखी। "ये निशान क्या है?"
"मेरे टोकन का।"
"टोकन?"
"रामकिशन जी," बंसी बीच में बोला, "हमें ये नहीं बताना कि आपने अभी तक ये काग़ज़ भवानी को लौटाया क्यों नहीं। पर एक बात बताइए — जिस दिन आपके बेटे ने साइन किए, उसी दिन ज़मीन का दस्तख़त का रजिस्टर कहाँ दर्ज हुआ था?"
"तहसील के पुराने रिकॉर्ड रूम में। जहाँ नाम दर्ज होते हैं।"
"वहाँ चलिए।"
बूढ़ा चलने को तैयार हुआ। उसने लाठी उठाई। रास्ते में कुछ नहीं बोला। रिकॉर्ड रूम में पहुँचे तो क्लर्क सिर झुकाए फ़ाइलें देख रहा था। वही क्लर्क जो रामकिशन की पेंशन छिपाता था।
"अरे रामकिशन जी, आप यहाँ? और ये लड़का?"
"रजिस्टर निकाल," बंसी ने कहा। "बारह साल पुराना।"
"कौन सा?"
"जिसमें उस साल सब दस्तख़त दर्ज थे।"
क्लर्क ने एक मोटा भूरा रजिस्टर उतारा। बंसी ने पन्ने पलटे। सावन का महीना। तेरहवीं तारीख़।
"ये देख," बंसी ने मेरी तरफ़ रजिस्टर घुमाया। उसी पन्ने पर एक लाइन थी — साजन की ज़मीन। और उसके ठीक ऊपर एक और लाइन — उसी ज़मीन का नाम भवानी सिंह के नाम हो गया। दोनों लाइनें एक ही तारीख़ की।
"एक ही दिन," मैंने कहा। "ऊपर अँगूठा और नीचे नाम।"
"ये नहीं दिख रहा?" बंसी ने पन्ने के बीच उँगली रखी। रजिस्टर के बीच से एक पन्ना निकल गया था। सिलाई के धागे अधूरे झूल रहे थे।
"यहाँ कोई पेज निकाला गया है।"
"निकाला नहीं, फाड़ा," बंसी ने कहा। "रजिस्टर बाहर नहीं जाता। यहाँ के किसी आदमी ने ही छेड़ा होगा।"
क्लर्क ने सिर उठाया, फिर झुका दिया।
"कब निकाला?" मैंने पूछा।
"मुझे नहीं पता," क्लर्क ने कहा, "मेरे आने से पहले होगा।"
"तू इसी रजिस्टर के पास बैठता है," बंसी ने कहा। "कौन आया था जिस दिन ये फाड़ा गया?"
क्लर्क कुछ कहने ही वाला था कि पीछे दरवाज़े पर छाया पड़ी। मैं मुड़ा। भवानी का वही मुंशी — सफ़ेद कुर्ता, चमकीले जूते, हाथ में पीली फ़ाइल। काउंटर पर झुका और धीरे बोला, "आज कोई बाहरी आया था?"
क्लर्क ने बिना सोचे मेरी तरफ़ उँगली बढ़ा दी।
मुंशी मुड़ा। मुझे देखा। और मुस्कुरा दिया।
"अरे, मनोहर जी। आप यहाँ?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"ठाकुर साहब ने कहा था," वो मेरे पास आया, आवाज़ धीमी, "यह बूढ़ा भी उसी रास्ते पर है जिस पर तेरे पापा थे। बात नहीं करता मरने तक, तो सड़क मिल जाती है।"
रामकिशन की लाठी फर्श पर टकराई।
"तू कह क्या रहा है?" बूढ़ी आवाज़ काँपी।
मुंशी ने उसकी तरफ़ देखा ही नहीं। मेरे कंधे पर हाथ रखा। "ठाकुर साहब कहते हैं — सुबह सात बजे हवेली में तुझे बुलाया है। मेनेजर आ रहा है। रजिस्टर आ रहा है। पर एक बात मान ले — जो काग़ज़ तूने आज तक जोड़े हैं, वो सब उस मेज़ पर रख दे, वरना ये बूढ़ा और बहुत दूर नहीं जाएगा।"
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