The Token System – Chapter 97
"मैं वो कमरा देखना चाहता हूँ।"
"नहीं," चूल्हे वाली ने कहा। "अभी नहीं। दिन में कोई भी आ सकता है। सुबह के वक़्त आओ, जब मेनेजर आएगा। हम तुम्हें अंदर डाल देंगे।"
"कल सुबह?"
"कल सुबह," उसने कहा। "पर एक बात।"
"क्या?"
"हमारा नाम कहीं मत लेना। हमें यहाँ नौकरी चाहिए। अगर मालिक को पता चला कि हमने तुमसे बात की, तो हम बाहर हो जाएँगे। और हमारे घर में हमारे अलावा कौन कमाने वाला है?"
मैंने उसे देखा। बंसी ने मेरी जेब में हाथ डालकर मेरा हाथ पकड़ा और दबाया — पैसे मत निकालना।
"नाम नहीं आएगा," मैंने कहा।
हम जैसे ही पलटे, बर्तन वाली ने पीछे से आवाज़ दी, "सुनो… वो औरत जब तीन महीने बंद थी, उसके बच्चे कहाँ थे?"
मैं रुक गया।
"एक बच्चा तो यहाँ किसी ने बोला था कि मर गया। और एक के बारे में चौकीदार बोलता था कि कहीं ज़िंदा रखा है।"
"दो बच्चे?"
"दो। बड़ा लड़का, छोटी लड़की। चौकीदार जब नशे में होता था, तब बोलता था — 'उसका लड़का बाहर, दादी के पास, और लड़की कहीं और है।'"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी का मुँह खुला रह गया था। हम सिर्फ़ एक बच्चे की बात जानते थे — बबलू। छोटी लड़की का कोई ज़िक्र किसी ने नहीं किया था।
गार्ड गेट पर हमारा इंतज़ार कर रहा था। हम बाहर निकले तो उसने पूछा, "काम हो गया?"
"हो गया," बंसी ने कहा। "सुबह फिर आएँगे।"
गार्ड ने कुछ नहीं कहा, पर जब हम गेट से निकले, तो वो भी पीछे आया और फ़ोन निकाला। मैंने बंसी को कोहनी मारी। बंसी ने साइकिल तेज़ कर दी।
सड़क पर आकर बंसी ने साइकिल रोकी।
"दो बच्चे," मैंने कहा। "दादा जी वाला छोटू तो किसी और का है। बबलू एक बच्चा है। दूसरी लड़की कहाँ है?"
"और कौन सी औरत थी जिसे भवानी के होम में रखा गया था? गंगा या सुनीता?"
मैं चुप रहा। काग़ज़ निकाला, रामकिशन की ज़मीन का। उसके हाशिये पर भवानी का नाम और मेरे टोकन का निशान था। पीछे मैंने पलटकर देखा। कुछ नहीं लिखा था।
"बंसी, आज शाम डॉक्टर सुमन से मिलना है।"
"क्यों?"
"अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड कमरे में कुछ होगा। जिस साल ये ज़मीन बदली गई, उस साल के काग़ज़ कहीं तो होंगे। अगर ये ज़मीन भवानी के नाम पर ली गई थी, तो उसका रजिस्टर किसी में दर्ज है।"
"और अगर वो रजिस्टर भी भवानी के आदमी ने छिपा दिया?"
"तो फिर उस क्लर्क के पास जाना पड़ेगा, जो फ़ाइलों में काम करता है।"
बंसी ने साइकिल चलाई। "भवानी के होम का मेनेजर दो दिन से नहीं आया। तूने सुना?"
"सुना।"
"ये वही मेनेजर है जिसने शेखरका लिफ़ाफ़ा मेज़ के नीचे रखा था। कल रात से कहीं गायब है।"
"तो कल सुबह हम मेनेजर का इंतज़ार करेंगे?"
"नहीं," बंसी ने कहा। "कल सुबह हम मेनेजर से पहले पहुँचेंगे। रसोई वाली औरत कहेगी — आ जाओ।"
घर पहुँचे तो शाम हो चुकी थी। रीना आँगन में बैठी थी, सामने किताबें फैली थीं। माँ चूल्हे पर चाय रख रही थी। मैंने साइकिल खड़ी की और सीधा माँ के पास गया।
"माँ, सुनीता के कितने बच्चे थे?"
माँ ने चाय वाली पतीली नीचे उतारी। "दो। एक लड़का, एक छोटी लड़की।"
"लड़की का नाम?"
"गुड़िया।"
"कितनी बड़ी?"
"छह साल की रही होगी। सुनीता के साथ चली गई थी।"
"कहाँ चली गई थी?"
"बसवा से भागकर यहाँ आई थी। लड़की साथ थी। पर…" माँ ने चाय छानी और एक कप मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"पर?"
"औरत जब भवानी के होम में गई, तो लड़की किसी को सौंप दी थी। किसको, ये नहीं पता।"
रीना ने किताबों से सिर उठाया। "काकी से पूछ।"
"काकी?"
"काकी को सब पता है। सुनीता जब आई थी, तो शुरू के दो दिन काकी के घर रही थी।"
मैंने चाय का कप नीचे रखा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"अभी?" रीना ने कहा। "रात हो गई।"
"काकी को रात में ही कोई नहीं पूछता।"
काकी के घर का दरवाज़ा खुला था। अंदर एक दीया जल रहा था। छोटू दरवाज़े पर बैठा था। मुझे देखकर खड़ा हो गया।
"मन्नू भैया।"
"काकी कहाँ हैं?"
"अंदर सो रही हैं।"
"उन्हें जगा दे। कहो मन्नू आया है।"
छोटू अंदर गया। कुछ देर बाद काकी लाठी टेकती हुई बाहर आई। मुझे देखकर दीवार से टिक गई। "देर कर दी बेटा।"
"काकी, सुनीता की बेटी — गुड़िया — तुम्हें किसी को दी थी?"
काकी ने लाठी से छत की तरफ़ इशारा किया। "किसी को नहीं दी। मैंने उसको रखा, फिर वापस कर दिया।"
"किसको?"
काकी ने छोटू की तरफ़ देखा। छोटू दरवाज़े पर खड़ा सुन रहा था।
"छोटू, तू अंदर जा," काकी ने कहा। छोटू गया।
"बोलो, काकी।"
"गुड़िया को भवानी के आदमी ले गए। उसी रात। जिस रात सुनीता को होम में डाला गया था। मैंने बहुत रोका। पर वो बोले — 'लड़की का क्या करेगी तू, बूढ़ी? कल दूध भेजेंगे, ये ले जा।' मैंने कुछ नहीं किया। कल दूध भी नहीं आया।"
"तो गुड़िया कहाँ है?"
"ये तो मुझे नहीं पता। उस दिन के बाद मैंने भवानी के आदमियों को गुड़िया के साथ कभी नहीं देखा।"
मैं काकी के आँगन में खड़ा रह गया। रात के अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। जेब में टोकन था, ठंडा। मैंने उसे छूआ, लेकिन वो कुछ नहीं बोला।
घर लौटा तो पता चला डॉक्टर सुमन का फ़ोन आया था — माँ ने बताया। "क्या कहा?"
"बोली — कल सुबह सात बजे हवेली में। और एक बात कही।" माँ ने चाय मेरी तरफ़ बढ़ाई, पर मैंने लिया नहीं।
"क्या?"
"कहा — मेनेजर मिल गया है। भवानी के होम का मेनेजर। गाँव में अपने भाई के घर। डरा हुआ है। वो बोल रहा है कि रजिस्टर मैंने खुद नहीं छिपाया, मुझे छिपाने को कहा गया था।"
"किसने कहा?"
"सुमन ने नहीं बताया। बस कहा कि सुबह सब पता चल जाएगा।"
मैं चारपाई पर बैठा। जेब से टोकन निकाला। ठंडा था, पर इस बार कुछ लकीरें नहीं दिखीं। सिर्फ़ एक शब्द उभरा — "कल।"
और उसी वक़्त सामने की गली से सफ़ेद जीप की आवाज़ आई। इंजन की आवाज़ गली के मोड़ पर रुकी, फिर चली गई।
रात तीन बजे मैं उठा। ज़रूरत थी या नहीं, पता नहीं। दीवार से सटकर बैठा और सोचा — सुनीता की लड़की गुड़िया। हमने बबलू को बचा लिया, पर गुड़िया का नाम किसी ने नहीं लिया। किसी ने नहीं पूछा कि वो कहाँ है।
सुबह छह बजे बंसी की दुकान पर पहुँचा। बंसी चाय बना रहा था।
"अब इतनी सुबह?"
"बंसी, एक काम और है।"
"हर एपिसोड में एक काम और। तेरा टोकन क्या सारे काम अकेला ही बाँटेगा?"
"बंसी, सुनीता की एक बेटी है। छह साल। गुड़िया।"
बंसी के हाथ से चाय का गिलास रुका। "क्या?"
"काकी ने बताया। उसे भवानी के आदमी ले गए थे। उस रात।"
बंसी ने गिलास मेज़ पर रखा और बैठ गया। "मन्नू, तू कितना और ढूँढेगा?"
"जितना बाकी है।"
"तू जानता है ये रास्ता कहाँ जाता है?"
"नहीं।"
"मुझे भी नहीं पता। पर एक बात पता है — भवानी हर चीज़ अपने पास नहीं रखता। वो बच्चों को कहीं भेज देता है। उसका एक गाँव है, जहाँ लोग काम करते हैं और उसका हिसाब देखते हैं। वो कहीं बाहर रखता है बच्चों को।"
"कहाँ?"
"बसवा।"
मैंने उसे देखा। "बसवा?"
"हाँ। तहसील में जब मैं काम करता था, तब सुना था। भवानी वहाँ बच्चों को रखवाता था। किसी काम के लिए। उनके नाम काग़ज़ पर चढ़ाए जाते थे, फिर वो काग़ज़ कहीं और काम आते थे।"
"फिर वो हमें सुनीता की बेटी भी वहीं मिल सकती है?"
"शायद। पर एक बात सुन।"
"क्या?"
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