The Token System – Chapter 99
मेरे पैर जम गए। जेब में टोकन ठंडा था। मैंने उसे छुआ — सिर्फ़ ठंडा, कोई लकीर नहीं।
"बाहर निकल।" मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में अलग लगी।
मुंशी मुस्कुराया और पीछे मुड़कर चला गया। जाते-जाते उसने रजिस्टर पर हाथ फेरा, फिर उंगली से पन्ने का किनारा दबाया और दरवाज़े से बाहर हो गया।
रामकिशन चारपाई पर बैठ गया। उसकी लाठी हाथ से छूट गई।
"बेटा, ये लोग मुझे भी नहीं छोड़ेंगे।"
"रामकिशन जी," मैंने कहा, "आपने आज तक किसी को कुछ नहीं बताया। मुझे बताइए — उस रात गाड़ी में कौन था?"
"मुझे क्या पता?"
"आपको पता है।"
बूढ़े ने आँखें बंद कर लीं। फिर खोलीं। "एक आदमी था। उसी गली का। हरदेव। भवानी के पापा की गाड़ी चलाता था। उसने मुझसे कहा था — भाई, मेरी गवाही सुन ले, फिर जो करना। पर मैंने सुनी नहीं। डर गया था। आज तक पछताता हूँ।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। हरदेव की बात मुझे याद थी। वही हरदेव जो कल मेरे घर आया था।
"अब आप क्या करेंगे?" मैंने पूछा।
"मैं तो बूढ़ा हूँ। पर मेरी बहू के नाम पर जो ज़मीन भवानी ने लिखी है, उसका काग़ज़ मेरे पास है। और अब तेरे पास भी है।"
"आप मेरे साथ चलिए," मैंने कहा। "सात बजे हवेली में सब जुट रहे हैं।"
बूढ़ा उठा। उसने लाल बही अपनी बगल में दबाई।
"एक बात पूछूँ, बेटा?"
"पूछिए।"
"तेरे पास जो टोकन है — वो क्या भवानी के जैसा है?"
मैं रुका। बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने बहाना बनाकर मुँह फेर लिया।
"क्यों पूछ रहे हैं?"
"क्योंकि, बेटा, बारह साल पहले जब साजन मरा, मुझे उसकी जेब में एक चीज़ मिली थी। मैंने उसे संभालकर रखा है। वो पीतल का था। पर उस पर कुछ लिखा नहीं था। बिल्कुल सपाट।"
बंसी ने सिर घुमाया।
"कहाँ है?" मैंने पूछा।
"घर में।"
"तो वो लेकर चलिए।"
"वो असली नहीं है," रामकिशन ने कहा। "साजन को उस दिन भवानी के आदमियों ने दिया था। कहा था — ये रख ले, काम आएगा। फिर उसी रात वो मर गया। मैंने सोचा — शायद इसी में सबका राज़ है। तीन साल बाद मुझे तेरे जैसा एक लड़का मिला, जिसने मुझे ये काग़ज़ दिया। मुझे तो कुछ नहीं पता। पर गली में लोग कहते हैं — इस टोकन की दो नस्लें हैं। एक असली, एक नकली। और भवानी बारह साल से नकली वाला ही खिला रहा है अपने आदमियों को।"
मैंने बंसी को देखा। बंसी ने देखा। दोनों को एक ही बात दिखी — छोटू के दादा की चीज़ें, वो सपाट सिक्का जो काकी के घर में रहा होगा।
"रामकिशन जी, वो सपाट सिक्का कहीं दिखा सकते हैं?"
"अभी चल।"
हम तीनों उसके क्वार्टर लौटे। बूढ़े ने चारपाई के नीचे से एक टिन का डिब्बा निकाला। ढक्कन खोला। अंदर कपड़े में लिपटा एक पीतल का सिक्का था — बिल्कुल बिना लकीर। सपाट। ठंडा।
मैंने उसे उँगली पर रखा। कुछ नहीं हुआ। ना गरम, ना आवाज़।
"ये जैसे ही मिला था," रामकिशन ने कहा, "मैंने इसे अपने दरवाज़े की ताख पर रखा था। तीन महीने तक। फिर देखा — ये बिल्कुल चुप है। न गरम होता, न बोलता। तब समझा, साजन के हाथ में ये मरा हुआ ही गया था।"
"आपने ये किसी को दिखाया?"
"किसी को नहीं।"
मैंने सपाट सिक्का अपनी पोटली में रखा और असली टोकन की तरफ़ उँगली की। असली ठंडा था, पर जैसे ही सपाट सिक्का पास आया, असली के किनारे पर एक छोटी लकीर उभरी — "जुड़ा।"
मैंने पोटली बंद की। देर हो रही थी।
हवेली पहुँचे तो सात बज चुके थे। मैदान में सुमन, राजेंद्र, बंसी, माँ, रीना, काकी, छोटू, शेखर बाबू, लालाजी, अंकित और हवेली की वो बूढ़ी औरत — सब पहले से मौजूद थे। रामकिशन को देखकर सुमन चौंकी।
"ये कौन हैं?"
"इनका नाम श्रीराम जाट है," बंसी ने कहा। "आज इनके पास वो काग़ज़ है जो भवानी के कारोबार की पहली पहली सीढ़ी बना।"
सुमन ने बूढ़े की तरफ़ देखा। "आप?"
"मैं सिर्फ़ एक बात कहूँगी," बूढ़ा बोला। "मेरे बेटे को भवानी के आदमियों ने काग़ज़ पर अँगूठा लगवाया। बिना पढ़े। और अगली सुबह गाड़ी ने उसे उठा लिया। मैं इन लोगों के साथ हूँ। मेरा काग़ज़ मेरे हाथ में है। जो करना है, कीजिए।"
दरवाज़े पर हलचल हुई। तीन लोग अंदर आए — आगे भवानी। पीछे उसका मुंशी। और सबसे पीछे एक पतला, पीला चेहरा, काँपता आदमी — भवानी का होम का मेनेजर। उसके हाथ में एक मोटा रजिस्टर बँधा था।
भवानी रुका। उसने सबको एक-एक करके देखा। रीना पर नज़र पड़ी, तो रुकी।
"बड़ी भीड़ है।"
"आपने बुलाया था," मैंने कहा। "सात बजे।"
"मैंने तुझे बुलाया था, मनोहर। तेरे साथ ये सब नहीं।"
"ये सब मेरे साथ हैं।"
भवानी ने मुंशी की तरफ़ देखा। मुंशी ने धीरे सिर हिलाया — मतलब, जैसा मैंने कहा था वैसा ही हुआ। भवानी की आँखें मेरे चेहरे पर आईं।
"मेनेजर, रजिस्टर रख।"
मेनेजर ने रजिस्टर ज़मीन पर रखा। उसके हाथ काँप रहे थे।
"ठाकुर साहब," वो बोला, "मैंने अब तक ये रजिस्टर अपने पास रखा। पर अब नहीं रखूँगा। आपने ही कहा था — छिपा दो।"
भवानी के चेहरे पर कुछ नहीं बदला। "चुप।"
"नहीं चुप रहूँगा।" मेनेजर ने रजिस्टर उठाया। "सुनीता देवी की एंट्री मिटाई गई थी। उसकी जगह दूसरा नाम था। आपने कहा था — मरीज़ की गिनती नहीं होनी चाहिए।"
सुमन आगे आईं। "मेनेजर साहब, आपको मैं इन सब बातों के लिए मिली थी?"
"जी डॉक्टर साहब। डर गया था। पर आज जो ये बूढ़ा आदमी बोल रहा है, मुझे मेरा बेटा याद आ गया।"
भवानी ने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक छोटा पीतल का टुकड़ा — टूटा हुआ, आधा सिक्का। उसने उसे हवा में उठाया। सबकी नज़रें वहीं गईं।
"तू ये जानता है?" उसने मुझसे कहा।
"जानता हूँ," मैंने कहा। "ये असली नहीं है। ये टूटा हुआ है।"
भवानी हँसा। "असली नहीं? मेरे पास बीस साल से यही चल रहा है।"
"बीस साल से ये तुम्हारा हिसाब चला है," मैंने कहा। "पर इसका खाता किसी और के नाम है। तुमने कभी अपने हाथ से काम नहीं किया। तुमने हर काम में किसी और का ज़रिया लगाया। इसलिए तुम्हारा हिसाब भारी है। और ये टूटा हुआ टुकड़ा कल तुम्हारे बेटे की जेब में था। तुमने उसे भी नकली दे दिया।"
भवानी का हाथ नीचे आया। उसके मुंशी ने कदम पीछे किए।
"मेरा बेटा इससे जुड़ा नहीं," भवानी ने कहा, आवाज़ पहली बार ऊँची।
"तुम्हारा बेटा तुमसे दूर भाग रहा है," मैंने कहा। "वो कल थाने में तुम्हारे ख़िलाफ़ बयान देने आया था।"
भवानी की आँखें सिकुड़ीं। उसने मुंशी की तरफ़ देखा। मुंशी बोला, "सर, वो बात मैंने अभी आपको बतानी थी।"
भवानी मुड़ा। सीधा मेरी तरफ़ आया। दो कदम दूर रुका।
"तेरे पास क्या है? एक टोकन, कुछ काग़ज़ और एक गली का चायदान।"
"और मेरे पास ये है कि मुझे किसी से डरना नहीं पड़ता।"
भवानी ने मेरी तरफ़ उँगली उठाई, फिर नीचे की। वह पलटा और चल दिया। दरवाज़े से बाहर निकलते हुए वो नहीं रुका।
मुंशी रुका। मेरी तरफ़ देखा। कहा, "ठाकुर साहब ने सुबह ही कहा था — ये लड़का भी उसी रास्ते पर है। पर एक बात वो भूल गए।"
"क्या?"
"तेरा पापा रास्ते पर चला और गाड़ी ने उठा लिया। तू रास्ते पर चल रहा है और अभी गाड़ी आई नहीं।"
वो मुस्कुराया। और चला गया।
रात को घर लौटा तो रामकिशन को साथ लाया था। माँ ने उसके लिए चारपाई बिछाई। बूढ़ा लेटा और बोला, "बेटा, एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"मेरे साजन की जेब में जो सपाट सिक्का था, वो किसी और की जेब में होना चाहिए था। उसे भवानी ने अपने आदमी को दिया था।"
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