The Token System – Chapter 972
"सुमन —"
"और अब वही काग़ज़ उसके फ़ोन में है," उसने फ़ोन मेरी तरफ़ बढ़ाया, हाथ काँप रहा था। "मतलब आज रात वो इसे मिटा देगा। रोक सकते हो?"
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन अब गरम था — बहुत गरम, जैसे किसी ने उसे आग पर रख दिया हो।
"रोक नहीं सकते," मैंने कहा। "पर एक चीज़ कर सकते हैं। उसके ग्रुप में भेजने से पहले हम ख़ुद भेज दें। पूरी हवेली, पूरा गाँव, थाना — सबको।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा।
"फोटो भेजने वाला लड़का पकड़ा जाएगा।"
"तो उसे पकड़ने से पहले, हम उससे भेजवा लें," मैंने कहा। "एक आख़िरी बार।"
टोकन मेरी हथेली में धधक रहा था, जैसे कह रहा हो — अब।
॥
फ़ोन मेरे हाथ में था और स्क्रीन पर काग़ज़ की फोटो। सुमन ने मेरी कलाई पकड़ी और फोन नीचे कर दिया।
"इसे उँगली से नहीं, आँख से पढ़ो," उसने कहा। "जल्दबाज़ी में हम वही ग़लती करेंगे जो भवानी चाहता है।"
हम हवेली के पिछले कमरे में थे — वही जगह जहाँ माँ ने अपने काग़ज़ जलाए थे। कमरे में अब भी जले काग़ज़ की गंध थी। सुमन ने फोन मेज़ पर रखा, अपने बैग से एक छोटा आतिशी शीशा निकाला और फोटो पर रख दिया। फोटो बड़ी हुई।
"देखो," उसने कहा। "चार नाम। हरि सिंह। रामदीन मिस्त्री। सुखदेव माली। और चौथा — कौशल्या।"
"और भवानी?"
"भवानी का नाम नहीं है। बिलकुल नहीं।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा। पापा दीवार से टिके बैठे थे, घुटने पर हाथ रखे। उनका चेहरा पत्थर जैसा था, पर आँखें चल रही थीं।
"और नीचे?" पापा ने पूछा।
"नीचे पाँचवें गवाह की जगह खाली है," सुमन ने कहा। "खाली, बिना लकीर, बिना हस्ताक्षर।"
माँ ने दरवाज़े से अंदर झाँका। उनके हाथ में चाय का बर्तन था, पर वो किसी को नहीं दे रही थीं — बस पकड़े खड़ी थीं।
"तो ये काग़ज़ अदालत में चल जाएगा?" माँ ने पूछा।
"चलेगा नहीं," सुमन ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो डॉक्टर सुमन में अब आ गई थी। "ये काग़ज़ अकेला कमज़ोर है। भवानी का वकील एक ही दिन में कहेगा — ये फ़र्ज़ी है, ये बनाया हुआ है, इस पर कोई मुहर नहीं, कोई तहसील का रिकॉर्ड नहीं। बिना दूसरे काग़ज़ के ये कचरे में जाएगा।"
"दूसरा काग़ज़ हवेली की दीवार में है," मैंने कहा। "हमने देखा है। उस दीवार के पीछे आलमारी है।"
"देखा है — पर निकाला नहीं," सुमन ने कहा। "और जब तक अदालत का आदेश नहीं, वो दीवार तुम्हारी नहीं, भवानी की है। तुम उसे तोड़ोगे, तो चोरी का केस तुम पर।"
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन अब भी गरम था, पर पहले जैसा नहीं — अब वो हल्का गरम था, जैसे कह रहा हो, अब तेरा काम नहीं, दिमाग़ का काम है।
"तो क्या करें?" बंसी ने पूछा। वो दरवाज़े के पास खड़ा था, टूटी लाठी अब भी हाथ में। "हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएँ?"
"एक नाम है," सुमन ने कहा। "सक्सेना। श्रीमती सक्सेना। रिटायर जज की बेटी। भवानी से पहले भी लड़ चुकी है — और जीती है। पिछले साल उसने भवानी के एक काग़ज़ को फ़र्ज़ी साबित कराया था। भवानी उससे डरता है।"
"वो ही सक्सेना जिनके घर हम कल रात गए थे?" राजेंद्र ने पूछा।
"वही," सुमन ने कहा। "पर कल रात हम उनके पास गए थे अपनी गवाही लेकर। आज हमें उनके पास अपना केस लेकर जाना है।"
मैं उठ खड़ा हुआ। घुटने में दर्द उठा, पर मैंने चेहरे पर कुछ नहीं आने दिया।
"चलो," मैंने कहा।
"रुको," पापा ने कहा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मैं चलूँगा।"
"पापा, आप —"
"बीस साल मैं इस काग़ज़ के लिए ज़िंदा रहा हूँ।" उनकी आवाज़ धीमी थी पर साफ़। "अगर ये काग़ज़ अदालत में जा रहा है, तो मैं वहाँ खड़ा रहूँगा।"
माँ ने चाय का बर्तन मेज़ पर रखा। कोई आवाज़ नहीं हुई — बर्तन तक नहीं खनका।
"तेरे पास कपड़े नहीं," माँ ने कहा। "बीस साल पुरानी कमीज़ में अदालत जाएगा?"
"कपड़े नहीं, आदमी जा रहा है," पापा ने कहा।
माँ ने कुछ नहीं कहा। पर वो उठकर अंदर गईं और एक पुरानी अलमारी से एक सफ़ेद कुर्ता निकाल लाईं जो अब तक किसी ने नहीं पहना था। उन्होंने उसे पापा की तरफ़ बढ़ा दिया।
राजेंद्र ने गाड़ी आगे कर दी। मैं, पापा, सुमन और राजेंद्र निकले। बंसी हवेली पर रुका — "यहाँ कोई चाहिए जो दरवाज़े पर खड़ा रहे," उसने कहा था। माँ हवेली के पीछे के कमरे में रहीं, छोटू उनके साथ।
रास्ते में सुमन ने मुझे फोटो दोबारा दिखाई।
"देखो," उसने कहा। "फोटो में काग़ज़ की दाहिनी तरफ़ एक कोना मुड़ा है — छोटा सा, मुड़ा हुआ, जैसे किसी ने उसे उँगली से दबाया हो। मेरे लिफ़ाफ़े वाले काग़ज़ पर भी वही मोड़ था। मैंने उसे आठ साल पहले देखा था, और आज फिर देखा। यह वही काग़ज़ है।"
"यानी यह चोरी का नहीं है," मैंने कहा। "यह आठ साल पहले से किसी के पास है।"
"और वो कोई भवानी नहीं है," सुमन ने कहा। "क्योंकि अगर भवानी के पास होता, तो वो इसे आठ साल पहले जला देता।"
गाड़ी सक्सेना के घर के सामने रुकी। दरवाज़े पर बूढ़ा दरबान बैठा था, वही जो कल रात दरवाज़ा खोलने आया था। उसने हमें देखा और बिना कुछ पूछे अंदर जाने दिया।
सक्सेना बरामदे में बैठी थीं — चश्मा नाक पर, हाथ में कलम, सामने बिखरी हुई फ़ाइलें। उन्होंने सिर उठाया और बिना कुछ कहे मेज़ पर हाथ रख दिया।
"बैठो," उन्होंने कहा। "और अब बताओ वो बात जो कल रात तुमने भरी हुई आवाज़ में नहीं बताई थी।"
मैंने काग़ज़ की फोटो उनके सामने रखी। उन्होंने फोटो देखी, फिर बिना कुछ कहे अपना चश्मा उतारा, उसे साफ़ किया, और दोबारा पहना।
"यह फोटो है," उन्होंने कहा। "अदालत में फोटो नहीं जाती। काग़ज़ जाता है।"
"काग़ज़ हमारे पास है," मैंने कहा। "असली।"
"और वो कहाँ है?"
"थाने में जमा है।"
सक्सेना ने कलम रख दी।
"तो तुमने ठीक किया।" उन्होंने सिर हिलाया। "पर एक समस्या है। अदालत में आज जज साहब के सामने यह काग़ज़ आया, और भवानी का वकील खड़ा होकर कहेगा — यह काग़ज़ किसने बनाया, कब बनाया, कहाँ रखा था, किसने देखा। और तुम्हारे पास कोई गवाह नहीं।"
"मेरे पास चार नाम हैं," मैंने कहा। "और एक खाली जगह।"
सक्सेना ने मेरी तरफ़ देखा। एक पल के लिए उनकी आँखों में कुछ चमका।
"खाली जगह?"
"पाँचवें गवाह की। काग़ज़ पर जगह है, हस्ताक्षर नहीं।"
सक्सेना उठ खड़ी हुईं। उन्होंने बरामदे में चार क़दम चले, फिर रुकीं।
"भवानी का वकील यही कहेगा," उन्होंने धीमे से कहा। "कि काग़ज़ अधूरा है। बिना गवाह का काग़ज़ अदालत में काग़ज़ नहीं, काग़ज़ का खंडहर है। और हवेली की दीवार खोलने की बात — उसके लिए अदालत का आदेश चाहिए। बिना आदेश, दीवार तोड़ी, तो चोरी।"
"तो आदेश ले आइए," मैंने कहा।
"आदेश माँगने से नहीं मिलता," सक्सेना ने कहा। "आदेश के लिए कारण चाहिए। कारण के लिए सबूत। और सबूत के लिए —"
"गवाह," सुमन ने कहा।
सक्सेना ने सुमन की तरफ़ देखा और सिर हिलाया।
"गवाह," उन्होंने दोहराया। "ऐसा गवाह जो अदालत में खड़ा होकर कहे — मैंने यह काग़ज़ अपनी आँखों से इस दीवार में रखा था। बिना उसके, जज साहब दीवार खोलने का आदेश नहीं देंगे।"
कमरे में चुप्पी छा गई। मैंने सोचा — कौन? कौन ऐसा है जो दीवार के सामने खड़ा होकर यह कह सके?
"दादा मरे हुए हैं," मैंने कहा। "माली सुखदेव मरे हुए हैं। रामदीन मिस्त्री मरे हुए हैं।"
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