The Token System – Chapter 973
"रामदीन की मौत काग़ज़ पर दर्ज है," सक्सेना ने कहा। "दर्ज होना और मरना दो अलग बातें हैं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"आप कह रही हैं —"
"मैं कुछ नहीं कह रही," सक्सेना ने कहा। "मैं सिर्फ़ यह कह रही हूँ कि अदालत में ज़िंदा आदमी की ज़ुबान चाहिए। काग़ज़ पर लिखा नाम गवाह नहीं होता।"
पापा ने कुर्सी पर हाथ रखकर खुद को सीधा किया।
"मैं गवाह हूँ," उन्होंने कहा। "मैंने वो दीवार बनते देखी है।"
सक्सेना ने उनकी तरफ़ देखा — लंबा, गहरा। फिर बोलीं, "आप किशन हैं न?"
"हाँ।"
"आप बीस साल से गायब थे। आपका नाम मौत के काग़ज़ पर है। अगर आप आज अदालत में खड़े हुए, तो पहला सवाल यही होगा — बीस साल कहाँ थे। और जब तक आपका जवाब पूरा हो, जज साहब दूसरे सवाल पर नहीं जाएँगे। हमारा समय नहीं है।"
पापा कुछ नहीं बोले। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर नीचे।
सक्सेना ने काग़ज़ की फोटो उठाई और दोबारा देखी।
"चौथा नाम कौशल्या है," उन्होंने कहा। "यह तुम्हारी माँ है?"
"हाँ।"
"तो एक रास्ता है," सक्सेना ने कहा। "माँ को गवाह बनाओ। वो कहेगी कि उसने यह काग़ज़ देखा था, उसके हस्ताक्षर हैं, और उसे भवानी के बाप ने धमकाया था। यह आधा काम है।"
"और आधा?"
"आधे के लिए हमें वो आदमी चाहिए जो उस दीवार के सामने खड़ा होकर कहे — मैंने यह काग़ज़ वहाँ रखा था।"
मैंने जेब में टोकन महसूस किया। वो अब गरम नहीं था — बिलकुल ठंडा। जैसे कह रहा हो — यह काम मेरा नहीं, तेरा है।
"मुझे एक आदमी का नाम पता है," मैंने कहा।
सबने मेरी तरफ़ देखा।
"कौन?" सुमन ने पूछा।
"मुनीम," मैंने कहा। "वही मुनीम साहब जिन्होंने हमें बताया था कि पापा की काग़ज़ बावड़ी में छिपी है। उन्होंने कहा था — 'मैंने उसे अपनी आँखों से रखते देखा था।' वो ज़िंदा हैं। वो इस शहर में हैं।"
सक्सेना ने मेरी तरफ़ देखा, और उनके चेहरे पर पहली बार कुछ ऐसा आया जो डर नहीं था।
"तो उस आदमी को कल शाम तक अदालत में लाओ," उन्होंने कहा। "और अभी — मैं जज साहब को फोन करती हूँ।"
उन्होंने फोन उठाया। मैंने उन्हें देखा — उनकी उँगलियाँ स्थिर थीं, चेहरा शांत। एक-एक शब्द साफ़ बोल रही थीं — "जज साहब, एक ज़रूरी बात है। हवेली के केस में एक नया काग़ज़ आया है। मुझे कल सुबह दस बजे का वक़्त चाहिए — केस के दायरे में, अदालत के सामने।"
फोन पर कोई कुछ कह रहा था। सक्सेना बीच में एक बार बोलीं — "नहीं, चार नाम हैं। और पाँचवाँ खाली है।" फिर चुप रहीं, सुनती रहीं।
फोन रखकर उन्होंने हम सबकी तरफ़ देखा।
"अदालत का आदेश मिल सकता है," उन्होंने कहा। "जज साहब ने सिद्धांत में हामी भर दी है।"
सुमन ने राहत की साँस ली।
"पर शर्त एक है," सक्सेना ने कहा, और उनकी आवाज़ सख़्त हो गई। "काग़ज़ असली साबित करने के लिए एक गवाह चाहिए — जो दीवार के सामने खड़ा होकर अदालत में कहे कि उसने यह काग़ज़ अपनी आँखों से वहाँ रखा था। बिना उसके, आदेश नहीं।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। सुमन ने मेरी तरफ़। पापा ने अपना सिर उठाया। राजेंद्र ने दरवाज़े की तरफ़ देखा, जैसे बाहर कोई आने वाला हो।
सक्सेना ने फ़ाइल बंद की।
"मुनीम को कल सुबह दस बजे तक अदालत में लाओ," उन्होंने कहा। "वरना सब बेकार।"
मैं उठा। घुटना फिर चरचराया, पर मैंने कदम बढ़ा दिए। दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते हुए मैंने जेब में हाथ डाला और टोकन छुआ — वो ठंडा था। बिलकुल ठंडा। पर जैसे ही मैंने दरवाज़े की कुंडी पकड़ी, वो अचानक गरम हो गया — तेज़, एक पल के लिए, जैसे छोटी सी चुभन। मैंने हाथ खींच लिया और टोकन निकाला। उस पर एक लकीर और उभर आई थी। और उसके नीचे एक शब्द — "मुनीम।"
मैं रुक गया।
"क्या हुआ?" सुमन ने पूछा।
मैंने टोकन उसकी तरफ़ बढ़ाया। सुमन ने देखा और उसका चेहरा बदल गया।
"टोकन कह रहा है कि मुनीम ही वो आदमी है," मैंने कहा। "पर शब्द के नीचे चार लकीरें हैं, और चारों कटी हुई हैं।"
"कटी हुई?"
"जैसे किसी ने उँगली से मिटाने की कोशिश की हो।"
सक्सेना मेरी तरफ़ बढ़ीं और टोकन देखा। उन्होंने उसे छुआ नहीं, बस देखा।
"तुम्हारा टोकन किसी को नहीं दिखाना," उन्होंने धीमे से कहा। "जब तक हम अदालत में न पहुँचें।"
मैंने सिर हिलाया। टोकन जेब में रखा। पर मेरे अंदर एक बात घूम रही थी — जिस आदमी को मैं गवाह बनाने जा रहा था, टोकन उसका नाम मिटा रहा था। इसका मतलब साफ़ था — यह रास्ता आसान नहीं होगा।
बाहर निकलते हुए पापा ने मेरा कंधा पकड़ा।
"मुनीम मेरा दोस्त है," उन्होंने कहा। "बीस साल मेरे साथ रहा। पर वो डरपोक है। भवानी का नाम सुनकर काँप जाता है।"
"तो उसे समझाना पड़ेगा," मैंने कहा।
"कैसे?"
मैंने सक्सेना की तरफ़ देखा, जो बरामदे में खड़ी हमें देख रही थीं।
"मुनीम ने ख़ुद कहा था," मैंने कहा। "कि उसे अपना हिसाब बराबर करना है। आज वो मौक़ा है।"
गाड़ी में बैठते हुए मैंने सुमन से पूछा, "मुनीम कहाँ मिलेंगे?"
"पुराने बाज़ार में," सुमन ने कहा। "एक पान की दुकान के पीछे। उनका घर वहीं है।"
मैंने राजेंद्र से गाड़ी मोड़ने को कहा। पीछे मुड़कर मैंने हवेली की तरफ़ देखा — दूर, शहर के किनारे पर, धुंध में। और मुझे लगा कि हवेली खिड़की से झाँक रही है, और मेरी तरफ़ देख रही है, और कह रही है — जल्दी कर।
गाड़ी ने मोड़ लिया और सक्सेना का घर आँखों से ओझल हो गया।
॥
गाड़ी पुराने बाज़ार की तरफ़ भाग रही थी और मेरे दिमाग़ में एक ही बात घूम रही थी — वो गवाह कौन होगा जो अदालत के सामने खड़ा होकर कहे कि उसने काग़ज़ दीवार में रखा था। सुमन मेरे बगल में बैठी थी और राजेंद्र ने कई बार पीछे देखा, पर किसी ने कुछ नहीं कहा। मैंने खिड़की से बाहर देखा — दुकानें बंद हो रही थीं, पान की दुकानों पर लालटेन जल रही थीं।
मैंने पीछे के पास वाले काग़ज़ को हाथ में लिया और उसके पाँचवें गवाह की जगह पर उँगली रख दी। खाली। मैंने पापा की तरफ़ मुड़कर कहा, "पापा, जिसने भी ये काग़ज़ दीवार में रखा, वो ज़िंदा है?"
पापा ने जवाब नहीं दिया। सिर्फ़ खिड़की से बाहर देखते रहे।
"पापा।"
"अभी नहीं, बेटा," उन्होंने धीमे से कहा। "पहले मुनीम।"
राजेंद्र ने गाड़ी पुराने बाज़ार के मोड़ पर रोकी और कहा, "आगे गली तंग है। उतरना पड़ेगा।"
हम उतरे। सुमन ने अपना थैला सँभाला, पापा ने कुर्ते का पल्ला ठीक किया और मैं आगे बढ़ा — घुटना अभी भी चरचरा रहा था। गली में बत्ती कम थी। एक तरफ़ बंद दुकानें, दूसरी तरफ़ घरों की दीवारें जिन पर पुराने पोस्टरों के चिह्न रह गए थे।
सुमन ने एक मोड़ पर हाथ रोका।
"यहीं है," उसने कहा। "पान की दुकान के पीछे।"
सामने एक छोटी पान की दुकान थी, तिरपाल लटका था और अंदर एक बूढ़ा बैठा तमाखू मल रहा था। हम उसके पास पहुँचे।
"भाई साहब, मुनीम जी का घर?" मैंने पूछा।
बूढ़े ने सिर उठाया, हमें देखा और फिर पीछे की तरफ़ सिर हिलाया।
"पीछे आँगन में," उसने कहा। "पर अभी आधा घंटा पहले उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला किसी को। लालटेन जल रही है, पर बाहर सन्नाटा है।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा और पीछे बढ़ दिया। पान की दुकान के पीछे एक तंग रास्ता था, जो छोटे से आँगन में खुलता था। आँगन के पीछे लकड़ी का दरवाज़ा, ऊपर जस्ते की टपकती छत। दरवाज़े पर लटकती लालटेन धीमी जल रही थी।
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