The Token System – Chapter 971
थानेदार ने काग़ज़ देखा। उसका चेहरा पढ़ा नहीं जा सका।
"यह काग़ज़ अदालत में जाना चाहिए," सुमन ने कहा। "और यह काग़ज़ भी।" उसने अपना पुराना लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाया।
थानेदार ने दोनों देखे।
"तुम डॉक्टर हो?"
"हाँ। डॉक्टर सुमन। यह अस्पताल का काग़ज़ है — आठ साल पुराना। इसमें एक मरीज़ का नाम है जिसे भवानी के होम भेजा गया था और जो मर गया।"
थानेदार ने सुमन की तरफ़ देखा।
"तुम्हें पता है कि तुम किसके ख़िलाफ़ बोल रही हो?"
"पता है।"
थानेदार ने कुर्सी पीछे की और दोनों काग़ज़ एक फ़ाइल में रखे।
"मैं इन्हें ज़िले के दफ़्तर भेजूँगा," उसने कहा। "और तुम्हारी शिकायत दर्ज करूँगा — काग़ज़ चुराने की। जाँच होगी।"
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात।"
"क्या?"
"मेरे पास काग़ज़ की कॉपी है। तीन जगह रखी है। अगर मुझे कुछ हुआ, तो तीन जगह से निकलेगी।"
थानेदार ने मेरी तरफ़ देखा।
"धमकी दे रहे हो?"
"नहीं," मैंने कहा। "हिसाब बता रहा हूँ।"
बाहर निकला तो सुमन मेरे साथ थी।
"ठीक किया," उसने कहा। "पर अब चलो — तुम्हारी माँ को बताना होगा।"
"क्या?"
"काग़ज़ में उनका नाम है," सुमन ने कहा। "और वो लाइन — 'मेरे बेटे को मत बताना' — उन्होंने लिखी है। यह उनका राज़ है। तुम्हें यह उनसे सुनना चाहिए।"
मैं रुका।
"आज?"
"आज," सुमन ने कहा। "क्योंकि अब भवानी को भी पता है कि काग़ज़ में कौशल्या का नाम है। और वो अगला हमला वहीं करेगा — तुम्हारी माँ पर।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था, पर हल्का — जैसे ख़ाली हो।
"टोकन सो रहा है," मैंने कहा।
"क्या मतलब?"
"पता नहीं। पर जब वो चुप होता है, तो मुझे लगता है कुछ बड़ा आने वाला है — जो मेरे बस में नहीं।"
सुमन ने गाड़ी चालू की।
"तो चलो," उसने कहा। "बड़ा आने से पहले हम थोड़ा छोटा काम कर लें — माँ से सच सुन लें।"
गाड़ी ने मोड़ लिया। पीछे आईने में थाना छोटा होता गया। और उसके बाहर खड़ा पान वाला, जो अब फ़ोन पर था।
हवेली की तरफ़ से एक बार फिर धुआँ उठा — पतला, काला, जैसे किसी ने काग़ज़ जलाया हो और फिर बुझा दिया हो।
मेरे सीने पर काग़ज़ की जगह अब ख़ालीपन था। और जेब में टोकन, जो चुप था — पर उस चुप्पी में कुछ था जो घुटने के दर्द से भी ज़्यादा चुभ रहा था।
गाड़ी रुकी तो सामने हवेली का गेट खुला था। खुला नहीं, टूटा था — एक पल्ला टेढ़ा लटक रहा था। आँगन में कोई नहीं दिख रहा था, पर मशाल की रोशनी दीवारों पर काँप रही थी।
"रुको," मैंने कहा। "सीधे अंदर नहीं।"
सुमन ने गाड़ी पीछे की तरफ़ मोड़ी, आम के पेड़ों के नीचे।
"माँ कहाँ होंगी?"
"पीछे के कमरे में," मैंने कहा। "जब भी डरती हैं, वहीं जाती हैं। पुराने ताखे के नीचे।"
हम पिछवाड़े की तरफ़ से गए। दीवार पर चढ़ने के लिए पत्थर का एक टुकड़ा रखा था — बचपन में मैं यहीं से चुपके से निकलता था। अब भी वहीं पड़ा था।
"तुम चढ़ सकती हो?"
"मैं डॉक्टर हूँ, पहाड़ नहीं चढ़ती," सुमन ने कहा और पहले ही दीवार पर पैर रख दिया। "ऊपर खींचना मुझे।"
मैं हँसा — पहली बार कई घंटों में। उसे खींचा। दोनों गिरे, धूल उड़ी, पर अंदर पहुँच गए।
पीछे का आँगन सूना था। पर एक जगह ज़मीन पर पानी गिर रहा था — टोंटी खुली छूट गई थी, और उसमें राख बह रही थी।
"किसी ने यहाँ कुछ जलाया है," सुमन ने धीरे कहा।
"माँ ने," मैंने कहा। "उन्हें लगता है जलाने से डर निकल जाता है।"
पीछे के कमरे का दरवाज़ा खुला था। अंदर लालटेन जल रही थी। माँ ताखे के नीचे बैठी थीं, गोद में एक लोहे का डिब्बा, और सामने ज़मीन पर काग़ज़ों का ढेर — आधे फटे, आधे जले।
"माँ।"
वो ऊपर देखने ही वाली थीं कि सुमन आगे बढ़ी।
"कौशल्या जी। मैं सुमन हूँ। मन्नू की दोस्त। आपने मुझे फ़ोन किया था, रात में।"
माँ ने सुमन को देखा। फिर मुझे। फिर डिब्बा अपनी छाती से चिपका लिया।
"तूने जला दिए," मैंने कहा। "सब?"
"जो मेरे थे," माँ बोलीं, आवाज़ सूखी। "जो मेरे नहीं थे, वो नहीं जले।"
सुमन ज़मीन पर बैठ गई। "कौशल्या जी, मैंने वो काग़ज़ पढ़ लिया है। जिसमें आपका नाम है।"
माँ के हाथ डिब्बे पर कस गए।
"तो अब तू भी जानती है," वो बोलीं। "तो अब मुझसे पूछने क्यों आई?"
"क्योंकि काग़ज़ नहीं बताता कि आपने क्यों छिपाया," सुमन ने कहा। "वो बस बताता है कि आपने छिपाया। बाकी आप ही बताओगी।"
माँ ने लंबी साँस ली। लालटेन की लौ काँपी।
"मैं उस वक़्त सोलह की थी," वो बोलीं। "सुखदेव माली इस हवेली का माली था। उसने मेरे बाप को एक काम दिया था — खेत के काग़ज़ ठीक करने का। मैं उसके साथ जाती थी। एक दिन भवानी ने मुझे काग़ज़ों के साथ अलमारी के पीछे देख लिया। मैंने दो नाम पढ़ लिए थे।"
"कौन से?"
"भवानी के बाप का, और एक दूसरे का। उस दूसरे का नाम था — मोहन लाल।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा।
"यह वो ही नाम है," उसने कहा, "जो मेरे काग़ज़ पर है। जो मरीज़ मर गया।"
माँ ने सिर हिलाया।
"भवानी ने मुझे डराया — कहेगा कि ज़मीन मेरे बाप के नाम है, चोरी से है। मेरे बाप डर गए। उन्होंने एक काग़ज़ पर दस्तख़त कर दिए — हम अपने हिस्से का दावा छोड़ते हैं। भवानी ने बदले में मुझे नौकरी दी। तब से मैं इस हवेली की रसोई में हूँ।"
"और सुखदेव?"
"वो समझ गया कि मैंने कुछ पढ़ लिया है। उसने मेरे नाम वाले काग़ज़ के नीचे एक लाइन लिखी — मेरी लिखाई में, मेरे हाथ से। कहा, यह तेरी सुरक्षा है। जिस दिन भवानी इसे छुए, यह अदालत में जाएगा।"
"और वो लाइन — 'मेरे बेटे को मत बताना'?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने कभी नहीं देखा।
"वो मैंने लिखी," वो बोलीं। "क्योंकि मुझे पता था, तू पढ़ेगा तो लड़ने चला जाएगा। और भवानी तुझे मिट्टी में मिला देगा। मैं तेरे बाप को भी नहीं बचा पाई। तुझे नहीं खो सकती।"
कमरे में चुप्पी थी — गाढ़ी, जैसे पानी।
मैंने घुटनों के बल बैठकर डिब्बा खोला। उसमें कुछ नहीं था — बस एक पुरानी चूड़ी, बाप की घड़ी, और मेरी कक्षा पाँच की तस्वीर।
"माँ," मैंने कहा। "मैं आज सुबह तक तेरा बेटा था। अब भी हूँ। बस अब मैं डर कर नहीं भागूँगा।"
वो फूट-फूटकर रोई — पहली बार, जितना मैंने कभी नहीं देखा। सुमन ने उनका कंधा पकड़ा।
तभी बाहर से आवाज़ आई। राजेंद्र की।
"मन्नू! जल्दी!"
हम भागे। आँगन में राजेंद्र खड़ा था, हाथ में मोबाइल, चेहरा पीला।
"देख," उसने फ़ोन थमाया।
स्क्रीन पर एक फोटो थी। काग़ज़ की। साफ़, पूरा। और उसके नीचे लिखा था — "भवानी जी, पंद्रह मिनट में पूरी हवेली के ग्रुप में। तय करो क्या करना है।"
"किसने भेजा?"
"मोहित," राजेंद्र ने कहा। "उसका नंबर है। भवानी का गुंडा।"
सुमन ने फ़ोन छीना। फोटो ज़ूम की। चेहरा सख़्त हो गया।
"देख," उसने कहा। "फोटो आठ साल पुरानी लग रही है।"
"क्या?"
"काग़ज़ की धार ली हुई है, कोना मुड़ा है — बिल्कुल वैसा ही जैसा मेरे लिफ़ाफ़े में था। यह वो काग़ज़ है।" उसकी आवाज़ धीमी हुई। "यह वही काग़ज़ है जिसके लिए भवानी ने मुझे आठ साल पहले धमकाया था। उसने कहा था — अगर तू बोली, तो तेरा अस्पताल जल जाएगा। मैं डर गई, चुप रही। मरीज़ मर गया, मैंने कुछ नहीं किया।"
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