The Token System – Chapter 970
भवानी ने मशाल नीचे नहीं की। उसने मशाल मेरी तरफ़ उठाई और मैंने काग़ज़ सीने से लगाया।
पुलिस के सायरन पास आ रहे थे। भवानी ने एक बार आँगन देखा, फिर मेरी तरफ़।
"करन। मोहित।" उसने सिर्फ़ दो नाम लिए।
दो आदमी पानी में से निकले। मैंने उनके चेहरे नहीं देखे, बस सुना — पानी में पैर पड़ने की आवाज़, और फिर मुझ पर एक जिस्म गिरा। मैं आँगन की ओर भागा। सामने बंसी खड़ा था, लाठी अंदाज़ में।
"जा!" उसने चिल्लाया।
करन बंसी से टकराया। बंसी की लाठी उसके कंधे पर पड़ी और टूट गई। मोहित ने मेरी कमीज़ की तरफ़ हाथ बढ़ाया। मैंने पीछे के फाटक की तरफ़ छलाँग लगाई।
फाटक का लोहे का कुंडा मेरे हाथ में आया। मैंने खींचा। दरवाज़ा खुला। पीछे की कच्ची गली थी — पत्थर, कीचड़, और अस्पताल की दीवार।
मैं भागा। घुटने की पट्टी खुल गई और घुटना फिर छिला। दर्द नहीं महसूस हुआ, बस गरम पानी जैसा कुछ टपका।
गली के आख़िर में एक औरत बाल्टी लिए खड़ी थी। मैं उससे टकराया। पानी फैल गया।
"अरे—"
"माफ़ करना," मैंने कहा और आगे बढ़ा।
अस्पताल की पिछली दीवार। मैंने मोड़ लिया। वार्ड तीन का पिछला रास्ता — जहाँ मरीज़ों के परिवार बैठते हैं, धूप सेंकते हैं, चाय पीते हैं।
करन ने मेरी कमीज़ पीछे से पकड़ी।
धक्का। मैं दीवार से चिपक गया। सीने पर काग़ज़ महसूस हुआ, उसकी तह उखड़ने लगी।
"निकाल," करन ने कहा।
मोहित मेरे सामने आया। उसका हाथ मेरी कमीज़ के कॉलर पर था।
मैंने जितनी तेज़ आवाज़ में हो सकता था, चिल्लाया—
"चोरी! चोरी! कोई है — चोरी!"
करन ने मेरा मुँह दबाने के लिए हाथ बढ़ाया।
पहला आदमी वार्ड के दरवाज़े से निकला — एक बूढ़ा, जिसकी बहू अंदर भर्ती थी, मैंने उसे सुबह चाय पिलाई थी।
"क्या हो रहा है?"
"ये मेरा काग़ज़ छीन रहे हैं," मैंने कहा।
फिर दूसरा आदमी आया। फिर एक औरत, बच्चा गोद में। फिर दो और। आँगन भरने लगा।
करन ने मोहित की तरफ़ देखा। मोहित ने मेरा कॉलर छोड़ा।
"भागो," करन ने कहा।
"रुको!" सुमन की आवाज़ आई। वो तेज़ चलती हुई आ रही थी, पीछे एक गार्ड।
"डॉक्टर साहब—" मोहित मुस्कुराया। "हम तो—"
"तुम दोनों को मैं पहचानती हूँ," सुमन ने कहा। "भवानी के आदमी हो। यहाँ से निकलो — और अगर मैंने तुम्हें फिर इस अस्पताल में देखा, तो सीधे थाने।"
करन ने गुस्से से मेरी तरफ़ देखा।
"चल," मोहित ने उसका बाजू पकड़ा। "चल यहाँ से।"
दोनों भीड़ को चीरकर भागे। एक बूढ़े आदमी ने करन की कलाई पकड़ने की कोशिश की, पर वो छुड़ाकर निकल गया।
सुमन मेरे पास घुटने पर बैठी।
"तुम्हारा घुटना।"
"ठीक है।"
"कुछ ठीक नहीं है," उसने कहा। "उठो। मेरे केबिन में चलो।"
मैं उठा। काग़ज़ अभी सीने से लगा था। मैंने उसे छुआ — सूखा था, सिर्फ़ कोना थोड़ा मुड़ा था।
केबिन में सुमन ने दरवाज़ा बंद किया और पर्दा खींचा। मैं कुर्सी पर बैठा और उसने घुटना साफ़ करके पट्टी बदली।
"करन और मोहित," मैंने कहा। "भवानी ने उन्हें नाम लेकर बुलाया था। जैसे उसने पहले से सोच रखा हो — काग़ज़ छीनने का इंतज़ाम।"
"हाँ," सुमन ने कहा। "और मोहित के हाथ में मोबाइल था।"
मैं रुका।
"क्या?"
"मैंने देखा," सुमन ने कहा। "जब वो भाग रहा था — उसके हाथ में मोबाइल था, और स्क्रीन चालू थी। कैमरा।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा गिरा।
"उसने फोटो खींची।"
"लगता है हाँ।"
मैंने काग़ज़ सीने से निकाला। हाथ काँप रहे थे। मैंने उसे सुमन की मेज़ पर रखा।
सुमन ने दस्ताने पहने — जैसे हर चीज़ से पहले दस्ताने — और काग़ज़ के किनारे को उठाया।
उसने पढ़ा। एक बार। दो बार। फिर उसने पीछे की लाइनें पढ़ीं।
"यह वही काग़ज़ है," उसने धीरे से कहा।
"क्या?"
"यह वही काग़ज़ है जिसके लिए भवानी ने मुझे आठ साल पहले धमकाया था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा सपाट था, पर आँखें — आँखें उस तरह स्थिर थीं, जैसे अंदर कुछ रुक गया हो।
"तुम्हें याद है?" मैंने पूछा।
"मैं तब इंटर्न थी," सुमन ने कहा। "इसी अस्पताल में। एक रात एक मरीज़ आया — साँस की तकलीफ़। उसे भवानी के होम भेजा गया था। तीन दिन बाद ख़बर आई कि मर गया। मैंने पूछा तो मुझे बुलाया गया और कहा गया कि मैं नौकरी से बाहर हो जाऊँगी अगर मैंने मुँह खोला।"
"किसने कहा?"
"तब का मुख्य चिकित्सा अधिकारी। पर उसके पीछे भवानी था।"
उसने अपनी दराज़ खोली। अंदर काग़ज़ों के बीच से एक लिफ़ाफ़ा निकाला। पुराना, पीला, मुड़ा हुआ।
"यह उसी मरीज़ का काग़ज़ है," उसने कहा। "मैंने आठ साल रखा है। मुझे नहीं पता था कि कब काम आएगा।"
उसने काग़ज़ मेरे काग़ज़ के बगल में रखा।
"पर अब एक दिक्कत है," उसने कहा। "भवानी को उम्मीद थी कि काग़ज़ में उसका नाम है। उसने छीनने की कोशिश की। नहीं मिला। तो अब क्या करेगा?"
"क्या?"
"वो तुम्हारे नाम पर झूठा इल्ज़ाम लगाएगा," उसने कहा। "कहेगा कि तुमने काग़ज़ चुराए। और उसके पास फोटो है।"
मैं कुछ देर चुप बैठा।
"तो हमें पहले जाना होगा," मैंने कहा।
"कहाँ?"
"थाने। अभी। यह काग़ज़ जमा करना होगा — एक कॉपी अपने पास, एक थाने में। और एक सक्सेना के पास।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हारे पापा?"
"वो हवेली में हैं। राजेंद्र उनके साथ है। भवानी के आदमी भाग रहे हैं। अब वहाँ पुलिस है। अभी उनका नुक़सान नहीं होगा।"
मैंने काग़ज़ उठाया और मोड़कर कमीज़ के अंदर रखा।
"मैं चलता हूँ।"
"मैं साथ चलूँगी," सुमन ने कहा।
"तुम्हारी ड्यूटी?"
"ड्यूटी मरीज़ की होती है," उसने कहा। "काग़ज़ की नहीं। और आज मरीज़ यही काग़ज़ है। कम से कम एक दिन।"
हम बाहर निकले। सुमन ने गार्ड को बुलाया और कहा कि कोई भी भवानी का आदमी अंदर न आए।
अस्पताल के मुख्य फाटक पर एक सफ़ेद गाड़ी रुकी थी। उसमें से कोई उतरा नहीं। सिर्फ़ खिड़की से एक हाथ निकला और काग़ज़ का टुकड़ा गिराकर गाड़ी चली गई।
मैंने उठाया। पीली पर्ची। कोना-चिह्न। और एक लाइन —
"फोटो तेरे पास नहीं, मेरे पास है। अब तू चोर है।"
मैंने पर्ची सुमन को दी।
"देखा?" उसने कहा। "मैंने कहा था।"
राजेंद्र ने फ़ोन किया। मैंने सुना — उसकी आवाज़ तेज़ थी।
"हवेली के बाहर चार गाड़ियाँ हैं," उसने कहा। "दो सफ़ेद, दो काली। कोई अंदर नहीं आ रहा। पर सब देख रहे हैं। भवानी आँगन में बैठा है — हाथ में मशाल अभी भी। और काग़ज़ छिनने की ख़बर फैल गई है।"
"कैसे?"
"भवानी के आदमी चिल्ला रहे हैं — 'मनोहर ने काग़ज़ चुराए।'"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा।
"ठीक है," मैंने कहा। "मैं पहले थाने जा रहा हूँ। तुम वहीं रहो। पापा को अकेला मत छोड़ो।"
"अकेले?" राजेंद्र हँसा। "पापा अकेले नहीं हैं। बंसी उनके साथ है, और बंसी की लाठी टूट गई तो उसने पापा के डंडे से एक आदमी की टाँग तोड़ दी।"
मैंने फ़ोन रखा।
थाने के बाहर भीड़ थी। अख़बार वाला एक आदमी फोटो खींच रहा था। पान की दुकान पर तीन आदमी खड़े थे, जो मुझे देखकर चुप हो गए।
अंदर जाने पर थानेदार ने मेरी तरफ़ देखा।
"मनोहर?"
"जी।"
"तुम्हारे ख़िलाफ़ शिकायत आई है," उसने कहा। "हवेली से काग़ज़ चुराने की।"
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा।
"यह काग़ज़ है," मैंने कहा। "और मैंने नहीं चुराया। यह मेरे दादा का है — सुखदेव माली। और इस पर चार नाम हैं। एक नाम मेरी माँ का है — कौशल्या।"
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