The Token System – Chapter 964
वो मुड़ा और गाड़ी की तरफ़ चला। पर जाते वक़्त रुका और अपनी छड़ी से हवेली की दीवार की तरफ़ इशारा किया — वो दीवार, जिसके नीचे सीढ़ियाँ थीं।
"अंदर क्या मिला?" उसने पूछा।
"हिसाब," मैंने कहा।
"हिसाब तो हम सबका बाक़ी है," वो हँसा और जीप में बैठ गया।
गाड़ियाँ चली गईं।
मैं दीवार की तरफ़ मुड़ा। सीढ़ियों का मुँह अभी भी खुला था, पर जैसे ही मैंने उसकी तरफ़ देखा, पत्थर वापस खिसकता हुआ दिखा — नहीं, मैंने देखा कि पत्थर नहीं खिसका, उसके नीचे की ज़मीन खिसकी — जैसे हवेली ने ख़ुद अपना दरवाज़ा बंद कर लिया हो।
"ये क्या हुआ?" बंसी ने कहा, जो पीछे से लौट आया था।
"हवेली ने दरवाज़ा बंद कर दिया," मैंने कहा।
"बंद? किसने किया?"
"किसी ने नहीं," सरोज काकी पीछे खड़ी थीं, लाठी पर झुकी हुई। "हवेली ने ख़ुद किया। क्योंकि जो अंदर आया, वो अब अंदर का है। हवेली दरवाज़ा खोलती है तो ख़ुद खोलती है, बंद करती है तो ख़ुद करती है।"
"तो अब अंदर क्या है?" सुमन ने पूछा।
"अब अंदर कुछ नहीं," सरोज काकी ने कहा। "अब जो कुछ भी है, बाहर है।"
मैंने जेब टटोली — डायरी अभी भी कमीज़ के अंदर थी, और चाबी जेब में। वो चाबी जिसकी पर्ची कहती थी — "चार अब भी बाक़ी हैं।"
"भाई," छोटू ने करीब आकर कहा। वो डरा हुआ था, पर आँखें साफ़ थीं। "मुझे एक बात समझ नहीं आई। वो आदमी कह रहा था कि तुम्हारे पास दो चीज़ें हैं। पर तुम्हारे पास तो एक ही थी। डायरी।"
मैंने उसे देखा।
"क्योंकि काग़ज़ मेरे पास नहीं है," मैंने कहा।
"तो किसके पास है?"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा।
"उसके पास," मैंने कहा। "मैंने हवेली के भीतरी कमरे से काग़ज़ निकालकर उसे सुमन की जेब में रख दिया था।"
सुमन ने जेब टटोली और मुस्कुराई।
"अब समझी," उसने कहा।
"अब मैं समझा," राजेंद्र ने कहा। "तूने मोटे को यूँ ही नहीं रोका था। तूने उसे ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि काग़ज़ तेरे पास है।"
"और भवानी को भी," मैंने कहा।
सरोज काकी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था, जो किसी की नज़र में नहीं आया था।
"तू मेरे ससुर जैसा है," उन्होंने कहा। "वो भी हिसाब में सीधा नहीं चलता था।"
मैंने डायरी निकाली — फिर से आख़िरी पन्ना खोला।
"मैं, मनोहर, आज से बीस साल बाद आने वाले ख़ुद को लिख रहा हूँ — यह हवेली तेरी है, पर पहले तू यह साबित कर कि तूने इसे कमाया है।"
मैंने सरोज काकी की तरफ़ देखा।
"मुझे नहीं पता कि ये लिखाई मेरी कैसे है," मैंने कहा। "पर एक बात साफ़ है — जिसने भी ये लिखा, वो मुझे जानता था। और जो मुझे जानता है, वो मेरे आस-पास ही है।"
राजेंद्र ने सिर हिलाया। "तो अब?"
"अब," मैंने डायरी जेब में रखी और हवेली के पिछले दरवाज़े की तरफ़ देखा, "हमें वो सात मंज़िलें ढूँढनी हैं, जिनके बारे में चाबी की पर्ची कहती है। हवेली सिर्फ़ एक शब्द बोलती है — 'चला।' तो चलते हैं।"
सुमन ने थैला उठाया। बंसी ने फावड़ा कंधे पर रखा। छोटू मेरे हाथ में उँगली डालकर चलने लगा। सरोज काकी ने लाठी आगे की और हवेली के मुख्य गेट की तरफ़ बढ़ गईं।
हवा में कुछ था — मिट्टी और पुराने काग़ज़ की गंध। और जेब में टोकन ठंडा था, पर जैसे ही मैंने गेट की पहली सीढ़ी पर पैर रखा, उसमें सबसे पहले एक शब्द उभरा — "सात।"
फिर दूसरा शब्द — "बीस।"
फिर लकीर उभरी — बीसवीं लकीर।
और टोकन चुप हो गया।
॥
डॉक्टर सुमन अस्पताल की छत वाले बरामदे में खड़ी थीं, सिगरेट नहीं, सिर्फ़ चाय का कप। रात के ग्यारह बज रहे थे। मैं सीढ़ियाँ चढ़ा, घुटने पर पट्टी की गंध और हाथ में वो काली जिल्द की डायरी। मैंने बिना बोले डायरी उनके हाथ में रख दी और जेब से वो काग़ज़ निकाला जो हवेली की भीतरी कोठरी से आया था।
"ये सब क्या है?" उन्होंने पूछा, चाय रखकर।
"एक-एक कर बताता हूँ," मैंने कहा। "पर पहले ये पढ़िए। आख़िरी पन्ना।"
सुमन ने डायरी खोली। बत्ती के नीचे उनका चेहरा पत्थर जैसा था, जैसे कोई मुर्दा काग़ज़ पढ़ रही हो। फिर उन्होंने आख़िरी पन्ना उलटा।
"मन्नू," उन्होंने कहा, "ये लिखाई तेरी हैं।"
"हाँ।"
"तू बीस साल पहले कहाँ था?"
"आठ साल का।"
"तो फिर?"
मैंने कंधे उचके।
"मैं सोचता रहा। फिर लगा — जिसने भी ये लिखा, वो मुझे जानता है। और मेरी लिखाई की नक़ल कर सकता है। यानी वो मेरे पास ही है।"
सुमन ने डायरी बंद की, बरामदे की रेलिंग पर रख दी, और अपना कप उठाया।
"आज भवानी ने हमारे सामने कबूल किया कि उसके बाप के कमरे की चाबी उसके पास भी नहीं। उसका मतलब?"
मैंने काग़ज़ खोला।
"मतलब ये कि हवेली का हिसाब चार हिस्सों में बँटा है और तीन तो हमारे पास हैं। और चौथा… वो किसी और के पास है। कोई है जो भवानी से ऊपर बैठा है।"
"तीसरा," सुमन ने कहा।
"तीसरा।"
वो चुप रहीं। फिर बोलीं, "मुझे अंदर आ।"
उनका केबिन छोटा था, दो कुर्सियाँ, एक मेज़, दराज़ में फाइलों का ढेर। वो बैठीं और मुझे बैठने का इशारा किया।
"मन्नू," उन्होंने कहा, "अब तक मैं तेरे पीछे-पीछे चल रही थी। मरीज़ बचाने के लिए, अपना ज़मीर साफ़ करने के लिए। पर अब बात बदल गई है। जो काग़ज़ तेरे पास है, जो हवेली है, जो मरीज़ों के काग़ज़ भवानी के होम भेजे गए — ये सब एक ही खेल का हिस्सा है। और मैं इस खेल को आधा छोड़कर हटने वालों में नहीं हूँ।"
"डॉक्टर साहब, आपकी नौकरी—"
"नौकरी चार दिन की चीज़ है," उन्होंने कहा, "ज़मीर पूरी ज़िंदगी की।"
तभी फ़ोन बजा। सुमन ने उठाया, सुना, और उनका चेहरा बदल गया। एक-दो मिनट बाद उन्होंने फ़ोन रखा।
"राजेंद्र था," उन्होंने कहा। "अस्पताल के बोर्ड से आदेश निकल गया है। भवानी ने अपनी तरफ़ के दो सदस्यों से हस्ताक्षर करवा दिए। अब मेरी छुट्टी, सुबह तक अस्पताल छोड़ना होगा।"
"डॉक्टर साहब—"
"तो अब मैं तय कर चुकी हूँ," उन्होंने मेरी तरफ़ देखकर कहा, "पहले अपनी गवाही दर्ज करानी है। आज रात। अभी।"
उन्होंने दराज़ खोली, एक फ़ाइल निकाली, और थैला उठाया।
"चल। वकील सक्सेना के घर।"
"इस वक़्त?" मैंने कहा। "रात के ग्यारह बजे?"
"केस किसी मुलाहिज़े से नहीं जीता जाता," सुमन ने कहा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गईं।
मैं उनके पीछे चला। सीढ़ियों पर मुझे जेब में टोकन हल्का-सा हिलता लगा। मैंने हाथ डाला — वो चुप था, बस ठंडा।
वकील सक्सेना का घर शहर के उस हिस्से में था जहाँ रात में भी दीये जलते हैं। छोटा-सा दरवाज़ा, आगे पीपल, और उसके नीचे एक बूढ़ा दरबान जो हमें देखकर सीधा हो गया।
"साहब सो रही हैं," उसने कहा।
"जगाओ," सुमन ने कहा। "कहो डॉक्टर सुमन आई है और हवेली का हिसाब लेकर आई है।"
दो मिनट बाद हम अंदर थे। सक्सेना — साठ के आसपास, चश्मा, सिर पर सफ़ेद सूती स्कार्फ़, हाथ में कॉफ़ी — हमें बैठक में ले गईं। लकड़ी की मेज़ पर काग़ज़ों का ढेर था, जैसे वो पहले से ही हमारा इंतज़ार कर रही थीं।
"मुझे रात में उठाना पसंद नहीं है," उन्होंने कहा, "पर जब राजेंद्र का फ़ोन आया तो समझ गई।"
"राजेंद्र ने भी फ़ोन किया?" मैंने पूछा।
"तीन मिनट पहले। कह रहा था — मन्नू और सुमन आ रहे हैं। पूरा काग़ज़ साथ है। और एक बात कह रहा था — 'जो काग़ज़ है, वो असली है, पर जिसने बनाया, वो भी असली है, और वो अभी ज़िंदा है।'"
सुमन ने डायरी मेज़ पर रखी।
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