The Token System – Chapter 963
"मैं, मनोहर, आज से बीस साल बाद आने वाले ख़ुद को लिख रहा हूँ — यह हवेली तेरी है, पर पहले तू यह साबित कर कि तूने इसे कमाया है।"
पीछे से बंसी ने पूछा, "क्या लिखा है?"
मैंने डायरी बंद कर दी।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। पर मेरा हाथ काँप रहा था और सरोज काकी ने वो कंपन देख लिया।
उन्होंने मेरे हाथ से डायरी ली। आख़िरी पन्ना खोला। पढ़ा। और फिर उनका सिर उठा और उन्होंने मुझे देखा, ऐसे जैसे दरवाज़ा खोलने वाला नहीं, कोई और सामने खड़ा हो।
"ये तेरी लिखाई है," उन्होंने कहा। "और ये डायरी बीस साल पुरानी है।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा।
"तो?"
"तो — मैं अभी तक ये नहीं सोच पा रहा कि मैंने इसे कब लिखा।"
सरोज काकी ने डायरी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये काग़ज़ नहीं है। ये हिसाब है। और हिसाब का सवाल ये है कि तू अब क्या करेगा।"
राजेंद्र बीच में आए। "मैं समझा नहीं — भवानी की हवेली में हमारे जैसा कुछ मिलता है, और तुम उसे जेब में डालकर सोच रहे हो कि लिखा क्या है? मन्नू, ये डायरी अदालत ले जानी है।"
"अदालत ले जाने से पहले," मैंने कहा, "मुझे समझना होगा कि मेरी लिखाई उसमें कैसे आई।"
"और अगर इसका जवाब तेरे अंदर ही हो?" सुमन ने कहा। "दादा की डायरी की नक़ल तू ख़ुद बनाया करता था — तेरे स्कूल के अध्यापक ने कहा था कि तेरे हाथ में लिखावट बहुत साफ़ है, इसलिए कभी-कभी तुझसे काग़ज़ लिखवाए जाते थे।"
मुझे याद आया। स्कूल में मास्टर जी मुझसे हर महीने की हाज़िरी लिखवाते थे — यही साफ़ लिखाई में।
"तो कोई मेरी लिखाई की नक़ल कर सकता है?" मैंने पूछा।
"नक़ल नहीं," सरोज काकी ने कहा। "हिसाब। जब हवेली लिखती है, तो जिस हाथ से लिखा जाता है, वही हाथ हवेली का हाथ हो जाता है। मेरे ससुर कहते थे — ये हवेली काग़ज़ नहीं लिखती, ये हवेली आदमी का हाथ पकड़कर लिखवाती है।"
"ये सब क्या है?" बंसी ने कहा। "सीधी बात करो।"
"सीधी बात ये है," सरोज काकी ने कहा, "कि ये डायरी बीस साल पहले किसी ने लिखी थी, और उसने अपना हाथ जान-बूझकर मन्नू जैसा बनाया। क्यों? क्योंकि उसे पता था कि मन्नू एक दिन इस हवेली तक पहुँचेगा।"
मेरे हाथ में डायरी थी, पर लग रहा था जैसे डायरी मेरी जेब में गरम हो रही हो। मैंने टोकन की तरफ़ देखा — वो अब भी ठंडा था, पर उस पर कोई नई लकीर, कोई नया शब्द नहीं आया।
"ये डायरी मेरे पास रहेगी," मैंने कहा।
"अदालत ले जानी है —" राजेंद्र ने कहा।
"अदालत तक तो हिसाब जाएगा," मैंने कहा। "पर पहले मैं यह जानूँगा कि बीस साल पहले किसने ये लिखा। और मुझे लगता है कि जवाब यहाँ है।"
मैंने डिब्बे में हाथ डाला। तस्वीर के नीचे एक चीज़ और थी — कुछ लिपटा हुआ, कपड़े में। मैंने खोला — एक छोटी सी पीतल की चाबी थी, बहुत पुरानी, जैसे हवेली के किसी और ताले की हो।
चाबी के साथ एक पर्ची थी।
"जिसने तीसरा दरवाज़ा खोला, उसके लिए। चार अब भी बाक़ी हैं। हवेली अपनी सात मंज़िलों में सिर्फ़ एक कहती है — चला।"
मैंने पर्ची राजेंद्र को पढ़ने के लिए दी। राजेंद्र ने दो बार पढ़ा। फिर सुमन को दी।
"चार?" सुमन ने कहा। "यहाँ तो तीन थे।"
"नहीं," सरोज काकी ने कहा। "तीन हिस्से थे। पर चौथा जिसने दिया, वो अभी तक गिनती में नहीं आया।"
मैं सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ा, तो छोटू ने ऊपर से आवाज़ दी:
"भाई! ऊपर कोई आ रहा है! तीन गाड़ियाँ!"
मैंने कपड़े में लिपटी चाबी जेब में रखी और डायरी कमीज़ के अंदर। बंसी ने फावड़ा उठाया और राजेंद्र ने कमर पर हाथ रखा। सरोज काकी लाठी टिकाए सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ीं।
"कितनी दूर?" मैंने पूछा।
"गली के मोड़ पर," छोटू ने कहा। "पर वो रुक नहीं रहीं। वो सीधा हवेली की तरफ़ आ रही हैं।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "अगर वो हवेली में घुस गए —"
"तो हम वो नहीं होंगे जो पहले आए थे," मैंने कहा। "बंसी, सरोज काकी को पीछे के रास्ते से ले जा। राजेंद्र, तुम रुको — तुम पुलिस हो, तुम्हारा होना ज़रूरी है। सुमन, तुम छोटू के साथ।"
"और तू?" बंसी ने कहा।
"मैं यहीं रहूँगा," मैंने डायरी कमीज़ के अंदर दबाई। "जो आ रहे हैं, वो मेरे पास आएँगे।"
सरोज काकी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर अपनी लाठी मेरी तरफ़ बढ़ाई — नहीं, सिर्फ़ लाठी की नोक मेरे सीने पर टिकाई।
"सम्भाल," उन्होंने कहा। "जो हवेली में मिलता है, वो बाहर के लिए नहीं होता।"
और वो पीछे के रास्ते की तरफ़ मुड़ गईं।
सीढ़ियों से ऊपर आते वक़्त गली में गाड़ियों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। तीन गाड़ियाँ। एक सफ़ेद, दो काली।
दरवाज़े पर पहला आदमी आया — मोटा, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में छड़ी। वो मुझे देखकर रुका, जैसे उसे यक़ीन न हो कि मैं यहाँ हूँ।
"मनोहर?"
"हाँ," मैंने कहा। "तुम कौन हो?"
"मैं तो तेरा ही आदमी हूँ," वो मुस्कुराया। "भवानी साहब ने भेजा है। कहा — मन्नू अकेला है, उसे अकेला मत छोड़ना।"
"भवानी साहब बड़े दयालु हैं," मैंने कहा। "पर मुझे उनके साथ बैठकर चाय पीने की आदत नहीं।"
उसकी मुस्कुराहट थोड़ी फीकी पड़ी। पीछे से दो और आदमी आए, दोनों काले कुर्ते में।
"भवानी साहब कह रहे हैं," मोटे ने कहा, "कि तूने जो कुछ हवेली से निकाला है, वो बाहर ले जाने से पहले एक बार उन्हें दिखा देना। हिसाब की बात है — किसी की नज़र में आ जाना चाहिए।"
"किसकी नज़र? भवानी की?"
"भवानी साहब की।"
"भवानी साहब अभी अदालत में हैं," मैंने कहा। "मुझे अभी-अभी फ़ोन आया था। उनका केस चल रहा है।"
मोटे ने मेरी तरफ़ देखा, फिर पीछे के दोनों आदमियों को। फिर वो हँसा — नीची हँसी, बिना आँखों के।
"तेरे फ़ोन आते हैं?" उसने कहा। "मेरे भी आते हैं। और मेरे फ़ोन पर भवानी साहब ने अभी कहा — मन्नू के पास दो चीज़ें हैं, एक काग़ज़ और एक डायरी। दोनों लेकर आना।"
मैंने ठंडा टोकन जेब में महसूस किया — वो ठंडा ही था। कोई शब्द नहीं, कोई लकीर नहीं। जैसे वो भी सुन रहा हो।
"तुम भवानी के आदमी हो या हिसाब के?" मैंने पूछा।
मोटा रुका।
"क्या कहा?"
"भवानी के आदमी से मैंने ये सुना है — वो 'जो साहब कहें' करते हैं। हिसाब के आदमी से मैंने ये सुना है — वो 'जो हवेली कहे' करते हैं। तुम किसके हो?"
मोटे ने छड़ी उठाई।
"मैं वो हूँ," उसने कहा, "जो तेरे बाद हवेली में घुसेगा।"
तभी पीछे से आवाज़ आई — राजेंद्र की। उन्होंने गाड़ी से पिस्टल निकाली, पर फ़ायर नहीं किया। सिर्फ़ कमर पर टिकाई।
"हवेली का घेरा," राजेंद्र ने कहा, "मेरा इलाक़ा है। तीन गाड़ियाँ, दो पुलिस की, और तुम्हारी? तुम्हारी एक है।"
मोटे ने राजेंद्र को देखा।
"इंस्पेक्टर साहब," उसने कहा, "आप तो अपने ही दायरे में हैं।"
"मैं अंदर हूँ," राजेंद्र ने कहा। "तुम बाहर हो। हवेली का पिछवाड़ा मेरा दायरा है। जो वहाँ घुसेगा, वो गिरफ़्तार होगा। अब चाहे वो भवानी हो या भवानी का आदमी।"
मोटे ने मेरी तरफ़ देखा, फिर छड़ी नीचे की।
"ठीक है," उसने कहा। "पर इंस्पेक्टर साहब, एक बात याद रखना — भवानी साहब ने कहा है कि मन्नू के हाथ में जो भी है, वो अपना नहीं है। और जो अपना नहीं, वो किसी का भी नहीं।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno