The Token System – Chapter 965
"पढ़िए," उन्होंने कहा।
सक्सेना ने डायरी खोली। पन्ने पलटे। जब आख़िरी पन्ने पर पहुँचीं तो रुक गईं।
"ये मन्नू की लिखाई है," उन्होंने कहा।
"मैंने भी यही कहा," सुमन ने कहा।
"पर यह पन्ना बीस साल पुराना है," सक्सेना ने कहा। "स्याही देखो। ये पीली पड़ चुकी है। किनारे घिसे हैं। और यहाँ —" उन्होंने काग़ज़ को बत्ती के नीचे किया, "— देखो, यहाँ नीचे की तरफ़ लिखाई कुरेदी गई है। किसी ने बाद में कुछ मिटाया है।"
"क्या मिटाया?" मैंने पूछा।
सक्सेना ने मुझे देखा, फिर सुमन को।
"नाम," उन्होंने कहा। "हर पन्ने के कोने पर एक नाम लिखा था। हर नाम के ऊपर एक तारीख़। और हर नाम मिटाया गया है, सिवाय एक के।"
"कौन सा?" सुमन ने पूछा।
सक्सेना ने पन्ना पलटा और उँगली रखी।
"जमुना देवी," उन्होंने कहा। "यानी सरोज काकी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"तो इसका मतलब?" मैंने पूछा।
"मतलब ये कि जिसने यह डायरी बनाई, वो हवेली के हर हक़दार का नाम जानता था," सक्सेना ने कहा। "और उसने सिर्फ़ एक नाम छोड़ा — जमुना देवी का। क्योंकि वो चाहता था कि सरोज काकी हम तक पहुँचें।"
सुमन की आँखें सिकुड़ीं।
"यानी सरोज काकी हमारे पास जान-बूझकर भेजी गईं?"
"नहीं," सक्सेना ने कहा, "ऐसा नहीं कहूँगी। पर जिसने यह डायरी लिखी, वो चाहता था कि सरोज काकी का नाम हमारे सामने आए। क्योंकि सरोज काकी के पास कुछ है जो उस आदमी को चाहिए।"
"क्या?" मैंने पूछा।
"वो काग़ज़," सक्सेना ने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया जो मैंने हवेली की कोठरी से निकाला था। "इसे दें।"
मैंने दिया। उन्होंने खोला, पढ़ा, और फिर पढ़ती ही रह गईं। दो मिनट तक वो पन्ने से आँख नहीं हटाईं। फिर बोलीं —
"इस पर जो हस्ताक्षर हैं — जमुना देवी के ससुर के — ये उनके नहीं हैं।"
सुमन और मैंने एक-साथ उनकी तरफ़ देखा।
"क्या?" मैंने कहा।
"देखो।" उन्होंने उँगली रखी। "ये हस्ताक्षर का ढंग है, पर इसमें एक बात अलग है। असली हस्ताक्षर में नीचे की लकीर टूटती नहीं है। यहाँ टूटी है। इसका मतलब यह है कि इसे किसी ने नक़ल करके बनाया है। और यह नक़ल उस आदमी ने बनाई जो असली हस्ताक्षर जानता था।"
"भवानी?" सुमन ने कहा।
"नहीं," सक्सेना ने कहा। "भवानी के पास इतनी बारीक नज़र नहीं है। और ये नक़ल बहुत बारीक है।"
वो चुप हो गईं। काग़ज़ को बत्ती के नीचे करके फिर से पढ़ा, फिर मेज़ पर रख दिया और कुर्सी पर पीछे टिक गईं।
"मन्नू," उन्होंने कहा, "यह काम किसी ऐसे आदमी का है जिसने हवेली के हिसाब-किताब की एक-एक लकीर देखी है। जो दिन-रात उन काग़ज़ों के बीच बैठा रहा है। जिसने भवानी के बाप के हाथ को इतनी करीब से देखा है कि वो उसकी नक़ल बना सके।"
"मोहन लाल?" मैंने कहा।
"मोहन लाल तो पाँच पीढ़ियों से हिसाब रखता आया है। पर ये नक़ल इतनी साफ़ है कि इसे किसी ने बैठकर बनाया है — बिना जल्दबाज़ी के। मोहन लाल के पास वो वक़्त नहीं है।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। वो भी मेरी तरफ़ देख रही थीं।
"तो कौन?" सुमन ने पूछा।
सक्सेना ने डायरी उठाई और उसका आख़िरी पन्ना खोला।
"जो मुझे सबसे ज़्यादा चौंकाता है," उन्होंने कहा, "वो यह है कि इस डायरी की लिखाई — जो तुम्हारी है, मन्नू — बीस साल पुरानी है। और स्याही के नीचे, इसके भी नीचे, एक और परत है।"
"दूसरी परत?"
"हाँ। इसे किसी ने पहले लिखा था, फिर मिटाया, फिर दोबारा लिखा। ताकि पढ़ने वाले को लगे कि यह तुम्हारी लिखाई है। और नीचे वाली परत लगभग पचास साल पुरानी है।"
मेरे हाथ काँपने लगे।
"पचास साल पुरानी?" मैंने दोहराया।
"ये डायरी किसी और की थी," सक्सेना ने कहा। "जो पहले लिखी गई, फिर मिटाई गई, फिर तुम्हारे नाम पर दोबारा लिखी गई। और यह सब करने वाला वो आदमी है जो अभी भी ज़िंदा है।"
वो उठकर खिड़की तक गईं। रात का शहर नीचे सो रहा था।
"जिसने यह डायरी बनाई," सक्सेना ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, "वो तुम्हारे घर में रहता है।"
"क्या?" मैं खड़ा हो गया।
"कम से कम इतना तो साफ़ है। क्योंकि इस डायरी की पहली परत — जो पचास साल पुरानी है — उसमें काग़ज़ की गंध है जो सिर्फ़ उसी घर में आती है जहाँ सालों से काग़ज़ रखे जाते हों। और तुम्हारे घर में पापा की बंद कोठरी बीस साल से बंद है।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा।
"पापा?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ फट रही थी। "पापा तो अभी बीस साल बाद लौटे हैं। वो तो अदालत में—"
"मन्नू," सक्सेना ने कहा, "मैं तुम्हारे पापा की बात नहीं कर रही। मैं किसी और की बात कर रही हूँ।"
"कौन?"
"यही तो मैं भी ढूँढ रही हूँ," उन्होंने कहा और मुड़ीं। "पर एक बात पक्की है — जिसने यह काग़ज़ बनाया, वो तुम्हारे घर में रहता है, तुम्हारे साथ रोज़ बैठता है, और तुम्हारे टोकन के बारे में भी जानता है।"
मेरे शरीर से पसीना बह गया।
"मेरे टोकन के बारे में किसी को नहीं पता," मैंने कहा, "सिवाय—"
मैं रुक गया। सुमन ने हाथ आगे किया।
"सिवाय किसके?"
मैंने उन्हें देखा। और अचानक मेरे सामने वो सब चलने लगा — हवेली, दीवारें, पर्चियाँ, वो काग़ज़ जिस पर मेरी ही लिखाई थी, वो लाइन जो मैंने कभी नहीं लिखी, वो नाम जो मैंने कभी नहीं लिया। मैंने डायरी उठाई। पहला पन्ना खोला।
"जो मेरे पास है," मैंने कहा, "वो सिर्फ़ एक आदमी जानता है।"
"कौन?" सुमन ने पूछा।
मैंने डायरी मेज़ पर रखी और दरवाज़े की तरफ़ देखा। बाहर बरामदे में सरोज काकी की लाठी की आवाज़ आई। एक ठक, दो ठक, तीन ठक। फिर आवाज़ आई — "मन्नू, अंदर चल। रात बहुत हो गई।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा।
"सरोज काकी," मैंने कहा। "वो पचास साल से हवेली के हिसाब के बारे में जानती हैं। वो मेरे घर आती-जाती हैं। वो मेरी लिखाई देख चुकी हैं।"
सक्सेना ने धीरे से कहा, "तो क्या वो?"
"नहीं," मैंने कहा। "सरोज काकी बीस साल से चुप बैठी थीं। उन्हें क्या मिलता?"
"सवाल यही है," सक्सेना ने कहा। "उन्हें क्या मिलता।"
बाहर फिर लाठी की आवाज़ आई।
मैंने दरवाज़ा खोला। सरोज काकी बरामदे में खड़ी थीं, लाठी पर झुकी हुई, पीली रोशनी में उनका चेहरा और भी झुर्रीदार लग रहा था। वो मुस्कुराईं।
"अंदर चल," उन्होंने फिर कहा। "मैं तुझसे एक बात कहने आई हूँ।"
"काकी, अभी—"
"अभी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो पहले कभी नहीं था।
मैं पीछे हटा। सुमन आगे आईं।
"सरोज काकी," सुमन ने कहा, "आपको क्या कहना है?"
सरोज काकी ने लाठी ज़मीन पर टिकाई और सीधी खड़ी हो गईं।
"वो काग़ज़," उन्होंने कहा, "जो तुम हवेली से लाए हो — उस पर जो लिखा है, वो सब सच है। पर एक बात झूठी है।"
"कौन सी?" मैंने पूछा।
"यह कि उस पर हस्ताक्षर मेरे ससुर के हैं।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"मैंने ख़ुद देखा है," सरोज काकी ने कहा। "मेरे ससुर के हस्ताक्षर में नीचे की लकीर टूटती थी। यहाँ टूटी है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "जिसने ये बनाया, उसने मेरी नज़र बचाने की कोशिश की। पर मैंने इसे पहले भी देखा है। बीस साल पहले। मेरी रसोई में।"
"किसके हाथ में?" सक्सेना ने पूछा।
सरोज काकी ने धीरे से कहा —
"उस आदमी के हाथ में, जो आज भी हमारे बीच है। और जो कल से ग़ायब है।"
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