The Token System – Chapter 960
सुमन ने शेखर बाबू की कमीज़ के अंदर पीली फ़ाइल देखी, फिर मेरी आँखों में देखा।
"तू अकेले जा रहा है?"
"काकी के घर। उनके बाहर भवानी के आदमी बैठे हैं।"
"मैं साथ चलूँ?"
"तुम यहाँ रहो। अगर मैं दो घंटे में न आऊँ तो राजेंद्र को फ़ोन करना।"
सुमन ने कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गईं। उन्होंने अपनी दराज़ से एक छोटी डिबिया निकाली और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"ये अमर की माँ की थी," उन्होंने कहा। "अमर ने कहा था तुझे देना। रख ले।"
मैंने डिबिया जेब में रखी और बाहर निकल आया।
रामगंज की गली में धूप तिरछी हो चुकी थी। काकी के घर के बाहर दो आदमी बैठे थे — एक चारपाई पर, एक ईंट पर। दोनों सफ़ेद कुर्ते में। दोनों की नज़र गली के मोड़ पर।
चारपाई वाले ने मुझे देखा और उठने लगा।
"रुक," मैंने कहा। "मैं तो ख़ुद आया हूँ।"
"मनोहर," ईंट वाले ने कहा। "तू अच्छा आदमी है। काकी को बीच में मत ला।"
"मैं किसी को बीच में नहीं ला रहा," मैंने कहा। "काग़ज़ काकी के हैं, तुम्हारे नहीं।"
चारपाई वाले ने कदम बढ़ाया। "काग़ज़ काकी के हैं, पर ज़मीन तो—"
"ज़मीन का फ़ैसला तहसील करेगी," मैंने कहा। "तुम्हारा ठाकुर नहीं।"
ईंट वाले ने मेरा रास्ता रोका। "देख मनोहर, हम बात कर रहे हैं। तू आगे बढ़ा तो—"
पीछे से आवाज़ आई।
"तो क्या?"
राजेंड्र थे। लाल बत्ती वाली जीप से उतरे और सीधे आए। उनके पीछे दो सिपाही।
"नीलम सिंह," राजेंद्र ने ईंट वाले की तरफ़ देखा, "तू सात महीने पहले भी इसी गली में बैठा था। मैंने तुझे चेताया था।"
"सर, हम तो—"
"तू हम नहीं कर," राजेंद्र ने कहा। "चल, उठ। दोनों।"
चारपाई वाला खड़ा हुआ और उसने राजेंद्र की तरफ़ हाथ बढ़ाया। राजेंद्र ने उसकी कलाई पकड़कर घुमाई और सिपाही की तरफ़ धकेल दिया।
"चारपाई उठाओ," राजेंद्र ने एक सिपाही से कहा। "थाने ले जाओ।"
आदमी चले गए। गली सूनी हो गई। तभी काकी का दरवाज़ा खुला और वो बाहर आईं। आँखें लाल थीं।
"अंदर आ," उन्होंने कहा। "तेरे लिए एक चीज़ है।"
काकी का घर छोटा था। पीली दीवार, टूटा दरवाज़ा, अनाज के डिब्बे एक कोने में। वो मुझे अंदर ले गईं और दरवाज़ा बंद कर दिया।
"मेरे ससुर," उन्होंने कहा, "बद्रीलाल। उन्होंने मरने से पहले एक पर्ची मुझे दी थी। कहा था — जिस दिन हवेली का हिसाब खुले, ये पर्ची उस आदमी को देना जो सबसे आख़िर में आए।"
"सबसे आख़िर में?"
"मैंने पूछा था — कैसे पहचानूँ?"
"उसने कहा था — वो ख़ुद चला आएगा। जब सब आ चुके होंगे।"
काकी ने अनाज के डिब्बे में हाथ डाला और उसके नीचे ईंट के नीचे से एक चमड़े की छोटी पुड़िया निकाली। खोली। अंदर एक मुड़ी हुई पीली पर्ची थी, जिसके किनारे फटे हुए थे।
"जब तेरे पापा आए थे उस रात," काकी ने कहा, "मेरे ससुर ने कुछ देखा था। उन्होंने ये लिख दिया।"
मैंने पर्ची खोली।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, बद्रीलाल की मोटी, झुकती लिखाई में:
"हवेली की दीवार में तीसरा दरवाज़ा, कुएँ के नीचे नहीं, कुएँ के पीछे है।"
मैं जम गया।
"कुएँ के पीछे?" मैंने कहा।
काकी ने सिर हिलाया। "मेरे ससुर कहते थे — हवेली में दो दरवाज़े नहीं, तीन हैं। पहला आगे, दूसरा पीछे, और तीसरा — वो जो किसी दरवाज़े से नहीं जुड़ता।"
"बिना दरवाज़े वाला कमरा," मैंने धीरे से कहा।
"वही।" काकी ने मेरा हाथ पकड़ा। "पर सुन। कुएँ के पीछे का हिस्सा ज़मीन के नीचे है। और वहाँ—" उनकी आवाज़ रुकी। "मेरे ससुर ने कहा था कि वहाँ कुछ ऐसा है जो किसी हवेली के काग़ज़ से नहीं, किसी के खून से जुड़ा है।"
"किसका खून?"
काकी ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।
"काकी।"
"मेरे ससुर ने ये नहीं बताया," उन्होंने कहा। "बस इतना कहा था कि उस रात जिस आदमी ने हवेली की दीवार को हिलते देखा, वो मेरे ससुर थे। और उसके बाद ही मेरे ससुर—" वो रुकीं।
"क्या हुआ?"
"वो चुप हो गए," काकी ने कहा। "ज़िंदगी भर।"
मैंने पर्ची को मोड़कर जेब में रखा और टोकन महसूस किया। ठंडा था — तब भी जब मैंने उसे उँगलियों में लिया।
"अब तू जा," काकी ने कहा। "और सुन। भवानी जो काग़ज़ माँग रहा है, वो मेरी ज़मीन का है। दे मत। मैं मर जाऊँगी पर काग़ज़ नहीं दूँगी।"
"मैं तुम्हारी ज़मीन भवानी को नहीं दूँगा," मैंने कहा।
"मुझे भवानी से नहीं डर," काकी ने कहा। "मुझे उस आदमी से डर है जो भवानी के पीछे बैठा है। जो काग़ज़ों पर अपना नाम नहीं लिखता।"
"तुम उसे जानती हो?"
काकी ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार उनकी आँखों में डर दिखा — साफ़, बिना छिपा हुआ।
"मेरे ससुर जिस रात चुप हुए," उन्होंने कहा, "उस रात उन्होंने एक नाम बोला था। बस एक बार। और फिर कभी नहीं।"
"क्या नाम?"
"वो नाम मैंने किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा," काकी ने कहा। "और किसी को बताया नहीं। पर अगर तू उस दरवाज़े तक पहुँचा, तो तुझे ख़ुद पता चल जाएगा।" उन्होंने दरवाज़ा खोला। "जा। देर मत कर।"
मैं बाहर निकला। राजेंद्र गली के मोड़ पर खड़े थे।
"काकी ठीक हैं?" उन्होंने पूछा।
"हाँ।"
"अब कहाँ?"
मैंने पर्ची जेब से निकालकर एक बार फिर पढ़ी। "हवेली। कुएँ के पीछे वाला हिस्सा।"
राजेंड्र ने मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू, वहाँ भवानी के आदमी हैं। सुबह से ही।"
"तो हम भी वहाँ होंगे," मैंने कहा।
"कितने?"
"तुम, मैं, बंसी। और शेखर बाबू अगर तैयार हों।"
राजेंद्र ने एक पल सोचा, फिर सिर हिलाया।
"मेरे साथ दो सिपाही हैं। पर एक बात। अगर वहाँ कुछ गड़बड़ हुई, तो मैं तेरे पीछे नहीं आऊँगा। मैं कानून के पीछे आऊँगा।"
"ठीक है," मैंने कहा।
हम अस्पताल लौटे। सुमन के केबिन में शेखर बाबू और बंसी बैठे थे। बंसी ने मुझे देखते ही उठकर पूछा, "काकी?"
"ठीक हैं।" मैंने पर्ची मेज़ पर रखी। "पर ये देख।"
शेखर बाबू ने पर्ची उठाई और पढ़ी। उनका चेहरा बदला।
"कुएँ के पीछे," उन्होंने धीरे से कहा। "मैंने वहाँ कभी नहीं सोचा।"
"तुमने वहाँ कभी देखा?"
"नहीं। पर —" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, "भवानी ने एक बार मुझसे कहा था कि हवेली में एक जगह है जहाँ सिर्फ़ वो जाता है। कुएँ के पीछे के हिस्से से।"
बंसी ने कुर्सी से उछलकर कहा, "तो चल।"
"रुक।" मैंने कहा। "एक बात पहले। भवानी ने हमें आज जान-बूझकर उलझाया। सुरंग, रिकॉर्ड कमरा — सब खाली। वो चाहता था कि हम वक़्त गँवाएँ। वो चाहता है कि मैं थक जाऊँ, और उसकी शर्त मान लूँ।"
"तो हम क्या करें?" शेखर बाबू ने पूछा।
"हम उसकी शर्त नहीं मानेंगे," मैंने कहा। "हम अदालत जाएँगे — पर उससे पहले कुएँ के पीछे वाली जगह देखेंगे। अगर वहाँ कुछ है जो हमें चाहिए, तो भवानी के पास कुछ नहीं बचेगा।"
शेखर बाबू ने एक गहरी साँस ली।
"मैं चलूँगा," उन्होंने कहा।
बंसी ने चाबी उठाई।
"गाड़ी तैयार है।"
राजेंद्र बाहर खड़े थे, सिपाहियों से कुछ कह रहे थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"तैयार?" उन्होंने पूछा।
"तैयार," मैंने कहा।
रास्ते में बंसी ने गाड़ी तेज़ चलाई। मैं पीछे बैठा था। शेखर बाबू मेरे बगल में। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से कहा, "मन्नू, एक बात।"
"हाँ?"
"जो कुएँ के पीछे है, वो अगर निकला, तो भवानी के पास कुछ नहीं बचेगा। पर एक बात याद रख।"
"क्या?"
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