The Token System – Chapter 961
"भवानी के पास कुछ न बचने का मतलब ये भी हो सकता है कि वो सब कुछ ख़त्म कर दे।"
मैंने खिड़की से बाहर देखा। हवेली की छत दूर से दिख रही थी।
"तो हम पहले पहुँचेंगे," मैंने कहा।
गाड़ी ने मोड़ लिया। हवेली के पिछले आँगन की तरफ़। और मेरी जेब में टोकन ठंडा था — बिल्कुल ठंडा — जैसे वो भी इंतज़ार कर रहा हो।
आख़िरी पल: रास्ते में एक बार गाड़ी रुकी। सामने, सड़क के किनारे, एक बूढ़ी औरत खड़ी थी — पीली साड़ी, लाठी, सिर पर दुपट्टा। उसने हमारी गाड़ी देखी और हाथ उठाया। बंसी ने ब्रेक दबाया।
"कौन है?" राजेंद्र ने पूछा।
मैंने खिड़की खोली। बूढ़ी औरत ने मेरी तरफ़ देखा और सिर्फ़ इतना कहा, "तू वही है जो हवेली का हिसाब लेकर चल रहा है?"
"हाँ।"
"तो सुन। मैं उस दरवाज़े के पीछे बैठी थी जिसे तू आज खोलने जा रहा है। मेरा नाम सरोज है। और मैं वही हूँ जो उस दीवार के पीछे बीस साल से चुप थी।"
मैं गाड़ी से उतर गया। सरोज काकी की लाठी ज़मीन पर टिकी थी, पर उनकी आँखें साफ़-साफ़ मेरे चेहरे पर जमी थीं — बूढ़ी औरत की आँखें नहीं, जैसे कोई बीस साल का हिसाब चुकाने आया हो।
"बैठिए," मैंने कहा। "गाड़ी में।"
"मैं गाड़ी में नहीं बैठूँगी," उन्होंने कहा। "जिस दिन से ये हवेली मेरे ख़ून ने खड़ी की, उस दिन से मैंने किसी की गाड़ी नहीं देखी। तू यहीं सुन ले।"
राजेंद्र आगे आए। "काकी, सड़क पर खड़े होकर —"
"सड़क पर ही खड़ी रहूँगी।" उन्होंने लाठी घुमाई। "मुझे पता है भवानी के आदमी कहाँ-कहाँ बैठे हैं। मैं उनकी आँखों में दिखती हूँ, तो वो दीवार की तरह चुप हो जाते हैं। सो मैं यहीं से बोलूँगी।"
बंसी ने इंजन बंद किया। शेखर बाबू भी उतर आए और सरोज काकी को देखकर रुक गए।
"तू?" सरोज काकी ने उन्हें देखा। "तू अभी ज़िंदा है?"
"काकी —"
"चुप।" उन्होंने हाथ उठाया। "तेरे पिता ने मुझे बीस साल पहले कहा था कि ये हवेली का हिसाब कभी खुलेगा नहीं। और तेरे पिता झूठ नहीं बोलते थे।"
"तो अब क्यों खुल रहा है?" मैंने पूछा।
"क्योंकि अब भवानी हवेली में अकेला है। पहले वो चार आदमियों के पीछे छिपता था। अब पीछे कोई नहीं।" उन्होंने लाठी से सड़क के किनारे की झाड़ियों की तरफ़ इशारा किया। "देख रहा है? वहाँ, दो। उस मोड़ पर, तीन। सब मेरे गाँव के लड़के हैं। भवानी ने उनके बाप-दादा की ज़मीन छीनी थी, और अब उन्हीं को मेरे घर पर बैठा दिया है। शर्म नहीं आई।"
"आपके घर पर?" राजेंद्र ने पूछा।
"मेरे घर पर।" सरोज काकी ने मेरी तरफ़ देखा। "पिछली रात से। कह रहे हैं, बीस साल पुरानी ज़मीन के काग़ज़ लाओ, नहीं तो घर खाली करो। मेरे ससुर ने ये हवेली बनवाई थी और भवानी के बाप ने मेरे ससुर की ज़मीन हड़पी थी। अब बेटा भी वही कर रहा है। बाप जैसा बेटा — ठीक बैठा है नाम?"
"काकी, आप चलिए मेरे साथ," मैंने कहा। "पहले घर, फिर ये हवेली वाला काम।"
"मेरा घर मेरी लाठी तक नहीं पहुँचने देगा," उन्होंने कहा। "तू चल, तो साथ चलूँगी। पर एक बात याद रख। हवेली का रास्ता जाता है तोड़फोड़ से। मेरा रास्ता जाता है सब्र से। तेरे पास सब्र है?"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"सब्र तो नहीं," मैंने कहा, "पर लाठी मेरे पास भी है।"
सरोज काकी हँसीं। पहली बार उनका चेहरा बदला।
"चल। गाड़ी वाले, गाड़ी से आगे-आगे चल। मैं पीछे। मेरे घर के बाहर जो भी बैठा है, उसे ऐसे ही ठीक होना चाहिए — अपनी गाड़ी में आता हुआ दिखे।"
सरोज काकी की गली में हम पहुँचे तो सूरज सिर पर था। गली के मुहाने पर ही दो आदमी चारपाई पर बैठे पान खा रहे थे। हमारी गाड़ी देखकर एक उठा।
"अरे —"
मैं उतरा। "तुम्हारा काम क्या है यहाँ?"
"हमारा-वमारा कुछ नहीं। हम तो बैठे हैं।"
"ये घर खाली कराने आए हो?"
आदमी ने पान थूका। "हम काग़ज़ माँगने आए हैं। ज़मीन का हिसाब। कानूनी काम है।"
"कानूनी काम के लिए चारपाई नहीं चाहिए।" मैंने कदम बढ़ाया। "काग़ज़ दिखाओ।"
"काग़ज़ हमारे साहब के पास हैं।"
"तो साहब को बुलाओ।"
आदमी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर राजेंद्र को देखा जो वर्दी में पीछे खड़े थे। उसका चेहरा बदला। "थानेदार जी —"
"जो पूछा गया है, जवाब दो," राजेंद्र ने कहा।
"हमें तो लोगों ने भेजा है —"
"किसने?" मैंने पूछा।
आदमी चुप हो गया। दूसरा भी उठ खड़ा हुआ। तभी पीछे से और दो आदमी आए — मोटे, दमदार, हाथों में डंडे।
"तू कौन है बे?" एक ने कहा।
"मैं वही हूँ जिसे तुम्हारे साहब बुला रहे हैं।" मैंने कहा। "पर मैं उसके बुलाने पर नहीं, अपने बुलाने पर आया हूँ।"
डंडे वाला हँसा। "बड़ी बातें —"
वो अपनी बात पूरी नहीं कर पाया। सरोज काकी की लाठी उसकी टाँग पर पड़ी और वो ज़मीन पर बैठ गया।
"ये घर मेरा है," सरोज काकी ने कहा। "मेरे ससुर का। और मैं अभी ज़िंदा हूँ। तेरे साहब को कह — बीस साल पहले जो ज़मीन का काग़ज़ उसके बाप ने जलाया था, वो मेरे पास ज़िंदा है।"
डंडे वाले दोनों एक साथ झपटे। मैंने पहले वाले का डंडा पकड़कर मोड़ा और उसका हाथ पीछे किया। दूसरा पीछे से आया — राजेंद्र ने बीच में आकर उसे रोका।
"एक कदम और बढ़ा, तो गिरफ़्तार," राजेंद्र ने कहा। "तुम्हारे साहब ने तुम्हें काग़ज़ माँगने भेजा है या मारने?"
डंडे वाला रुक गया। उसकी नज़र राजेंद्र की वर्दी और पीछे खड़े दो सिपाहियों पर गई। उसने डंडा नीचे कर दिया।
"हम तो —"
"जाओ," मैंने कहा। "और साहब से कहना — मन्नू आया था। काग़ज़ माँगने।"
चारों भागे। पीछे से सरोज काकी ने लाठी ज़मीन पर टिकाई और धीरे से कहा, "अब अंदर चल।"
घर अंदर से छोटा था, पर साफ़। दीवार पर पुराने बुज़ुर्गों की तस्वीरें टँगी थीं। सरोज काकी ने तस्वीरों के नीचे रखी एक लकड़ी की तिजोरी खोली। उनके हाथ काँप रहे थे।
"बैठ पहले," मैंने कहा।
"मैं बैठूँगी तब जब ये तेरे हाथ में होगा," उन्होंने कहा। "मेरे ससुर ने ये मुझे उस रात दिया था। कहा था — जिस दिन हवेली का दरवाज़ा खुले, उस दिन खोलना। बीस साल से मैं इसे हर रोज़ देखती हूँ और हर रोज़ सोचती हूँ, क्या पता उस दिन लिखा हो कि मैं ज़िंदा रहूँगी या नहीं।"
तिजोरी से उन्होंने एक पुरानी तह की हुई पर्ची निकाली — पीली, मुड़ी हुई, कोनों से फटी हुई, जैसे किसी ने उसे बहुत बार खोला हो और फिर बहुत जल्दी मोड़ दिया हो।
मैंने हाथ बढ़ाया। पर्ची खोली।
एक ही लाइन थी। नीली स्याही में, बूढ़े हाथों से लिखी।
"हवेली की दीवार में तीसरा दरवाज़ा, कुएँ के नीचे नहीं, कुएँ के पीछे है।"
मैं जम गया। पर्ची मेरे हाथ में थी और लगा जैसे काग़ज़ नहीं, कोई चीज़ मेरी उँगलियों से चिपक गई है। राजेंद्र ने पीछे से झाँका। शेखर बाबू दरवाज़े पर खड़े थे।
"तीसरा दरवाज़ा?" शेखर बाबू ने धीरे से कहा। "दो तो मैं जानता हूँ। तीसरा —"
"तीसरा वही है जिसे भवानी बंद रखता है," सरोज काकी ने कहा। "और अब जान ले — कुएँ के पीछे न तो ईंट है, न ज़मीन। वहाँ हवेली की पुरानी दीवार है, और उसके पीछे ही वो दरवाज़ा है। जिस दिन भवानी ने कुएँ को पाटना शुरू किया, उस दिन मैंने अपने ससुर की कही बात याद की। दरवाज़ा कुएँ के नीचे नहीं — कुएँ के पीछे।"
मैंने पर्ची मोड़ी और जेब में रखी। जेब में टोकन ठंडा था — बहुत ठंडा — जैसे वो भी ये सुनकर चुप हो गया हो।
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