The Token System – Chapter 959
"तो तुमने ये सब…"
"मैंने कुछ नहीं किया," मोहन लाल ने कहा। "मैंने सिर्फ़ बही खोली है। भवानी ने जो किया, उसका हिसाब ख़ुद उसके पास लौट रहा है।"
वो मेरी तरफ़ बढ़ा।
"तेरे सीने पर जो काग़ज़ है — वो दे।"
मैंने कमीज़ के ऊपर हाथ रखा।
"क्यों?"
"क्योंकि ये बही उसी से पूरी होगी," उसने कहा। "और अगर तू इसे मेरे हाथ में दे दे — तो भवानी का हिसाब तीन बजे ख़त्म हो जाएगा। हमेशा के लिए।"
"और अगर मैं न दूँ?"
मोहन लाल मुस्कुराया — बहुत हल्की, थकी मुस्कान।
"तो हिसाब अदालत में खुलेगा," उसने कहा। "पर अदालत में भवानी के पास भी कुछ है। तूने सुना नहीं? उसने चाबी छिपाई नहीं — उसने उसे लौटाया। भवानी का वकील उस वापस की गई चाबी से ये काग़ज़ पेश कर सकता है और कहेगा कि तेरे पापा ने काग़ज़ चुराए थे।"
मेरी जेब में टोकन ठंडा हो गया, जैसे उसने ये सुनकर साँस रोक ली हो।
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने होंठ सिकोड़े।
"मन्नू," शेखर बाबू ने धीरे से कहा। "मुझे समझ नहीं आ रहा।"
मैंने आँखें बंद कीं। टोकन पर उन्नीसवीं लकीर थी। अंक आठ हज़ार था। और अभी उस पर कुछ उभर रहा था — धीमा, गरम, जैसे कोई अंदर से लिख रहा हो।
मैंने जेब में हाथ डाला और टोकन छुआ। उँगली के नीचे उभरे अक्षर पढ़े।
"मत दे।"
मैंने आँखें खोलीं।
"मोहन लाल," मैंने कहा, "मैं काग़ज़ नहीं दूँगा।"
मोहन लाल का चेहरा बदला — पहली बार।
"तो फिर हिसाब तेरे ऊपर आएगा," उसने कहा।
"आए," मैंने कहा। "पर ये काग़ज़ दादा ने मेरे लिए छोड़ा है — और मैं इसे किसी ऐसे आदमी को नहीं दूँगा जो पाँच पीढ़ियों से भवानी का हिसाब रखता आया है और आज तक एक बार भी नहीं बोला।"
मोहन लाल मेरे करीब आया और उसकी आवाज़ अब धीमी थी।
"तू समझता है मैंने क्यों नहीं बोला?" उसने कहा। "क्योंकि मैं भी उसी हिसाब का एक पन्ना हूँ। भवानी ने मेरे बाप को भी मिटाया। और मैंने चुप रहकर उसे वो हिसाब दिया जो वो पाँच पीढ़ियों से चला रहा है। अब जब मौक़ा आया है…" उसकी आवाज़ टूटी, "तो तू मुझे वो हिसाब पूरा नहीं करने देगा?"
"मैं तुम्हें हिसाब पूरा करने से नहीं रोक रहा," मैंने कहा। "मैं तुम्हें ख़ुद का हिसाब पूरा करने से रोक रहा हूँ। तुम भवानी के हिसाब से ये हिसाब ख़त्म करना चाहते हो — ताकि तुम्हारी भी चुप्पी धुल जाए। पर मेरे दादा का हिसाब किसी और के हाथ से नहीं खुलेगा।"
मोहन लाल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो शेखर बाबू की आँखों में अभी भी थी — डर, और उसके नीचे दबी हुई बेचैनी।
"तू समझता है," उसने धीरे से कहा, "कि ये काग़ज़ सिर्फ़ काग़ज़ है?"
"नहीं," मैंने कहा। "ये हिसाब है। और हिसाब वो चीज़ है जो सिर्फ़ उसी हाथ से खुलती है जिसने उसे लिखा है। मेरे दादा ने इसे मेरे लिए छोड़ा — और आज मैं इसे अदालत में ले जाऊँगा। तीन बजे नहीं, अगली सुनवाई में।"
मोहन लाल कुछ नहीं बोला। उसने बही उठाई और उसे अपने सीने से लगाया। फिर वो मुड़ा और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। उसके साथ बैठे बाकी तीनों भी उठे — कोई नहीं बोला।
सीढ़ियों के मोड़ पर वो रुका और पीछे मुड़कर देखा।
"अगर तू इसे अदालत में ले गया," उसने कहा, "तो भवानी का हिसाब तो खुलेगा। पर ये भी याद रख — जो काग़ज़ पाँच पीढ़ियों से चुप रहा, वो एक दिन में नहीं बोलता।"
वो चला गया।
हम तीनों वहाँ खड़े रहे, और मेरी जेब में टोकन धीरे-धीरे गरम हो रहा था — जैसे उसने भी कोई साँस ली हो।
"मन्नू," बंसी ने कहा, "तूने ठीक किया।"
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर मुझे पता है कि अगर मैं वो काग़ज़ आज दे देता, तो कल मैं ये कभी नहीं कह पाता कि मैंने अपना हिसाब ख़ुद लड़ा।"
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार बिना काँपे मुस्कुराए।
"चल," उन्होंने कहा। "अब अदालत।"
हम सीढ़ियों से ऊपर चढ़े। हवेली का पिछला आँगन अब भी सूना था, पर दूर, गली के मोड़ पर एक पुरानी साइकिल खड़ी थी — वही जो अस्पताल के पीछे खड़ी थी।
"वो साइकिल," बंसी ने कहा। "मैंने इसे वहाँ छोड़ा नहीं था।"
"तो किसी ने लाकर यहाँ खड़ी की है," मैंने कहा।
हम गली की तरफ़ बढ़े। साइकिल के हैंडल पर एक काग़ज़ लिपटा था। मैंने खोला।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, और नीचे वही उलटा कोना-चिह्न:
"सही लड़ा। पर आज तीन बजे के बाद — अगली जगह मैं चुनूँगा। — तीसरा।"
मैंने काग़ज़ को मोड़कर जेब में रखा। टोकन ने एक बार फिर हल्की गरमाहट दी और शांत हो गया।
"अदालत चलो," मैंने कहा। "पर पहले एक जगह — रीना से मिलना है।"
"रीना?" बंसी ने कहा। "शादी की हवेली में?"
"नहीं," मैंने कहा। "अस्पताल। वहीं से उसे साथ लेकर अदालत जाऊँगा।"
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की। शेखर बाबू पीछे बैठे और अपने हाथों को गोद में रखकर बैठे — पहली बार, बिना काँपे।
गाड़ी मुड़ी और मैंने पीछे मुड़कर हवेली की आख़िरी झलक देखी। सीढ़ियों के ऊपर, छत के किनारे पर, कोई खड़ा था — पर दूर था, और उस पल मैं सिर्फ़ इतना जानता था कि वो चेहरा मैंने कहीं देखा है या नहीं, ये कल तय होगा।
गाड़ी ने मोड़ लिया। हवेली पीछे छूट गई।
॥
बंसी ने गाड़ी मोड़ी तो मैंने हाथ बढ़ाकर डैशबोर्ड पकड़ लिया।
"अस्पताल नहीं," मैंने कहा। "सीधा सुमन के केबिन।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"शेखर बाबू को कहीं छिपाना है," मैंने कहा। "वो अगर आज फिर पकड़े गए, तो जो काग़ज़ उनके सीने में है, वो कभी अदालत नहीं पहुँचेगा।"
शेखर बाबू पीछे बैठे थे। उन्होंने कमीज़ के अंदर हाथ डाला और वो पुरानी पीली फ़ाइल थोड़ी ऊपर खिसका ली।
"मन्नू," उन्होंने कहा, "भवानी ने मुझे रिकॉर्ड कमरे से निकलवाया था। पर वो मुझसे ये नहीं निकलवा पाया।"
"क्या?"
"असली काग़ज़। उसने मुझसे दो काग़ज़ निकलवाए। एक वो जो अदालत में पेश हुआ। दूसरा वो जो उसने कहा था पुलिस को देना है।" शेखर बाबू ने आँखें झुकाईं। "दोनों नक़ल थे। असली मैंने अलग रखा था।"
मैंने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर धूल थी और धूल में उस सफ़ेद गाड़ी के टायर के निशान।
"तो भवानी को पता है," मैंने कहा।
"क्या पता है?"
"कि असली काग़ज़ कहीं और है। उसने जान-बूझकर हमें उलझाया।" मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "सुरंग वाला रास्ता, रिकॉर्ड कमरा, वो सब हमें खाली जगहों पर भेजने के लिए था। वो चाहता था कि हम सोचें कि हम जीत रहे हैं।"
"और असली काग़ज़?" बंसी ने पूछा।
"असली काग़ज़ मेरे पास है," मैंने कहा। "और वो ये जानता है। इसीलिए उसने आज तीन बजे की शर्त भेजी। वो चाहता है कि मैं उसे दे दूँ।"
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो तू क्या करेगा?"
"जो मैंने मोहन लाल से कहा था। अदालत।" मैंने टोकन को जेब में महसूस किया। ठंडा था। "पर पहले तुम दोनों को छिपाना है।"
अस्पताल के पिछले गेट से घुसते वक़्त सुमन अपने केबिन के दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने हमें देखा और बिना कुछ पूछे दरवाज़ा खोल दिया।
"अंदर," उन्होंने कहा।
शेखर बाबू पहले घुसे। बंसी पीछे।
"मन्नू," सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा, "अमर की हालत फिर बिगड़ी थी रात को। पर अब संभल रहा है। उसने सुबह से तेरा नाम लिया है।"
"बाद में," मैंने कहा। "पहले तुम इन्हें रखो। अगर भवानी के आदमी आएं तो कहना मरीज़ देख रहे हैं।"
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