The Token System – Chapter 958
फ़र्श पर काग़ज़ों का ढेर था — कुछ फटे, कुछ जले, कुछ टुकड़ों में। और बीच में एक दराज़ पलटी पड़ी थी — सबसे बड़ी, सबसे पुरानी।
मैं उसके पास गया। दराज़ का ताला टूटा था। अंदर से सब निकाला जा चुका था। सिर्फ़ धूल और काग़ज़ के टुकड़े बचे थे।
"लूटा गया," बंसी ने धीरे से कहा। "सब लूटा गया।"
मेरा दिल धक् से रह गया। मैंने काग़ज़ों को हाथ से हटाया — कोई पुराना रजिस्टर, कोई टुकड़ा, कोई सील टूटी।
"ये," शेखर बाबू ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "ये वही दराज़ है जिसमें मैंने तेरे पापा के काग़ज़ रखे थे।"
मैं फ़र्श पर झुका।
आख़िरी काग़ज़ के नीचे, फ़र्श के पत्थर पर कुछ लिखा था — ताज़ी स्याही में, बड़े अक्षरों में। मैंने उँगली से छुआ। स्याही अभी पूरी सूखी नहीं थी।
"काग़ज़ नक़ल है, असली मेरे पास — भवानी।"
मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पीला पड़ गया।
"भवानी?" मैंने कहा। "पर भवानी तो जज के सामने बैठा है।"
"ता कि कोई उस पर शक न करे," शेखर बाबू ने धीरे से कहा। "ये वही चाल है जो उसे तीस साल पहले पसंद थी — पहले सब आपको भरोसा देकर आगे रखे, ख़ुद पीछे छुपे।"
"तो ये सारी लूट…"
"हो सकती है कि वो नक़ल के काग़ज़ ही ले गया हो," बंसी ने कहा। "भवानी यही तो चाहता है — हमें इस कमरे से डराकर लौटा देना।"
"पर उसे कैसे पता कि हम यहाँ आएँगे?" मैंने पूछा।
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्योंकि मैंने उसे बताया था," उन्होंने धीरे से कहा।
मैं जम गया।
"क्या?"
"उस दिन," शेखर बाबू ने कहा, आँखें नीची करके, "जब मैंने अपने हाथ से पैसे के लिए अस्पताल के काग़ज़ बदले थे — उस दिन भवानी ने मुझे एक कमरा भी दिखाया था। यही। उसने कहा था — 'अगर तू कभी मेरी बात मानने से मुकरे तो मैं तेरी बेटी को वहीं रखवा दूँगा जहाँ तेरे जैसे आदमी की बेटी किसी को याद नहीं रहती।'" उनकी आवाज़ टूट गई। "मैंने डर के मारे उसे बताया था कि इस कमरे में क्या रखा है।"
बंसी ने लालटेन नीचे की और उनकी तरफ़ देखा।
"शेखर बाबू," मैंने कहा, "अब डरने का वक़्त नहीं है। ये काग़ज़ मेरे साथ है — असली। और भवानी के हाथ में सिर्फ़ ये कमरा है।"
"पर उसने इस कमरे को ख़ाली कर दिया," शेखर बाबू ने कहा। "जो चीज़ें यहाँ थीं, वो अब उसके पास होंगी।"
"हो सकती हैं," मैंने कहा। "पर अभी उसके पास जो चीज़ें हैं, उनमें एक कमी है।" मैंने अपनी जेब से वो पीतल का टुकड़ा निकाला। "ये। ये सुरंग में पड़ा था। यानी भवानी को नहीं पता था कि यहाँ से कोई आता है।"
बंसी ने लालटेन उठाई और फ़र्श पर पड़े काग़ज़ों को ध्यान से देखने लगा।
"मन्नू," उसने कहा। "ये देख।"
फ़र्श पर पड़े काग़ज़ों में से एक पर धूल नहीं थी। मैंने उसे उठाया। वो एक पुरानी रसीद थी — सील टूटी हुई — और उसके पीछे लाल स्याही से एक पंक्ति लिखी थी:
"तू सही जगह आया। अब वो जगह ढूँढ जहाँ असली रखा है — और मुझसे पहले पहुँच। समय तीन बजे से पहले। — तीसरा।"
मैंने वो काग़ज़ शेखर बाबू को दिया।
शेखर बाबू ने उसे दो बार पढ़ा, फिर मेरी तरफ़ देखकर बोले, "मन्नू, ये भवानी का हाथ नहीं है। भवानी कभी इस तरह नहीं लिखता।"
"तो तीसरा कौन है?" मैंने पूछा।
"मुझे लगता है," शेखर बाबू ने कहा, "ये वही आदमी है जो चाहता है कि भवानी का हिसाब खुले — पर भवानी की तरफ़ से नहीं।"
बंसी कुछ कहने ही वाला था कि तभी सुरंग से आवाज़ आई — किसी के चलने की आहट, दूर से, धीमी पर साफ़।
तीनों चुप हो गए।
"कोई आ रहा है," बंसी ने फुसफुसाया।
मैंने सुरंग के मुँह की तरफ़ देखा — अंधेरा था, पर आहट बढ़ रही थी।
"काग़ज़," मैंने कहा। "सब अपनी जेब में।"
बंसी ने फ़र्श से एक-दो काग़ज़ उठाए। शेखर बाबू ने एक पुरानी पीली फ़ाइल उठाई और कमीज़ के अंदर खोंस ली। मैंने वो रसीद जिस पर तीसरे की लाइन थी, जेब में डाली और अपने सीने पर रखा काग़ज़ दोबारा टटोला — वो वहीं था।
"पीछे," मैंने कहा। "उसी सुराख से बाहर।"
हम पीछे मुड़े, पर तभी सुरंग के मुँह से रोशनी आई — लालटेन की नहीं, टॉर्च की, तेज़ सफ़ेद।
"वहीं रुको," किसी की आवाज़ आई। "जो काग़ज़ तुमने उठाए हैं, वो मेरे हैं।"
मैं रुक गया। आवाज़ जानी-पहचानी लगी — पर मैंने पहचानने की कोशिश नहीं की, क्योंकि पीछे देखने का वक़्त नहीं था।
मैंने बंसी को इशारा किया — सुराख की तरफ़। बंसी ने शेखर बाबू को धक्का दिया और तीनों सुराख से बाहर की तरफ़ भागे।
बाहर निकलते ही मैंने पीछे झाँका — सुरंग के अंदर टॉर्च की रोशनी दूर तक चली आ रही थी, पर वो आदमी हमारे पीछे नहीं आया। वो वहीं खड़ा रहा।
हम अस्पताल की पिछली दीवार के सहारे-सहारे भागे और भवानी के होम की तरफ़ का रास्ता पकड़ा।
तीन का समय करीब था।
हवेली के पीछे का दरवाज़ा बंद मिला, पर ताले की जगह सिर्फ़ एक धागा लिपटा था — जैसे किसी ने खुद खोला हो और लौटते वक़्त फिर से साध दिया हो।
मैंने धागा खोला। दरवाज़ा चरमराया और अंदर की ओर खुला।
अंदर का आँगन सूना था।
"कमरा?" बंसी ने पूछा।
"नीचे। वही ज़मीन के नीचे वाला।"
हमने पिछली गली से होते हुए उस तरफ़ बढ़ना शुरू किया, जहाँ से हवेली की नींव के पास का रास्ता जाता था। धोबी घाट की ढलान पर पानी सूखा था, पर मिट्टी अभी भीगी थी। जूतों के नीचे कीचड़ चिपकता रहा।
हवेली के पीछे पहुँचे तो देखा कि एक पुराना दरवाज़ा था — पत्थर का, जिस पर कोई निशान नहीं था। बंसी ने लालटेन उसकी तरफ़ की।
"ये तो ठोस है," वो बोला। "इसके पीछे कोई कमरा नहीं दिख रहा।"
मैंने हथौड़े से दरवाज़े को टटोला। आवाज़ बदली — पोली थी, जैसे पत्थर के पीछे खाली जगह हो। मैंने दरवाज़े के किनारे पर हाथ फेरा। ज़ंग लगी हुई लोहे की कुंडी थी, जो पत्थर में धँसी थी।
"इसे खींचना पड़ेगा," बंसी ने कहा।
उसने पूरा ज़ोर लगाया। कुंडी हिली, चरमराई, फिर खुल गई। दरवाज़ा अंदर की तरफ़ खिसका और उसके पीछे सीढ़ियाँ दिखीं — नीचे की तरफ़, अंधेरे में डूबी।
"तीन बजे," शेखर बाबू ने घड़ी देखकर कहा। "बिल्कुल समय पर।"
मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा। हवा ठंडी थी और उसमें वही पुरानी सीलन थी जो सुरंग में थी। सीढ़ियों के नीचे एक और दरवाज़ा था — पर वो खुला था।
कमरा अंदर से लालटेन की रोशनी से भरा था। बीच में एक लकड़ी की मेज़ थी और उस पर एक मोटी पुरानी बही रखी थी। मेज़ के चारों तरफ़ चार लोग बैठे थे — उन्होंने हमें देखकर सिर नहीं उठाया।
मैंने चारों को देखा। कोई भी अपने चेहरे पर पर्दा नहीं डाले था।
मेज़ के पीछे बैठा आदमी — बूढ़ा, सफ़ेद दाढ़ी, मोटा चश्मा — उठा।
"आ गए," उसने कहा। "मैं तुम्हारा इंतज़ार ही कर रहा था।"
"कौन हो तुम?" मैंने पूछा।
"मैं वो हूँ," उसने कहा, "जो तेरे पापा के साथ उस रात हवेली में था। और जो आज तक इस हिसाब को खुलने से रोक रहा था।"
"तो तुम भवानी के आदमी हो।"
"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "मैं भवानी का आदमी नहीं हूँ। मैं भवानी का हिसाब हूँ।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"मेरा नाम मोहन लाल है," उसने कहा और अपना चश्मा उतारा। "और मैं पाँच पीढ़ियों से भवानी के होम का हिसाब रखता आया हूँ। ये बही —" उसने बही पर हाथ रखा — "इसमें हर वो नाम है जो भवानी ने मिटाया। तेरे पापा का भी।"
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