The Token System957 / 1154

The Token System – Chapter 957

6 min read November 6, 2026

"तो चल," बंसी ने गाड़ी का दरवाज़ा खोलते हुए कहा। "पर पहले एक ही जगह — जज साहब की कोठी।"

"उससे पहले," माँ ने कहा और मेरे हाथ में पानी का बाल्टा रखा। "पहले मेरे हाथ से चाय पी। जल्दी कर।"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर मुस्कान थी — वो भी अधूरी, थकी हुई, पर थी।

मैंने बाल्टी रखी और दरवाज़े से अंदर चला।

मगर जाते वक़्त मैंने मुड़कर देखा — सफ़ेद गाड़ी वहाँ से जा चुकी थी। उसके जाने के बाद गली में धूल बैठ रही थी और उस मोड़ पर सिर्फ़ अंधेरा बचा था।

मेरे सीने पर लगा काग़ज़ हल्का-सा सरक गया, जैसे किसी ने दूर से मेरी जेब को छुआ हो।

॥

जेब में काग़ज़ सरकते ही मैं रुक गया। माँ ने चाय का कप मेरी तरफ़ बढ़ाया, पर मैंने हाथ नहीं बढ़ाया — मैंने कमीज़ के ऊपर से सीने को टटोला। काग़ज़ वहीं था, जहाँ था। उसका कोना एक उँगली जितना खिसका था। बस।

"क्या हुआ?" बंसी ने पूछा।

"कुछ नहीं।" मैंने चाय उठाई और एक घूँट में आधी पी गई। जीभ जल गई, पर शिकायत का वक़्त नहीं था।

शेखर बाबू बरामदे में खड़े थे और घड़ी देख रहे थे।

"तीन बजे की शर्त है," वो बोले। "अभी सवा दो हुआ है।"

"तो हम हवेली की तरफ़ चलते हैं," बंसी ने कहा।

"नहीं।" मैंने कप नीचे रखा। "पहले हमें ये देखना है कि जो आदमी ये शर्त भेज रहा है, वो कौन है। अंधेरे में हवेली के नीचे उतरना मतलब अपने हाथ से अपना हिसाब उसके हवाले कर देना।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा।

"अब तो तू अक्ल की बातें करने लगा," उन्होंने कहा। "जा। पर एक बात याद रख — पापा ने जिस चीज़ से डरकर चुप्पी ली थी, वो चुप्पी ही उसका सबसे बड़ा बोझ थी। तू चुप मत होना।"

मैंने सिर हिलाया।

बाहर निकले तो मोहल्ले की गली में धुआँ अभी हल्का था, पर जलते कबाड़े की बदबू हवा में बैठी थी। गाड़ी स्टार्ट हुई। शेखर बाबू पीछे बैठे।

"पहले अस्पताल," मैंने कहा। "रिकॉर्ड कमरे से चाबी वाला धागा अभी पूरा नहीं खुला। और शेखर बाबू, आपने कहा था कि असली काग़ज़ की कॉपी वहाँ है — किस कमरे में?"

"पीछे वाले रिकॉर्ड कमरे में।" शेखर बाबू ने खिड़की से बाहर देखा। "वो कमरा जिसे बीस साल से बंद रखा है। उसकी चाबी मेरे पास नहीं थी, पर मुझे पता है कि उसका पिछला रास्ता कहाँ से खुलता है।"

"पिछला रास्ता?"

"एक सुरंग," शेखर बाबू ने कहा। "बहुत पुरानी। उस कमरे के पीछे से शुरू होकर अस्पताल की पिछली दीवार के नीचे से होकर आती है। मैंने उसमें एक बार ही क़दम रखा था — तीस साल पहले। उस वक़्त भी अंधेरा था।"

बंसी ने गाड़ी तेज़ की।

अस्पताल का पिछला हिस्सा सूना था। रिकॉर्ड कमरे के पास पहुँचे तो दरवाज़े पर नया ताला लगा था — मोटा, चमकता हुआ। शेखर बाबू ने उसे छुआ।

"ये तो कल का है," वो बोले। "कल रात किसी ने बदला है।"

मैंने दरवाज़े को कंधा मारा। लोहे का दरवाज़ा था — पुराना, मोटा, पर उसके भीतर की लकड़ी सड़ी थी। एक और मारा। चरमराया, पर खुला नहीं।

बंसी दौड़कर दीवार के कोने पर गया और खिड़की से बाहर झाँका।

"बाहर कोई नहीं," वो बोला। "बस एक साइकिल खड़ी है — पुरानी, टेढ़ी।"

"साइकिल?" मैंने पूछा।

"हाँ। फ्रेम पर धूल है, पर टायर पर नहीं। यानी अभी-अभी कोई छोड़कर गया है।"

मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। उनका चेहरा कठोर था।

"फ़ोन," मैंने कहा। "सुमन को फ़ोन करना होगा।"

मैंने उनका मोबाइल लिया। सिग्नल की एक डंडी दिखी, फिर ग़ायब। दोबारा मिलाया। स्क्रीन पर "कॉल नहीं जा सकती" लिखा आया।

"यहाँ सिग्नल नहीं है," शेखर बाबू ने कहा। "पुरानी इमारत है, दीवारें मोटी हैं। कमरे के उस कोने में जाकर देख।"

मैंने उसी कोने में जाकर दोबारा मिलाया। इस बार भी नहीं गया। मैंने दीवार पर हाथ मारा — पत्थर की आवाज़ आई, ठोस, बंद।

तभी शेखर बाबू बोले, "रुक।"

वो दीवार के उस हिस्से के पास गए जहाँ एक अलमारी रखी थी — पुरानी लोहे की, जंग खाई। उन्होंने उसे खींचा। अलमारी हिली, फिर सरकी, और उसके पीछे एक दरवाज़े का निशान दिखा — बिना ताले का, लकड़ी का, पत्थर में धँसा हुआ।

"ये रहा," शेखर बाबू ने कहा। "कोठरी का पिछला रास्ता। सुरंग का पहला मुँह।"

बंसी ने भी धक्का दिया। दरवाज़ा ज़ोर से खुला और उसके पीछे से ठंडी हवा का झोंका निकला — अंधेरे और मिट्टी की बदबू वाला।

"मैं आगे चलूँगा," मैंने कहा।

"तू नहीं, मैं चलूँगा," शेखर बाबू ने कहा और मेरी तरफ़ देखा। "मैंने इस सुरंग में तीस साल पहले क़दम रखा था। और उस दिन जो हुआ था, वो मेरी ग़लती थी — मुझे उसकी कीमत चुकानी चाहिए।"

मैंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने जेब से एक माचिस निकाली और दीवार पर टिकी पुरानी लालटेन जलाई — जो अलमारी के पीछे पड़ी थी। रोशनी कम थी, पर रास्ता दिख रहा था।

तीनों सुरंग में उतरने लगे।

सुरंग तंग थी। दीवारें ईंट की, पर अंदर से सीलन से लिपटी हुई। फ़र्श पर पानी की हल्की परत थी जो जूतों के नीचे चरमराती थी। शेखर बाबू आगे, मैं बीच में, बंसी पीछे — लालटेन उसके हाथ में, क्योंकि शेखर बाबू को रास्ता याद था और उन्हें मोड़ों पर झुकना पड़ता था।

कुछ दूर चले तो शेखर बाबू रुके।

"यहाँ आगे एक जगह थी," वो बोले। "जहाँ छत टूटी थी।"

उन्होंने लालटेन ऊपर उठाई। छत का एक हिस्सा सच में टूटा था — बारीक रोशनी सुरंग के फ़र्श पर पड़ी।

तभी मेरा पैर किसी चीज़ पर पड़ा। धातु की आवाज़ आई — हल्की, खनकती।

मैं झुका। लालटेन की रोशनी में फ़र्श पर पड़ा पीतल का टुकड़ा चमका — छोटा, मुड़ा हुआ, करीब आधी उँगली जितना।

"रुक," मैंने कहा और उसे उठाया।

मेरी साँस रुक गई।

उस टुकड़े पर वही उलटा कोना-चिह्न था — दो लकीरें, बिंदु नीचे। बिल्कुल वैसा ही जैसा पीतल की कील पर, जैसा राहुल की गोली पर।

"किसका है?" बंसी ने पूछा।

"ये सुरंग में पड़ा है," मैंने कहा। "यानी इसे कोई लेकर आया था। यहाँ गिराया। या यहाँ से भागते वक़्त छूटा।"

मैंने उसे जेब में रखा। जेब में टोकन के पास रखते ही मेरी उँगली को हल्की गरमाहट छू गई।

शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू जानता है ये किसका है?"

"नहीं," मैंने कहा। "पर मुझे पता है ये भवानी का नहीं है। भवानी के टोकन पर सीधा चिह्न है।"

हम आगे बढ़े।

सुरंग आख़िर में एक बड़ी दीवार पर आकर रुकी। शेखर बाबू ने हाथ से उस दीवार को टटोला।

"ये रिकॉर्ड कमरे की पिछली दीवार है," वो बोले। "इसके पीछे वो कमरा है जहाँ बीस साल से कोई नहीं आया।"

मैंने हथौड़ा निकाला — वही जो माँ ने सुबह दिया था। दीवार पुरानी थी, पर पत्थर ठोस था। पहला वार किया — चूना झरा। दूसरा — ईंट हिली। तीसरे पर एक ईंट पूरी निकली और उसके पीछे अंधेरे का चौड़ा मुँह खुला।

बंसी ने लालटेन उस अंधेरे में डाली।

"कमरा है," वो बोला। "पूरा अंधेरा, पर कमरा है।"

हम तीनों एक-एक करके ईंटें निकालते गए और फिर उस सुराख से अंदर घुसे। मैंने अपनी घुटने की चोट को भुला दिया — शरीर में अब सिर्फ़ एक ही डर बचा था, वो शर्त।

अंदर उतरते ही मुझे पुराने काग़ज़ों की गंध आई — सील, स्याही और धूल।

बंसी ने लालटेन ऊपर उठाई।

कमरा बड़ा था, रैक से भरा हुआ। लेकिन रैक के रजिस्टर काग़ज़ — बिखरे पड़े थे।

हर रैक ख़ाली था।

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