The Token System – Chapter 954
गाड़ी हवेली के पीछे लगी। हम दबे पाँव गए। पीछे का दरवाज़ा — छोटा, लकड़ी का, जंग लगे कब्ज़ों वाला। चाबी घूमी।
दरवाज़ा खुला, और अंदर जो मिला, उसके लिए मैं तैयार नहीं था।
अंदर एक छोटा कमरा था, जिसके बीच में लकड़ी की मेज़ थी। मेज़ पर एक रजिस्टर खुला पड़ा था, और उसके ऊपर कमलेश का सीलबंद लिफ़ाफ़ा — वही जो मुझे अदालत के बाहर मिला था, वही जिसे मैंने नहीं खोला था।
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया।
"यह मेरा है," मैंने कहा। "यह अदालत के बाहर मुझे मिला था।"
"तो खोलो," शेखर बाबू ने कहा।
मैंने खोला।
अंदर चार चीज़ें थीं — रीना की लिखाई में छोटी पर्ची, एक पुरानी फोटो, एक पीतल की कील, और रामू के जन्म के काग़ज़ की नक़ल।
पर्ची पर लिखा था — "भैया, मुझे मालूम है तू आएगा। मैं डर नहीं रही। बस जल्दी कर। काग़ज़ जो भी हो, माँ का नाम उसमें होना चाहिए।"
फोटो में माँ थी — जवान, एक लाल रंग के कमरे में खड़ी, हाथ में वही पीतल की डिबिया जो मुझे कोठरी की दीवार से मिली थी।
पीतल की कील पर उलटा कोना-चिह्न था। और रामू के जन्म काग़ज़ पर एक लाइन — "माँ का नाम: अज्ञात।"
मेरा हाथ काँपा।
"यह क्या है?" मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा।
उन्होंने फोटो उठाई और उसे देर तक देखा।
"यह कमरा," उन्होंने कहा, "कभी जगन्नाथ का था। यहाँ भवानी के बाप इस औरत से मिलते थे। यह औरत…" उन्होंने फोटो को करीब लाया, "यह तेरी माँ की माँ है। तेरी नानी।"
"मेरी नानी मर चुकी है।"
"मरने की ख़बर किसने दी?"
मैं चुप हो गया।
"भवानी ने," शेखर बाबू ने कहा। "और जिस दिन यह ख़बर आई, उसी दिन हवेली का चौथा हिस्सा किसी और नाम पर चढ़ गया।"
बंसी ने बाहर झाँका।
"गाड़ियाँ आ गईं।"
मैंने फोटो और पर्ची जेब में डाली और मेज़ पर पड़ा रजिस्टर उठाया। पहला पन्ना खोला —
और वहाँ मेरे नाम के नीचे, नई स्याही में लिखा था —
"हिसाब बराबर करने वाला आज अंदर आया। अब बाहर नहीं जाएगा।"
धमाका बाहर हुआ — लकड़ी के दरवाज़े पर। बंसी ने तुरंत रजिस्टर मेरे हाथ से झटका और मेज़ के नीचे खिसका दिया।
"अंदर आ गए," उसने फुसफुसाया।
मैंने कमरे को एक पल में नापा। एक खिड़की थी — छोटी, ऊँची, मेरी छाती तक। बाहर अँधेरा। नीचे कुछ नहीं दिख रहा था।
"खिड़की से निकलो," मैंने शेखर बाबू से कहा।
"और तुम?"
"हम पीछे आ रहे हैं।"
शेखर बाबू खिड़की तक गए। उनकी उमर में वो उछल नहीं सकते थे। बंसी ने कुर्सी उठाई, खिड़की के नीचे टिकाई।
बाहर फिर धमाका। इस बार दरवाज़े की लकड़ी चरमराई — एक कब्ज़ा उखड़ा और दरवाज़ा तिरछा लटक गया।
"जल्दी!"
शेखर बाबू कुर्सी पर चढ़े, खिड़की पर हाथ रखा। बंसी ने उन्हें ऊपर धकेला। वो पार हो गए — बाहर की तरफ़ गिरते हुए भी चश्मा पकड़े रहे।
दरवाज़ा टूटा। तीन आदमी अंदर घुसे।
पहला आदमी जैसे ही आगे बढ़ा, बंसी ने मेज़ उसके पैरों पर दे मारी और वो गिर पड़ा। दूसरे ने लाठी उठाई।
मैंने क्षण भर सोचा — भागना है या लड़ना।
"मन्नू!" बंसी चिल्लाया।
मैंने खिड़की पकड़ी। बाहर कूदा। मेरा घुटना ज़मीन से टकराया, दर्द कमर तक दौड़ गया। शेखर बाबू मेरा हाथ खींच रहे थे।
बंसी आख़िरी में कूदा। उसके पीछे एक लाठी हवा में घूमी और खिड़की के फ्रेम पर लगी — चीखती लकड़ी की आवाज़।
हम भागे। हवेली के पीछे की गली, फिर मंदिर की दीवार के सहारे, फिर और आगे। तीनों पीछे थे — मैं उनके पैरों की आवाज़ सुन सकता था।
"यहाँ नहीं," शेखर बाबू हाँफते हुए बोले। "पुल की तरफ़ मत जाओ। वो बंद करवा देगा।"
"तो कहाँ?"
"धोबी घाट। नीचे रास्ता है, नदी के किनारे से। सीधे श्यामलाल की दुकान के पीछे निकलता है।"
बंसी मेरी तरफ़ देख रहा था — उसकी आँखों में वो बात थी जो लड़ाई से पहले आती है। मैंने सिर हिलाया। हम मुड़े और घाट की तरफ़ भागे। ढलान थी — पत्थर, कीचड़, गीली सीढ़ियाँ। मेरे पैर फिसले, मैं गिरा, फिर उठा। शेखर बाबू मेरे आगे उतर रहे थे, किसी तरह।
घाट के नीचे एक चाय की दुकान थी, बंद। उसके पीछे लोहे का पुराना गेट — श्यामलाल की दुकान के पिछवाड़े।
बंसी ने गेट पर धक्का मारा। बंद।
"दरवाज़ा!"
"चाबी से," शेखर बाबू ने कहा।
मैंने पीतल की चाबी जेब से निकाली। हाथ काँप रहा था। ताला नहीं खुला। दूसरी बार। तीसरी बार — ज़ोर से घुमाया। एक कटी आवाज़ आई और ताला खुल गया।
हम अंदर घुसे। बंसी ने गेट बंद किया। हम दुकान के पीछे वाले हिस्से में खड़े थे — बोरियाँ, डिब्बे, एक टूटी कुर्सी। दुकान के आगे से रोशनी की एक पतली लकीर आ रही थी।
"वो देखेंगे," बंसी ने कहा। "गली में।"
"तो देखें," मैंने कहा। "हम यहाँ हैं भी नहीं।"
शेखर बाबू एक बोरी पर बैठ गए। उनकी साँस बहुत तेज़ चल रही थी। मैंने उनके लिए पानी ढूँढा — एक मटका मिला, पास में लोटा। उन्होंने पिया, फिर आँखें बंद कर लीं।
"अब बताइए," मैंने धीरे से कहा। "कमलेश का लिफ़ाफ़ा उस कमरे में क्यों था? मुझे अदालत के बाहर किसने दिया?"
शेखर बाबू ने आँखें खोलीं।
"मैंने दिया।"
"आपने? पर उस वक़्त आप…"
"मैं उस वक़्त अदालत के पीछे गाड़ी में बैठा था। भवानी के दो आदमी मेरे साथ थे। मैंने उनसे कहा कि मुझे पेशाब जाना है। वो एक मिनट के लिए दरवाज़े से हटे। मैंने लिफ़ाफ़ा एक चपरासी को दिया और कहा कि नए वकील को दे आए। मैं जानता था तू वहाँ होगा।"
"अंदर क्या था, वो आप जानते थे?"
"कुछ नहीं जानता था। लिफ़ाफ़ा मुझे मिला था — उसी कमरे में, जहाँ भवानी ने मुझे बंद किया। दराज़ के नीचे फँसा था। ऊपर तेरा नाम लिखा था।"
मैंने उसे देर तक देखा।
"आपने बताया नहीं कि आप जानते थे कि मुझे अदालत के बाहर कुछ मिलेगा। सीधे बता देते।"
"और तू मानता?" उन्होंने चश्मा ठीक करते हुए पूछा। "उस वक़्त तू मुझे भवानी का आदमी समझ रहा था। मैं जानता था। तूने मुझे बस इसलिए नहीं मारा क्योंकि तेरे दादा कह गए थे — सुन लेना, फिर सोचना।"
बंसी ने खिड़की से झाँका।
"गाड़ी जा रही है। पुल की तरफ़।" वो मुड़ा। "यह मौक़ा है। थाना अब भी खुला होगा। सब कुछ लेकर चलो — रजिस्टर, काग़ज़, लिफ़ाफ़ा। इंस्पेक्टर के सामने सब रखो। भवानी अदालत में है, उसे कल सुबह तक पता नहीं चलेगा।"
"सही कह रहा है," मैंने कहा। "अब रुकना ख़तरनाक है। भवानी के आदमी हमें ढूँढ रहे हैं और हमारे पास वक़्त नहीं है।"
मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। वो उठे। कमरे के कोने में एक टूटा आइना पड़ा था। उन्होंने उसमें अपना चेहरा देखा — बाल बिखरे, चश्मा तिरछा, कॉलर फटा।
"थाने चलो," मैंने कहा। "इंस्पेक्टर राणा ठीक आदमी है। मैंने उससे बात की थी। अगर हम सब कुछ उसके सामने रखेंगे, तो भवानी कल सुबह अदालत से निकलते ही…"
"रुक।"
शेखर बाबू का स्वर बदल गया। काँपता नहीं था — अब साफ़ था, सधा हुआ, जैसे तराज़ू की सुई जब बराबर हो जाती है।
"थाने नहीं।"
मैं रुक गया।
"पहले उस जगह चल," उन्होंने कहा, "जहाँ भवानी ने मुझे छिपाया था।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो काग़ज़ मैंने भवानी को लौटाए, वो नक़ल थे।"
बंसी की आवाज़ आई, बहुत धीरे — "क्या कहा आपने?"
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो आदमी के चेहरे पर तब आती है जब वो बहुत दिनों से दबा हुआ सच आख़िर बाहर निकाल रहा हो।
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