The Token System – Chapter 953
"मेरी भी होती है," मैंने कहा। "और मेरी हद आज ख़त्म हो गई।"
मैं अंदर बढ़ा, पर तभी पीछे से किसी ने मेरा कंधा पकड़ा। मैं मुड़ा — सफ़ेद कुर्ते वाला, वही जिसने अस्पताल में माली की झोपड़ी पर हाथ हिलाया था।
"अंदर नहीं," उसने कहा। "यहाँ बाहर बात होगी।"
"हट।"
"नहीं हटूँगा।"
छोटू ने अचानक उसकी कलाई पर झपट्टा मारा — नाखूनों से, जैसे उसने कभी बिल्ली से लड़ते देखा हो। आदमी चौंका, और उसी पल मैंने उसका हाथ झटककर अंदर दौड़ लगा दी।
हवेली के आँगन के पीछे गली की तरफ़ एक छोटा दरवाज़ा था। मैं वहीं की तरफ़ भागा, क्योंकि रीना ने सिर्फ़ एक बार आँखों से उस तरफ़ देखा था।
पीछे की गली में हवेली के दूसरे फाटक पर एक खाली गाड़ी खड़ी थी। सफ़ेद गाड़ी — वही, जिसकी सीट पर सिर्फ़ शेखर बाबू का कोट रखा था। बोनट पर धूल थी और धूल में उँगली से कुछ लिखा था। मैं झुका।
पीछे का गोदाम।
और नीचे उलटा कोना-चिह्न।
मैंने सीट से कोट उठाया। जेब में पर्ची थी, साथ में एक छोटी चाबी — दो दाँते की, जैसे किसी दराज़ की हो। पर्ची पर वही लिखाई थी जो बोनट पर थी, बस ज़्यादा साफ़।
पीछे का गोदाम। पुल के उस पार। पीली दीवार।
मैंने कोट अपनी बाँह पर डाला।
"छोटू, तू यहीं रुक। आँगन में जा। रीना के पास बैठ। कुछ मत बोल।"
"पर तू…"
"मैं आ रहा हूँ।" मैंने उसका सिर थपथपाया। "और सुन — अगर मैं न आऊँ, तो उसी बूढ़ी अम्मा को बुला जो शेखर बाबू की बहन है। वो यहीं कहीं है।"
छोटू ने सिर हिलाया और दौड़ गया।
मैं भी भागा।
पुल के पास ही बंसी की गाड़ी मिली — वो पुरानी नीली, जिसे हमने न जाने कितनी रातों में दौड़ाया था। वो पहले से इंजन चालू किए बैठा था। मेरी तरफ़ देखकर हँसा।
"मैंने सोचा, तू फँस जाएगा। फिर सोचा, तू फँसेगा नहीं।"
"फँस रहा था," मैंने गाड़ी में कूदते हुए कहा। "पर छोटू ने बचा लिया।"
"बच्चा तेरा ख़ास है।"
"बच्चा तेरा भी है।"
हम पुल पार कर गए। गोदाम का रास्ता कच्चा था, गाड़ी उछल रही थी और मेरा घुटना हर उछाल पर चीख़ता था।
"पीली दीवार," मैंने कहा।
"देख रहा हूँ।"
दीवार दिखी। और उसके पीछे, टूटी जाली के अंदर, एक कमरा जिसका दरवाज़ा खुला था।
हम गाड़ी से उतरे और दबे पाँव गए।
दरवाज़े के अंदर का नज़ारा — शेखर बाबू, एक लोहे की कुर्सी पर बँधे, सिर झुका, चश्मा पहले से टूटा हुआ था, पर उन्होंने बदला हुआ था — नया चश्मा, जिसके काँच पर लगी धूल साफ़ दिख रही थी। सामने करन — भवानी का मोटा आदमी — प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा था और मोबाइल पर बात कर रहा था।
"हाँ, वो आया तो। हवेली में। पर हमने रोक दिया। अब क्या करना है? … अच्छा? … ठीक है।"
उसने फ़ोन काटा और उठा।
"बाबू," उसने शेखर बाबू के पास झुककर कहा, "आख़िरी बार पूछ रहा हूँ। वो काग़ज़ कहाँ है? बता दे, तो तेरी बेटी की शादी हो जाएगी। नहीं तो…" उसने कंधे उचकाए। "तू बूढ़ा है, तेरे लिए शादी का दिन ही सब कुछ है। समझ ले।"
शेखर बाबू ने सिर उठाया। उनकी आवाज़ सूखी थी।
"जब मैं उस काग़ज़ को लेकर अदालत पहुँचा," उन्होंने कहा, "तब तुम्हारा ठाकुर साहब जेल में होगा। तेरा क्या होगा?"
करन हँसा।
"मेरा? मेरा तो कुछ नहीं होगा। मैं सिर्फ़ तनख़्वाह लेने वाला हूँ।"
"तनख़्वाह का हिसाब भी एक दिन आता है।"
"ये पुरानी बातें छोड़।" करन ने पानी का गिलास उठाया। "बता, कहाँ है काग़ज़?"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। उसने आँख से इशारा किया — पीछे से।
बंसी दीवार के साथ-साथ सरककर करन के पीछे पहुँचा। गोदाम के कोने में बोरे रखे थे — पुराने, गन्ने के छिलकों वाले। बंसी ने एक बोरा उठाया और करन के सिर पर उतार दिया।
करन चीख़ा, पानी का गिलास गिरा, वो लड़खड़ाया। मैं दौड़कर पहुँचा और शेखर बाबू की रस्सियाँ खोलने लगा। गाँठें तंग थीं, मेरी उँगलियाँ फिसल रही थीं, और चाबी मेरी जेब में कुछ ऐसे लग रही थी जैसे जल रही हो।
"जल्दी कर, मन्नू," बंसी दबा हुआ बोला, बोरे को पकड़े हुए। करन पैर मार रहा था, बोरा चीख़ रहा था।
आख़िरी गाँठ खुली। शेखर बाबू का शरीर ढीला पड़ा, फिर उन्होंने मेरा कंधा पकड़कर खुद को सीधा किया।
"चलो," मैंने कहा। "थाना। सीधे।"
पर वो रुके।
उन्होंने करन को देखा — जो अब भी बोरे में उलझा हुआ था — और फिर मेरी तरफ़ मुड़े।
"थाने नहीं," उन्होंने कहा। "पहले उस जगह चलो जहाँ भवानी ने मुझे छुपाया था। वहाँ एक दराज़ है।"
"कौन सी जगह?"
"हवेली के अंदर।" उन्होंने अपना नया चश्मा उतारा और आँखें मलीं। "भवानी ने मुझे दो दिन उसी कमरे में रखा जहाँ कोई नहीं जाता। वो कमरा मेरी जानता है — मैंने ही तो उसकी मरम्मत का हिसाब लिखा था। दराज़ उसी के नीचे है — फ़र्श के नीचे।"
"फ़र्श के नीचे?"
"हाँ।" उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर आँखें नहीं। "और वहाँ जो काग़ज़ है, वो तेरे दादा का असली काग़ज़ है। यह जो मैं लेकर घूम रहा हूँ —" उन्होंने अपनी जेब से मुड़ा काग़ज़ निकाला, "—यह नक़ल है। भवानी ने मुझसे ज़बरदस्ती लिखवाई थी। असली में सिर्फ़ तेरे दादा का नाम और तेरे पापा का नाम है — उसके हाथ से लिखा हुआ, किसी की गवाही के बिना। वो काग़ज़ मैंने आठ साल पहले उस दराज़ में छिपाया था, जब भवानी ने मुझे पहली बार डराया था।"
"पर आपने अदालत में कहा था कि यह काग़ज़ असली है।"
"अदालत में मैंने कहा था कि मैंने काग़ज़ बदला।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो शर्म थी जो आदमी को बूढ़ा कर देती है। "यह नहीं कहा कि सारे काग़ज़ नक़ली हैं। अब बताता हूँ — क्योंकि अब मेरी बेटी की शादी बच गई है। तुमने बचाई।"
मैंने मुड़कर देखा। करन बोरे से निकल चुका था, बंसी से धक्का-मुक्की कर रहा था। मैंने शेखर बाबू का हाथ पकड़ा।
"गाड़ी में। अभी।"
हम भागे। बंसी ने करन को एक आख़िरी धक्का दिया और वो दीवार से टकरा गया। हम गाड़ी में कूदे और बंसी ने पैडल दबाया।
गाड़ी पुल पार कर चुकी थी जब शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हारे दादा ने एक बार मुझसे कहा था," उन्होंने धीरे से कहा, "कि हवेली जमीन नहीं, हिसाब है। जो इसे ज़मीन समझता है, वो इसे खोता है। जो इसे हिसाब समझता है, वो इसे रखता है।"
"और आपने क्या कहा था?"
"मैंने कहा था — मैं किसान नहीं, क्लर्क हूँ। मुझे हिसाब से मतलब है।" उन्होंने चश्मा पहना। "आज जाना कि क्लर्क का हिसाब भी एक दिन अदालत में आ ही जाता है।"
बंसी ने पीछे मुड़कर देखा।
"दो गाड़ियाँ पीछे हैं।"
"कितनी दूर?"
"दो मोड़।"
मैंने जेब में टोकन टटोला। गरम था — बहुत गरम।
"हवेली सीधी जाओ," शेखर बाबू ने कहा। "भवानी अदालत में है, पर उसके आदमी हवेली में हैं। हमें अंदर जाना होगा। पीछे वाले दरवाज़े से।"
"वहाँ ताले लगे हैं। श्यामलाल ने…"
"श्यामलाल की चाबी तेरे पास है।" उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा। "वो पीतल वाली।"
मैंने जेब से चाबी निकाली। वो पीतल की छोटी चाबी थी — दो दाँते — जो कोट की जेब में पर्ची के साथ थी।
"आपने इसे रखा था?"
"करन ने मुझे उस कमरे से निकालते वक़्त गिराया था। मैंने उठा लिया।" उन्होंने कहा। "हवेली के पीछे के दरवाज़े का। एक ही ताला है, जो अब तक नहीं बदला।"
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