The Token System952 / 1154

The Token System – Chapter 952

6 min read November 6, 2026

बंसी ने उसका हाथ पकड़ा, आदमी ने छुड़ाने की कोशिश की। मैं दौड़कर पहुँचा।

"कौन हो तुम?" मैंने पूछा।

वो नहीं बोला। बंसी ने उसका हाथ मरोड़ा।

"बोलता क्यों नहीं?"

"मैं…" उसकी आवाज़ फटी हुई थी, "मैं तो बस खड़ा था।"

"किसके पैसे पर?"

"कोई नहीं—"

"कलाई देखी?" मैंने उसकी कलाई की तरफ़ इशारा किया। "ये निशान कहाँ से आया?"

उसने अपनी कलाई देखी, और उसके चेहरे पर सच में हैरानी थी। वो नक़ली नहीं थी।

"ये…" वो हकलाया, "ये तो बचपन से है। माँ कहती थी, जन्म के वक़्त से।"

मैंने उसकी कलाई ध्यान से देखी। निशान टोकन के आकार का था, पर सपाट — बिना लकीर, बिना बिंदु। जैसे किसी ने गरम पीतल का सिक्का उसकी कलाई पर रखकर छाप दी हो।

"तुम्हारा नाम?"

"रामू।"

"रामू…" मैंने सोचा। ये वही नाम था जो अभी कुछ देर पहले एक क्लर्क ने बताया था — शेखर बाबू के केबिन का। मैंने उसकी आँखों में देखा। "तुम शेखर बाबू के साथ थे?"

उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"मैं… मैंने कुछ नहीं किया। वो दो आदमी आए थे, बोले साहब बुला रहे हैं। शेखर साहब ख़ुद गए। मैंने सोचा—"

"क्या सोचा?"

"मैंने सोचा, साहब जानते हैं। वो जानते हैं न। पर फिर…" वो रुक गया।

"फिर क्या?"

"फिर साहब ने मुझे देखा। गाड़ी में बैठते वक़्त। और आँखों से कुछ कहा। मैं समझ गया कि नहीं जानते।"

बंसी ने उसकी पकड़ ढीली की।

"तुम्हें कुछ और दिया?" मैंने पूछा। "कोई काग़ज़? कुछ?"

रामू ने जेब में हाथ डाला और एक मुड़ा काग़ज़ निकाला — पीला, फटा किनारा।

"ये साहब की मेज़ पर पड़ा था," उसने कहा। "गाड़ी जाने के बाद। मैंने सोचा, कहीं गिर न जाए।"

मैंने काग़ज़ खोला। उस पर एक पंक्ति थी, शेखर बाबू की ही लिखाई में, काँपते हाथ से —

"जहाँ मुझे ले जा रहे हैं, वो जगह वही है जहाँ मन्नू के पिता को ले जाया गया था। पुरानी सीमेंट फैक्टरी के पीछे वाला कमरा।"

मैंने काग़ज़ बंसी को दिखाया। बंसी ने पढ़ा और उसका जबड़ा कस गया।

"वो जगह तो…" उसने धीरे से कहा।

"क्या?"

"वहीं तो भवानी का पहला गोदाम था। जहाँ सरोज को रखा था।"

मैंने काग़ज़ जेब में रखा और रामू की तरफ़ देखा।

"तुम घर जाओ," मैंने कहा। "और किसी को कुछ मत बताना। अगर कोई पूछे, कहना बीमार हो।"

रामू ने सिर हिलाया और भाग गया।

तभी पीछे से छोटू की आवाज़ आई। वो दौड़ता हुआ आ रहा था, हाथ में मेरा ही मोबाइल।

"भैया! फ़ोन! कोई औरत है, कह रही है — शादी की तारीख़ बदल गई है!"

मैंने फ़ोन कान पर लगाया।

"कौन?"

"मैं शेखर बाबू की बहन बोल रही हूँ।" आवाज़ बुज़ुर्ग थी, हाँफ रही थी। "भैया ने कहा था, अगर कुछ हो जाए तो तुम्हें बताऊँ। भवानी के आदमी आए थे। बोले शादी आज ही होगी। अभी। दोपहर में। लड़के वाले आ रहे हैं।"

"कहाँ?"

"उसी पुरानी चाय की हवेली में। जहाँ रिश्ता तय हुआ था। मैं डर रही हूँ…"

"आप डरिए मत।" मैंने फ़ोन कसकर पकड़ा। "आप बस एक काम कीजिए — लड़के वालों को रोकिए। कहिए, दूल्हे का कोई रिश्तेदार आ रहा है। बड़ा आदमी।"

"कौन?"

"मैं।"

फ़ोन काटकर मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो मेरा चेहरा पढ़ रहा था।

"दो जगह," मैंने कहा। "एक — सीमेंट फैक्टरी, जहाँ शेखर बाबू हैं। दूसरी — चाय की हवेली, जहाँ शादी है।"

"हम दो हैं।"

"नहीं।" मैंने सिर हिलाया। "हम तीन हैं।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। सुमन गलियारे के आख़िर में खड़ी थीं, बैग कंधे पर।

"मैं फैक्टरी जाऊँगी," उन्होंने कहा। "मेरे पास पुलिस की चिट्ठी है, मेडिकल का अधिकार है। अगर वहाँ कोई घायल मिला, तो मैं अकेले काम कर सकती हूँ।"

"आप अकेली नहीं जाएँगी," बंसी ने कहा। "मैं साथ चलूँगा। तुम शादी संभालो।"

मैंने एक पल सोचा। फिर सिर हिलाया।

"ठीक है।" मैंने टोकन जेब में टटोला — गरम था। "पर एक बात — फैक्टरी में जो मिले, उसे छेड़ना मत। बस देखना। और सुमन दीदी…" मैंने उनकी तरफ़ देखा। "अगर शेखर बाबू को कुछ हो गया हो, तो मुझे फ़ोन करना। वो मेरे पापा की तरह हैं।"

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो इलाज के वक़्त होती है — पूरा ध्यान।

"तुम भी संभलकर," उन्होंने कहा।

मैं दौड़ पड़ा। छोटू मेरे साथ था, और उसकी छोटी टाँगें मेरे साथ क़दम मिलाने की कोशिश कर रही थीं।

रास्ते में मेरा फ़ोन फिर बजा। अजनबी नंबर।

"मनोहर।" आवाज़ पुरुष की थी, धीमी, सधी हुई। "तुम्हारी बहन रीना अभी चाय की हवेली में है। एक अच्छी लड़की है। पर उसकी शादी की सारी तैयारी भवानी के हाथ में है। तुम अगर बीच में आए, तो सारी मेहनत बेकार।"

मैं रुक गया। छोटू भी रुका।

"कौन बोल रहे हैं?"

"जो तुम्हारे पापा को बचा नहीं सका।" आवाज़ में कोई भाव नहीं था। "पर जो तुम्हें बचा सकता है।"

"झूठ।"

"झूठ नहीं। बस गिनती।" उसने एक पल रुककर कहा, "तुम्हारे टोकन का अंक अभी आठ हज़ार है। तीन काम और कर लो, तो पूरा हो जाएगा। और उसके बाद?" वो हँसा। "उसके बाद तुम वही करोगे जो भवानी ने किया। हिसाब कभी ख़त्म नहीं होता।"

फ़ोन कट गया।

मैंने फ़ोन जेब में रखा। छोटू मेरी तरफ़ देख रहा था।

"कौन था?" उसने पूछा।

"कोई जो सोचता है कि मैं डर जाऊँगा।"

"डर गए?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"थोड़ा। पर उसने एक बात सही कही — हिसाब कभी ख़त्म नहीं होता। इसीलिए तो इसे बराबर करना पड़ता है।"

चाय की हवेली के बाहर गाड़ियाँ खड़ी थीं। अंदर से शहनाई जैसी आवाज़ आ रही थी, पर सुर बेसुरे थे, जैसे कोई जल्दी में बजा रहा हो।

मैंने गेट खोला।

॥

चाय की हवेली का गेट खोलते ही शहनाई की आवाज़ और तेज़ हो गई, पर अंदर का नज़ारा मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ले गया।

आँगन में चारों तरफ़ कुर्सियाँ लगी थीं, ऊपर पीली छतरी बँधी थी, और बीच में रीना बैठी थी — सफ़ेद साड़ी में, आँखें झुकाए, हाथ में मेहंदी। पर उसके आगे दूल्हे की कुर्सी खाली थी। और खाली कुर्सी के चारों तरफ़ भवानी के चार आदमी खड़े थे।

छोटू ने मेरी उँगली पकड़ ली।

"मन्नू भैया…"

"चुप।" मैंने उसे पीछे किया।

रीना ने सिर उठाया और मुझे देखा। उसके चेहरे पर डर नहीं था। थकान थी — वो थकान जो माँ के चेहरे पर रोज़ होती है।

"तू आ गया," उसने कहा। "मैंने सोचा था, नहीं आएगा।"

"क्यों नहीं आता?"

"क्योंकि तू इसी शहर में हर जगह फँसा हुआ है।"

इससे पहले कि मैं कुछ कहूँ, हवेली के अंदर से एक आवाज़ आई — भवानी के मुंशी, हरनाम की।

"मनोहर जी! आ गए तो बहुत अच्छा किया। बैठिए। रिश्ता तय हो रहा है। आपका भी हाथ बँट जाएगा।"

"मेरा हाथ मेरे साथ है," मैंने कहा। "उसकी ज़रूरत नहीं।"

हरनाम मुस्कुराया और मेरे पास आया। उसके हाथ में रजिस्टर था, जैसे हर जगह होता है।

"देखिए," उसने धीरे से कहा, "ठाकुर साहब आज अदालत में हैं। व्यस्त हैं। हमें हुक्म मिला है कि शादी आज ही निपटा दो। अब आप आकर सबका मुँह काला कर दें, ये तो ठीक नहीं।"

"किसका मुँह काला?" मैंने पूछा। "दूल्हे का, जो अभी तक आया नहीं? या उसके बाप का, जिसने धमकी में हाँ कही?"

हरनाम की मुस्कान जगह पर रुक गई। उसने रजिस्टर बंद किया।

"आप जानते हैं," उसने कहा, "ठाकुर साहब ने आपके लिए बहुत सब्र दिखाया है। पर सब्र भी एक हद तक होती है।"

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