The Token System951 / 1154

The Token System – Chapter 951

6 min read November 6, 2026

"परसों।"

"नहीं।" मेरी जेब में टोकन फिर गरम हुआ, और मुझे लगा जैसे उसने अपनी आवाज़ से कहा हो। "आज। और हमें वहाँ पहुँचना है — भवानी के आदमियों से पहले।"

तभी मेरा फ़ोन फिर बजा। शेखर बाबू का नंबर।

पर इस बार जब मैंने उठाया, तो दूसरी तरफ़ से आवाज़ नहीं आई। सिर्फ़ कुछ सुनाई दिया — पैरों की आहट, फिर एक दरवाज़ा बंद होने की आवाज़।

और फिर, बहुत हल्की, एक आवाज़ — जैसे किसी ने बहुत दूर से कहा हो —

"मनोहर। भाग।"

फ़ोन कट गया।

मैंने हथौड़ा बंसी को दिया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

"कहाँ?" बंसी ने पूछा।

"शादी।" मैंने बाहर कदम रखा। "पहले शेखर बाबू की बेटी। बाकी बाद में।"

॥

हथौड़ा बंसी के हाथ में देकर मैं सीधा अस्पताल की तरफ़ भागा। घुटने की चोट हर क़दम पर चीख़ती थी, पर मैं रुका नहीं। बंसी पीछे-पीछे आ रहा था, हथौड़ा उसके हाथ में ऐसा लग रहा था जैसे किसी मज़दूर का औज़ार हो, जो अब अपनी जगह पहुँच गया हो।

अस्पताल का गलियारा दोपहर में भी अंधेरा था। मैंने सीधा डॉक्टर सुमन के केबिन का दरवाज़ा खोला, बिना खटखटाए।

सुमन कुर्सी पर बैठी काग़ज़ देख रही थीं। दरवाज़ा खुलते ही उन्होंने सिर उठाया और मेरा चेहरा देखकर काग़ज़ बंद कर दिया।

"तुम्हारा घुटना," उन्होंने कहा। "बैठो।"

"बैठने का वक़्त नहीं है।"

"तो खड़े-खड़े बोलो। पर पहले ये बताओ — तुम्हारी शर्ट पर ये खून किसका है?"

मैंने नीचे देखा। दीवार तोड़ते वक़्त हाथ चीरा था, खून सूख चुका था। मैंने जवाब नहीं दिया, सीधे कुर्सी के सामने खड़ा हो गया।

"शेखर बाबू ग़ायब हैं," मैंने कहा। "भवानी के दो आदमी उन्हें गाड़ी में उठा ले गए। उनका चश्मा फ़र्श पर टूटा मिला। और उनके नंबर से आख़िरी कॉल आई, जिसमें किसी ने कहा — मनोहर, भाग।"

सुमन ने कुर्सी का हत्था पकड़ लिया। उनके चेहरे पर वो भाव आया जो लोग दबाते हैं, पर दब नहीं पाते।

"तुमने पुलिस को बताया?"

"राजेंद्र अदालत में हैं। मैंने उन्हें फ़ोन कर दिया है। पर मुझे ये नहीं चाहिए कि शेखर बाबू के साथ वही हो जो उस रात एक मरीज़ के साथ हुआ था।"

मैंने वो कह दिया जो मुझे नहीं कहना चाहिए था। सुमन एक क्षण के लिए स्थिर हो गईं। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "कौन सा मरीज़?"

"वो जो आपने भवानी के होम भेजा था। वो काग़ज़ — जिस पर आपने हस्ताक्षर किए थे।"

कमरे में सन्नाटा नहीं छाया। बाहर से स्ट्रेचर की आवाज़ आ रही थी, कोई दूर किसी को बुला रहा था। सुमन ने मेरी तरफ़ देखा, फिर अपनी दराज़ की तरफ़।

वो उठीं, दराज़ खोली, और सबसे नीचे से एक भूरे रंग की फ़ाइल निकाली। फ़ाइल मोटी नहीं थी, पर उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे उसमें बारूद भरा हो।

"बैठ जाओ," उन्होंने कहा। इस बार मैं बैठ गया।

सुमन ने फ़ाइल खोली। अंदर पीले पड़े काग़ज़ थे — ड्यूटी चार्ट की कॉपियाँ, कुछ पर स्याही फैली हुई थी।

"एक रात," उन्होंने कहा, अपनी उँगली चार्ट पर रखकर, "एक बच्चा आया था। साँस फूल रही थी। मैंने इलाज शुरू किया। तभी भवानी का आदमी आया — सफ़ेद कुर्ता, मीठी आवाज़। बोला, ठाकुर साहब ने कहा है, ये मरीज़ हमारे होम में जाएगा। मैंने कहा, बच्चा स्टेबल नहीं है। उसने बस एक लाइन कही — डॉक्टर साहब, आपका तबादला आपकी जेब में है।"

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा।

"मैंने उस रात हस्ताक्षर कर दिए। अगली सुबह वो बच्चा नहीं था।"

उन्होंने फ़ाइल से एक काग़ज़ निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। ड्यूटी चार्ट की कॉपी थी। उस रात की तारीख़, नर्स का नाम, और नीचे मरीज़ का नाम — काटा हुआ था, पर नीचे हल्की पेंसिल में वही नाम लिखा था, जो किसी और काग़ज़ पर था। वही नाम जो हरीश चंद्र की फ़ाइल में था।

"मैंने ये आठ साल संभालकर रखा," सुमन ने कहा। "हर बार सोचती थी, जलाऊँ। हर बार हाथ रुक जाता था।"

"अब?"

"अब मैं गवाही दूँगी।"

उन्होंने फ़ाइल बंद की और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। मैंने फ़ाइल ली, पर मेरे हाथ काँप रहे थे — और काँपने की वजह फ़ाइल नहीं थी। मेरी जेब में टोकन गरम था, लगातार, बिना रुके, जैसे कोई चूल्हे पर तवा चढ़ा भूल गया हो।

"ये आप अपने पास रखिए," मैंने फ़ाइल वापस बढ़ाई। "मेरे पास रखी तो भवानी के आदमी इसे भी उठा ले जाएँगे। आप अदालत में सीधे जज साहब को दीजिए।"

सुमन ने फ़ाइल वापस ली और अपने बैग में रखी।

"तुम्हारा घुटना देखूँ?" उन्होंने पूछा।

"बाद में।"

"नहीं। अभी।"

उन्होंने मेरी पैंट की तरफ़ इशारा किया। घुटने पर खून सूखकर काला हो गया था और कपड़ा चिपक गया था। सुमन ने दराज़ से पट्टी निकाली और बिना ज़्यादा पूछे साफ़ किया। उनके हाथ तेज़ थे, बिना झिझक के।

"दर्द होगा," उन्होंने कहा।

"होने दीजिए।"

जब वो पट्टी बाँध रही थीं, तभी दरवाज़ा फिर खुला। छोटू अंदर घुसा, साँस फूली हुई, आँखें बड़ी।

"मन्नू भैया," वो हाँफते हुए बोला, "अस्पताल के गेट पर सफ़ेद गाड़ी खड़ी है। बड़ी वाली। और उसमें…" वो रुक गया, गला सूख रहा था।

"क्या?"

"शेखर बाबू बैठे दिख रहे हैं। खिड़की से। सिर नीचे किए।"

मैं खड़ा हो गया। सुमन भी खड़ी हो गईं और खिड़की की तरफ़ बढ़ीं। उन्होंने पर्दा हटाकर नीचे झाँका। गाड़ी नीचे खड़ी थी — सफ़ेद, धूल भरी, इंजन बंद। पिछली खिड़की में एक साया था, सिर झुका हुआ, कंधे तक सफ़ेद कुर्ता।

सुमन ने पर्दा वापस खींच दिया। उनका चेहरा बदल गया था — वो डर नहीं था, कुछ और था। ग़ुस्सा, जो ठंडा हो चुका हो।

"मनोहर," उन्होंने कहा, "गाड़ी के अंदर शेखर बाबू नहीं, उनका कोट बैठा है।"

मैंने फिर झाँका। अब ध्यान से देखा तो समझ आया — वो कंधे सीधे नहीं थे, उनमें वो झुकाव नहीं था जो ज़िंदा आदमी के होते हैं। किसी ने कुर्ता और कोट कुर्सी पर टिका दिया था, और ऊपर एक टोपी रख दी थी। दूर से बिल्कुल शेखर बाबू लगते थे।

"ये जाल है," बंसी ने कहा, जो अब तक दरवाज़े पर खड़ा सब सुन रहा था। "वो चाहते हैं कि तू नीचे भागे। गेट पर उनके आदमी होंगे।"

"तो मैं नीचे नहीं जाऊँगा।" मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "आपके पास अस्पताल का पिछला फाटक है? वो जो गलियारे के आख़िर में है, जहाँ से कूड़ा उठाती गाड़ी निकलती है?"

सुमन ने सिर हिलाया।

"तो वहाँ से।" मैंने छोटू की तरफ़ देखा। "तू यहीं रुकेगा। डॉक्टर दीदी के पास।"

"मैं नहीं रुकूँगा—"

"छोटू।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। "तू मेरी सबसे बड़ी आँख है। तू यहीं से गाड़ी देखता रह। अगर कोई नीचे आए या गाड़ी हिले, तो तुरंत फ़ोन कर। समझा?"

उसने होठ भींचे, फिर सिर हिलाया।

मैं और बंसी गलियारे से निकले। पीछे के फाटक तक पहुँचे तो देखा कि वहाँ कोई नहीं था, पर फाटक के बाहर कूड़े के डिब्बे के पास एक आदमी खड़ा था, सिगरेट पी रहा था। सफ़ेद कुर्ता, छोटी कद का।

"एक ही है?" बंसी ने फुसफुसाया।

"दिख रहा है एक।"

"तो एक ही होगा।"

बंसी ने हथौड़ा कमर पर टिकाया और सीधा चल पड़ा, जैसे कोई मज़दूर चाय पीने जा रहा हो। मैं पीछे रहा। जैसे ही बंसी उस आदमी के पास पहुँचा, उसने कुछ कहा — मुझे सुनाई नहीं दिया — पर आदमी ने सिगरेट फेंकी और मुड़ा।

तभी मैंने देखा — और मेरा दिल धक्क से रह गया।

उस आदमी की कलाई पर, आस्तीन के नीचे, एक गोल निशान था। पीतल जैसा, टोकन के आकार का।

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