The Token System – Chapter 950
बंसी की दुकान से होते हुए हम मेरे घर पहुँचे। गली में घुसते ही मैंने देखा — घर के पीछे वाली कोठरी का दरवाज़ा खुला था। वो दरवाज़ा जो आठ साल से बंद था, टूटा हुआ था।
माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनके हाथ में एक रस्सी थी, जैसे उन्होंने कुछ बाँधकर खोला हो।
"माँ —"
"आज सुबह खुल गया," उन्होंने कहा। "अंदर से आवाज़ आई थी। जैसे कोई खुरच रहा हो।"
मैं अंदर गया। कोठरी छोटी थी, दीवारें नम थीं। फ़र्श पर मिट्टी और पुरानी घड़ी का टूटा शीशा पड़ा था। पर वो घड़ी दीवार पर टँगी थी — सिर्फ़ उसका शीशा टूटा था।
"ये शीशा कल तक सलामत था," माँ ने कहा।
मैंने घड़ी नीचे उतारी। उसके पीछे, काँच के नीचे, एक पर्ची थी — फिर से। मेरे ही हाथ की लिखाई में।
"जो तूने खोजा, वो तेरे पास है। जो तूने छोड़ा, वो तेरा नहीं है। — मनोहर।"
बंसी ने मेरे कंधे के ऊपर से पढ़ा।
"ये तूने नहीं लिखा," उसने कहा।
"मैं जानता हूँ।"
मेरी आँखों के सामने भीतरी कमरे की दीवार आ गई — उजले चूने से बीस साल पुराना लिखा मेरा नाम। मेरे पैदा होने से पहले का।
"बंसी," मैंने धीरे से कहा, "ये पर्ची कहती है — जो तूने खोजा, वो तेरे पास है। मतलब असली काग़ज़ मेरे पास है।"
"तो ढूँढ।"
मेरे पास क्या था? मेरी जेब में — टोकन, हवेली का काग़ज़, तीन सिक्के, शेखर बाबू का चश्मा। और…
मेरी जेब में फटा हुआ एक और काग़ज़ था — कमलेश का पीला लिफ़ाफ़ा, जो उसने सुबह दिया था। जिसे मैंने अदालत में खोला भी नहीं था।
मैंने उसे निकाला। मोटा, सीलबंद। ऊपर कुछ नहीं लिखा था। मैंने खोला।
अंदर एक पुरानी तस्वीर थी — तीन आदमी। दादा सुखदेव, रामदीन मिस्त्री, और एक तीसरा आदमी, कम उम्र का। और उस तीसरे आदमी के हाथ में एक पुरानी घड़ी थी, जिसका शीशा सलामत था। पीछे लिखा था — "उत्तर देने वाला है, जो उत्तर दीवार से आगे निकलेगा। — कम्मो।"
बंसी ने गहरी साँस ली।
"कम्मो," उसने कहा। "अब ये कम्मो कौन है?"
"पता नहीं।" मैंने तस्वीर को ठीक से देखा। तीसरे आदमी की कलाई पर एक निशान था — छोटा, गोल, टोकन जैसा। "पर ये तीसरा आदमी…"
"कलाई पर टोकन का निशान," बंसी ने कहा। "जैसे तेरे पास।"
"हाँ।"
"तो मतलब तीसरे आदमी के पास भी टोकन था।"
मैंने तस्वीर मेज़ पर रखी। मेरी जेब में टोकन फिर गरम हुआ, पर इस बार धीरे — जैसे कोई केवल याद दिला रहा हो।
मैंने टोकन निकाला। उसकी सतह पर नई लकीर थी — अठारहवीं। और उसके नीचे एक शब्द — "घड़ी।"
घड़ी। पापा की घड़ी। जो दीवार पर टँगी थी। जिसका शीशा अभी टूटा था।
"बंसी," मैंने कहा, "पापा की घड़ी का शीशा आज टूटा। और पर्ची अंदर मिली। मतलब किसी ने घड़ी को खोला।"
"कौन?"
"वही जो कोठरी खोलता है।"
मैं माँ के पास गया। "माँ, सुबह जब आवाज़ आई थी, क्या तुमने किसी को बाहर देखा?"
माँ ने सिर हिलाया।
"एक आदमी था। पीछे की गली में। सिर पर टोपी थी। काले कपड़े। मैंने पूछा तो चला गया।"
"कितने बजे?"
"करीब छह के।"
छह बजे। मतलब वो वक़्त जब मैं अस्पताल में था और शेखर बाबू उठाए जा चुके थे।
मैंने चश्मा जेब से निकाला और एक बार फिर मोटे काँच से देखा। उसके किनारे पर एक फीका निशान था — पेंसिल या किसी सियाही से लिखा।
"शेखर बाबू ने चश्मे पर कुछ लिखा है," मैंने कहा।
"क्या?"
मैंने काँच को रोशनी में झुकाया। "तीन शब्द हैं — 'उत्तर पहले देख।'"
बंसी ने कुछ कहा नहीं। उसने सिर्फ़ मेरी तरफ़ देखा।
मैंने तस्वीर फिर उठाई। उस तीसरे आदमी की कलाई पर टोकन जैसा निशान। और उस आदमी के हाथ में पुरानी घड़ी।
अचानक मुझे कुछ याद आया — हवेली के भीतरी कमरे में मैंने दीवार पर एक तस्वीर देखी थी? नहीं, दीवार पर सिर्फ़ नाम था। पर फ़र्श पर पड़ी पर्चियों में एक पुरानी तस्वीर भी थी, जिसे मैंने उठाया नहीं था। वो मेरी जेब में नहीं थी।
"बंसी, हमें हवेली लौटना होगा। भीतरी कमरे में जो तस्वीर फ़र्श पर पड़ी थी — वो उठानी है।"
"वहाँ भवानी के आदमी—"
"अभी कोई नहीं होगा। भवानी अदालत में है। और उसके आदमी शेखर बाबू को कहीं ले जा रहे हैं।"
हम निकले ही थे कि मेरा मोबाइल फिर बजा। वही नंबर। शेखर बाबू का।
मैंने उठाया।
"मन्नू?" आवाज़ फिर फटी हुई, पर इस बार कुछ और था — कोई पीछे रो रहा था। "मैंने सोच लिया। मैंने उस रात कुछ देखा था जो मैंने किसी को नहीं बताया।"
"क्या?"
"तेरा पापा जब उस घर में गए थे — उत्तर वाली दीवार के पीछे — मैं वहीं था। मैंने देखा कि उन्होंने कुछ दीवार में रखा। और फिर मुझे देखकर रुक गए।" उसकी आवाज़ काँपी। "उन्होंने कहा — 'शेखर, तू इसे कभी मत छूना। जिस दिन तेरी बेटी की शादी हो, उस दिन ये अपने आप खुलेगा।'"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"और आज?" मैंने पूछा।
"आज परसों शादी है।" उसने एक लंबी साँस ली। "मन्नू — वो चीज़ तेरे घर के पीछे वाली कोठरी की उत्तर दीवार के पीछे है। उसी जगह जहाँ उन्होंने पहली बार तेरा नाम लिखा था।"
फ़ोन कट गया।
मैं चुपचाप मोबाइल जेब में डालकर माँ की तरफ़ देखा।
"माँ," मैंने कहा, "कोठरी में जो दीवार मेरे बिस्तर के सिरहाने है — वही उत्तर वाली दीवार है?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था — पहचान, फिर डर।
"तू कैसे जानता है?" उन्होंने धीरे से कहा।
"क्योंकि पापा ने बताया।" मैंने झूठ बोला, पर माँ ने सच मान लिया।
वो धीरे से कमरे के अंदर गईं और एक मोटी लकड़ी की पेटी खोली। उसमें से एक हथौड़ा निकाला — पुराना, लकड़ी का हैंडल, ज़ंग लगा सिर।
"तेरे पापा ने ये छोड़ा था," उन्होंने कहा। "कहा था — जब बेटा पूछे तभी देना।"
मैंने हथौड़ा हाथ में लिया। हैंडल पर फीकी स्याही में लिखा था — "आख़िरी दीवार।"
और मेरी जेब में टोकन फिर गरम हुआ, इस बार ज़ोर से — जैसे किसी ने माचिस जलाई हो। मैंने निकाला। उस पर नई लकीर — उन्नीसवीं। और उसके नीचे एक शब्द — "अब।"
बंसी ने हथौड़े की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"अच्छा," वो बोला, "तो आज हम दीवार तोड़ेंगे।"
"हाँ।" मैंने हथौड़ा उठाया। "पर एक बात — शेखर बाबू ने कहा कि उनकी बेटी की शादी परसों है। अगर हमारी वजह से वो शादी टूटी, तो ये हिसाब किसी काम का नहीं।"
"तो?"
"तो पहले दीवार। फिर शादी।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर वो हँसा — वो हँसी जो ख़तरे से पहले आती है।
"चल," उसने कहा। "दीवार का पहला वार तेरा।"
मैं कोठरी में गया। दीवार नम थी, उसमें बारिश की गंध थी। मैंने माँ को देखा, उन्होंने सिर हिलाया। बंसी भी पीछे खड़ा था।
मैंने हथौड़ा उठाया और पहला वार पहली ईंट पर किया।
ईंट चटकी, पर टूटी नहीं।
दूसरा वार।
तीसरा वार।
और चौथे वार पर ईंट टूटी — और उसके पीछे से, दीवार के गड्ढे से, एक पुरानी मिट्टी की गंध आई, और पीतल की एक डिबिया मेरे हाथ में आ गिरी — छोटी, लाल कपड़े में लिपटी।
मैंने उसे खोला।
अंदर एक पर्ची थी, जिस पर सिर्फ़ दो शब्द लिखे थे — "अब कह।"
बंसी ने मेरे कंधे के ऊपर से देखा।
"कह क्या?" उसने पूछा।
मैंने पर्ची पलटी। पीछे, मेरे ही हाथ की लिखाई में, एक लाइन थी जो मैंने कभी नहीं लिखी —
"जो शुरू हुआ था, वो अब पूरा होगा। पर उससे पहले — शेखर की बेटी बचेगी।"
मैंने पर्ची जेब में रखी।
"बंसी," मैंने कहा, "शादी कब है?"
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