The Token System – Chapter 949
"हाँ। और भवानी साहब अंदर जाने से पहले रुके। जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहे थे।" रामू ने आवाज़ धीमी की। "और मैंने सुना — उन्होंने अपने आदमी से कहा, 'अगर मैं आधे घंटे में बाहर न निकलूँ, तो उस लड़के को मेरे बाप के कमरे में ले जाना।'"
मेरा दिल धक् से रह गया।
"किस लड़के को?"
"मुझे नहीं पता।" रामू पीछे हटा। "बस इतना सुना।"
बंसी ने मेरी बाँह पकड़ी और मुझे गलियारे की तरफ़ खींचा।
"भवानी ने जान-बूझकर अदालत में आकर कबूल किया कि बीसवाँ काग़ज़ उसके बाप के कमरे में है," वो फुसफुसाया। "क्यों? ताकि सब उस कमरे की तरफ़ देखें। और वो हमें वहाँ बुला सके।"
"तो?"
"तो हमें उसके बाप का कमरा नहीं, वो चीज़ ढूँढनी है जो उस कमरे से पहले है।"
"कौन सी?"
बंसी ने मेरी जेब से वो काग़ज़ निकाला जो मैं हवेली से लाया था — हवेली के आधे हिस्से वाला, जिसके पीछे मिलावट की लाइन थी।
"ये," उसने कहा। "क्योंकि जिसने ये भेजा, उसने जान-बूझकर यही काग़ज़ भेजा। और इसमें जो मिलाया गया है, वो बताता है कि असली काग़ज़ कहाँ है।"
हम दोनों अस्पताल के पिछले हिस्से में उसी चाय के कमरे में गए जहाँ सुमन ने एक बार मुझे अलग बात बताई थी। बंद कमरा, एक बल्ब, एक पुरानी मेज़। बंसी ने दरवाज़ा बंद किया और काग़ज़ मेज़ पर रखा।
"आगे जला दो," उसने कहा। "पीछे रोशनी डालो।"
मैंने माचिस जलाई और काग़ज़ को उसकी सतह से दो उँगली ऊपर पकड़ा। गरमी पीछे की स्याही को जगाने लगी। पीले काग़ज़ पर जो लाइनें मिट चुकी थीं, वो बहुत हल्की होकर उभरने लगीं — जैसे साँस ले रही हों।
"रुक," बंसी ने कहा।
मैंने माचिस बुझाई। उसने काग़ज़ को खिड़की की तरफ़ झुकाया।
"देख। मिलावट वाली लाइन के नीचे… ये लिखा है — 'जो पढ़े, वो जाने — ये नक़ल है। असली उत्तर वाली दीवार के पीछे।'"
"उत्तर वाली दीवार?"
"हवेली की उत्तर वाली दीवार।" बंसी ने काग़ज़ मेज़ पर रखा। "भवानी के दादा ने असली काग़ज़ उठाकर अपनी नक़ल रख दी थी। असली वहीं है — उस दीवार के पीछे।"
"पर उस दीवार के पीछे तो…"
"हाँ।" बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "वही भीतरी कमरा। जहाँ तेरा नाम लिखा था।"
मेरे हाथ रुक गए। भीतरी कमरे में मैंने दीवार पर अपना नाम देखा था — बीस साल पुराना। मेरे पैदा होने से पहले का।
"बंसी," मैंने धीरे से कहा, "उस दीवार पर मेरा नाम किसने लिखा?"
"यही तो सवाल है।" उसने काग़ज़ मोड़ा। "और अगर असली काग़ज़ उसी दीवार के पीछे है, तो जिसने तेरा नाम लिखा, उसने शायद वही काग़ज़ देखा था।"
मैं कुर्सी पर बैठ गया। घुटने की चोट फिर जागी — खून सूखकर पैंट से चिपक गया था।
मुनीम की लाल बही मेरे पास थी। मैंने उसे खोला। आख़िरी पन्ने पर पापा की लिखाई थी — वो लिखाई जो मैंने सुबह देखी थी और जो मेरी अपनी लिखाई जैसी थी। नीचे एक तारीख़ थी, कोई बीस साल पुरानी, और उसके नीचे सिर्फ़ दो शब्द — "उत्तर। दीवार।"
मैंने वो पन्ना बंसी को दिखाया।
"अब जोड़," मैंने कहा। "पापा ने बही में लिखा — उत्तर दीवार। और काग़ज़ कहता है — असली नक़ल के पीछे, उत्तर दीवार के पीछे। मतलब पापा जानते थे कि असली काग़ज़ कहाँ है।"
"और वो बीस साल से वहीं है," बंसी ने कहा। "जब से तेरे पापा गए।"
कमरे में सन्नाटा था, पर वो सन्नाटा नहीं जो डराता है। वो सन्नाटा था जो कुछ जुड़ने से पहले आता है।
तभी मेरा मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर नाम नहीं था। सिर्फ़ नंबर।
मैंने उठाया।
"मन्नू?"
आवाज़ फटी हुई थी, जैसे किसी ने फ़ोन को मुँह से दूर रखा हो और ज़ोर से बोला हो। पर पहचान साफ़ थी — शेखर बाबू।
"शेखर बाबू? आप कहाँ—"
"सुन।" उसकी आवाज़ में वो डर था जो बातों से नहीं छिपता। "मैंने तुझे काग़ज़ दिया। बहुत काग़ज़ दिए। मैंने अपनी जान जोखिम में डालकर दिए। अब मेरी बात सुन।"
पीछे किसी के बोलने की आवाज़ आई, फिर धक्के जैसी आवाज़।
"मेरी बेटी की शादी है परसों," शेखर बाबू ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "भवानी के आदमी कह रहे हैं कि अगर मैंने उनके ख़िलाफ़ गवाही दी, तो शादी नहीं होगी। लड़के वाले मना कर देंगे। मेरी बेटी…"
"शेखर बाबू, आप कहाँ हैं?"
"वो मुझे वहाँ ले जा रहे हैं जहाँ तेरे पापा को ले गए थे।" फिर एक लंबी साँस। "मन्नू, तेरे पापा उस रात ज़िंदा बचे थे क्योंकि मैंने उन्हें बचाया था। अब मैं खुद…"
पीछे फिर धक्के की आवाज़। फिर फ़ोन कट गया।
मैंने वापस कॉल किया। बंद।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। उसने कुछ पूछा नहीं। मेरे चेहरे से सब पढ़ लिया।
"वो क्या बोले?" उसने पूछा।
"कह रहे हैं कि उन्हें वहाँ ले जा रहे हैं जहाँ पापा को ले गए थे।" मैंने मोबाइल जेब में डाला। "और उनकी बेटी की शादी परसों है।"
बंसी ने एक गहरी साँस ली। वो उठा, चाय की केतली उठाई, फिर रख दी। फिर बोला, "तेरे पापा कहाँ ले जाए गए थे?"
"हवेली। उस रात। भवानी का बाप।"
"नहीं।" बंसी ने सिर हिलाया। "पापा को हवेली से ज़िंदा निकाला गया था। शेखर कह रहा है — 'जहाँ तेरे पापा को ले गए थे'। मतलब हवेली नहीं। कोई और जगह।"
"कौन सी?"
बंसी ने काग़ज़ उठाया, जो हमने अभी गरम किया था।
"ये हिसाब भवानी के दादा के हाथ से निकला है," उसने कहा। "पर इस पर लिखी उत्तर वाली दीवार की लाइन किसी और ने जोड़ी है। और वो 'किसी और' ने पापा की बही में भी लिखा। दोनों जगह एक ही बात — उत्तर दीवार।"
"तो?"
"तो वो जगह उत्तर दीवार के पीछे है, पर हवेली में नहीं।" बंसी ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये लाइन नक़ल के पीछे लिखी है — जैसे कोई बता रहा हो कि असली काग़ज़ ढूँढना है तो उत्तर वाली दीवार ढूँढ, पर वो दीवार कोई और जगह है।"
मैंने काग़ज़ अपने हाथ में लिया। स्याही अभी भी गरम थी।
"मुनीम," मैंने अचानक कहा। "वो कहाँ है?"
"हवेली में रुका था। वो लाल बही लेकर आया था।"
"उसका फ़ोन है?"
"हवेली के पिछले कमरे में है।"
मैंने उसे फ़ोन किया। चार बार बजा।
"हाँ?"
"मुनीम जी, आपने बही दी थी — उसके आख़िरी पन्ने पर पापा की लिखाई में 'उत्तर। दीवार।' लिखा है। आप जानते हैं किस दीवार की बात है?"
दूसरी तरफ़ चुप्पी। फिर बहुत धीमी आवाज़। "जानता हूँ। पर तुमसे नहीं कह सकता।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो जगह उस आदमी से जुड़ी है जिसका नाम किसी काग़ज़ में नहीं।" एक गहरी साँस। "और उस आदमी ने तुम्हें उस जगह जाने से रोकने की क़सम खाई है। मुझे भी।"
"मुनीम जी, शेखर बाबू को उठा लिया गया है। अगर आप कुछ जानते हैं—"
"मन्नू बेटा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ था — अपराध जैसा। "वो जगह तेरे घर के पीछे वाली कोठरी थी। जिसमें पापा की घड़ी रखी थी। उसी रास्ते से गए थे। पर वो रास्ता सिर्फ़ उसी वक़्त खुलता है जब…"
फ़ोन कट गया। मैंने वापस किया। नहीं बजा। बैटरी?
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"घर के पीछे वाली कोठरी," मैंने कहा। "पापा की घड़ी वाली। जो आठ साल से बंद है।"
हम दोनों एक साथ उठे।
रास्ते में मैंने सुमन को फ़ोन किया। उसने तीसरी रिंग पर उठाया।
"सुमन, जज साहब को बोलना — सुनवाई अभी रोके। भवानी के आदमियों ने शेखर बाबू को उठाया है।"
"क्या? कैसे?"
"पता नहीं। पर सुनवाई में सबको बताना कि शेखर बाबू गायब हैं — हिरासत में। राजेंद्र से भी कहना।"
"मन्नू —"
"बस यही।" मैंने फ़ोन काटा।
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