The Token System – Chapter 948
"साहब, अदालत चलें?"
मैंने उसे देखा। चालक युवा था, सिर पर पुरानी टोपी।
"कितना लोगे?"
"जितना दोगे।" उसने मुस्कुराकर कहा।
मैं बैठ गया। ऑटो चला। रास्ते में मैंने अपनी जेब से वो काग़ज़ निकाला और फिर पढ़ा। नीचे दादा का नाम, ऊपर जमुना देवी के ससुर का नाम। और पीछे वो एक लाइन, जो मेरे हाथों को ठंडा कर रही थी।
"भवानी के दादा के हाथ से निकला।"
अदालत के दरवाज़े पर पहुँचकर मैंने ऑटो वाले को पैसे दिए। वो मुड़ा और बोला, "साहब, आपकी जेब से कुछ गिरा था।"
मैंने जेब टटोली। काग़ज़ वहीं था। "क्या गिरा?"
उसने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराकर चला गया। मैं अदालत की सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। सीढ़ियों पर भीड़ थी। पहला क़दम रखा, दूसरा, और फिर तीसरे पर मेरी नज़र एक चेहरे पर पड़ी।
वो मुनीम था, हाँफता हुआ, मेरे पीछे आ रहा था। पर उसके पीछे और भी कोई था। मैंने आँखें सिकोड़ीं — सफ़ेद कुर्ता, लंबा, हाथ जेब में।
भवानी का आदमी।
मैंने रफ़्तार बढ़ाई। पर सीढ़ियों के ऊपर, अदालत के दरवाज़े पर, एक और साया खड़ा था। हरीश चंद्र का साथी वकील, हाथ में पीली फ़ाइल लिए।
वो मेरी तरफ़ देखकर बोला, "तू वही है जिसका नाम दीवार पर लिखा है?"
"हाँ।"
"तो अंदर आ। तेरे लिए एक काग़ज़ रखा है।"
मैं अंदर गया। अदालत का हॉल खाली था — सिर्फ़ जज की कुर्सी खाली थी और मेज़ पर एक लिफ़ाफ़ा पड़ा था।
वकील ने कहा, "जज साहब दस मिनट में आएँगे। उन्होंने कहा — जो आदमी दीवार पर लिखे नाम वाला है, वो पहले ये खोले।"
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। उस पर मेरा नाम था — मनोहर। मेरी ही लिखाई में।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक पुरानी तस्वीर थी — हवेली के सामने खड़े तीन आदमी। और उसके पीछे, पेंसिल से लिखी एक लाइन —
"जो इस तस्वीर में बीच में खड़ा है, वो भवानी नहीं है। वो भवानी का दादा है। और उसके हाथ में जो काग़ज़ है, वो वही है जो तेरी जेब में है।"
मैंने तस्वीर ध्यान से देखी। बीच वाले आदमी के हाथ में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था। उसका किनारा मेरी जेब वाले काग़ज़ से मिलता था। एक ही काग़ज़, दो जगह।
मेरे पीछे से आवाज़ आई — "अब समझ आया?"
मैं पलटा। भवानी खुद सीढ़ियों पर खड़ा था, दोनों हाथ जेब में, चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान।
"तेरे दादा ने मेरे दादा से हिस्सा छीनकर ये काग़ज़ बनवाया था," उसने कहा। "और आज तू उसी काग़ज़ को सच मानकर अदालत में लाया है।"
मैंने तस्वीर उसकी तरफ़ उठाई। "फिर ये क्या है?"
भवानी ने तस्वीर देखी। उसकी मुस्कान एक पल के लिए हिली। फिर वो बोला, "ये तस्वीर मेरे दादा के कमरे से कभी बाहर नहीं गई। इसे तूने कहाँ से निकाला?"
"तेरे आदमी ने मेरे पीछे भेजा।" मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया। "और ये काग़ज़ तेरे दादा के हाथ से निकला था। तेरे ही आदमी ने कहा।"
भवानी का चेहरा बदला। वो एक कदम पीछे हटा।
"कौन कहा?"
"जिसने काग़ज़ मुझ तक पहुँचाया।"
उसी वक़्त अदालत का दरवाज़ा खुला और हरीश चंद्र अंदर आए, हाथ में मोटी फ़ाइल। उन्होंने भवानी को देखा, फिर मुझे, फिर उस तस्वीर को जो मेरे हाथ में थी।
वो रुक गए। फिर धीरे से बोले, "ये तस्वीर तो…"
"क्या?" मैंने पूछा।
"ये तस्वीर मेरे पास भी है," हरीश चंद्र ने कहा। "पर उसमें चार आदमी हैं। चौथे का चेहरा किसी ने फाड़ दिया था। और मेरी वाली तस्वीर में बीच वाला आदमी मुस्कुरा रहा है — यहाँ नहीं।"
मैंने तस्वीर फिर देखी। बीच वाले आदमी के चेहरे पर कोई भाव नहीं था — सपाट, जैसे किसी ने बाद में मिटा दिया हो।
हरीश चंद्र ने फ़ाइल खोली और उसमें से एक और तस्वीर निकाली। वही तस्वीर, पर चार आदमी। चौथे का चेहरा फटा हुआ।
"ये चौथा कौन है?" मैंने पूछा।
हरीश चंद्र ने भवानी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"ये वही आदमी है," उन्होंने कहा, "जिसका नाम किसी काग़ज़ में नहीं है। और जिसके बारे में भवानी का दादा कभी बोलता नहीं था।"
भवानी अचानक हँसा। वो हँसी अदालत के खाली हॉल में गूँजी।
"लगता है, आज बहुत कुछ खुलेगा," वो बोला, "और उसमें मेरा नाम भी होगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और तभी मेरी जेब में टोकन गरम हुआ।
मैंने हाथ डालकर उसे निकाला। उसकी सतह पर नई लकीर उभर रही थी — सत्रहवीं। और उसके नीचे एक शब्द, जो पहले कभी नहीं आया —
"चौथा।"
मैंने टोकन हरीश चंद्र को दिखाया। उन्होंने देखा और उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"ये नाम है," उन्होंने धीरे से कहा, "या जगह?"
टोकन ने मेरे हाथ में एक और शब्द उभारा — "हवेली।"
और उसके बाद — "तहखाना।"
भवानी ने एक क़दम आगे बढ़ा। "तू तहखाने की बात क्यों कर रहा है?"
मैंने टोकन जेब में रखा और हरीश चंद्र की तरफ़ देखा।
"आपने कहा था," मैंने कहा, "कि उन्नीस काग़ज़ हैं। बीसवाँ?"
हरीश चंद्र ने अपनी फ़ाइल बंद की। "बीसवाँ काग़ज़ मेरे पास नहीं है। वो उस आदमी के पास है जिसका नाम किसी काग़ज़ में नहीं।"
"तो वो कहाँ है?"
उन्होंने भवानी की तरफ़ देखा। भवानी ने सिर हिलाया, जैसे कोई पुरानी बात मान रहा हो।
"मेरे होम में," भवानी ने कहा। "मेरे बाप के कमरे में। और उस कमरे की चाबी मेरे पास भी नहीं है।"
अदालत का दरवाज़ा फिर खुला। राजेंद्र अंदर आया, हाथ में वही चाबी जो श्यामलाल से छीनी गई थी।
"जज साहब आ रहे हैं," उसने कहा। "और साथ में तीन और काग़ज़ लाए हैं।"
मैंने भवानी की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई थी।
"तो आज हिसाब का चौथा हिस्सा खुलेगा," वो बोला। "पर एक बात याद रख — जो तहखाने में है, वो किसी का नहीं है। वो ख़ुद एक आदमी है।"
और मेरी जेब में टोकन फिर गरम हुआ, जैसे वो भवानी की बात से सहमत हो।
॥
रामू की आवाज़ में वो कंपन था जो झूठ बोलते वक़्त लोगों की ज़ुबान पर आ जाता है।
"बाबू तो ठीक थे," वो बोला, "पर जब वो दो आदमी आए, तब वो लिफ़ाफ़े उलटने लगे। कुछ ढूँढ रहे थे। बाबू ने मुझे बाहर भेज दिया। मैं दरवाज़े के पीछे खड़ा था। फिर गाड़ी में बैठ गए।"
"कौन से आदमी?"
"सफ़ेद कुर्ता। एक लंबा, एक मोटा।" रामू ने अपना कॉलर खींचा। "एक की कलाई पर बड़ा ज़ख़्म था।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो कुछ नहीं बोला, पर उसका जबड़ा कस गया।
शेखर बाबू का केबिन उस वक़्त खाली था, पर खाली नहीं लग रहा था। मेज़ पर फ़ाइलें बेतरतीब पड़ी थीं। कुर्सी घूमी हुई थी। और फ़र्श पर, मेज़ के पैर के पास, चश्मा पड़ा था — एक काँच टूटा, दूसरा सलामत।
मैंने चश्मा उठाया। मोटा फ़्रेम, किनारे पर उनकी उँगली का तेल जमा था।
"ये उन्होंने गिराया नहीं," बंसी ने मेरे कंधे के ऊपर से देखकर कहा। "ये गिरा है। ज़ोर से।"
"क्यों?"
"क्योंकि किसी ने उनका हाथ पकड़ा होगा।"
मैंने चश्मा जेब में डाला और जेब में हाथ डालते ही टोकन की गरमी उँगलियों से टकराई। गरमी अभी भी थी — भवानी की बात के बाद से लगातार।
"जज साहब आए?" मैंने रामू से पूछा।
"हाँ, दस मिनट पहले। पर उन्होंने सुनवाई शुरू नहीं की। उन्होंने भवानी साहब को अंदर बुलाया — अकेले।"
"अकेले?"
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