The Token System – Chapter 944
"ये पाँचवाँ नहीं है," उसने कहा। "ये चौथे का आख़िरी हिस्सा है। तुम्हारे पास चार टुकड़े हैं, पर वो टूटे हुए थे। इन्हें जोड़ने के लिए एक ही चीज़ चाहिए थी — वो चीज़ जो सबको एक साथ रखे।"
"वो क्या है?"
"चाबी," उसने कहा। "और चाबी उसके पास है जो सबसे मासूम है।"
"छोटू के पास नहीं है!"
"मैंने छोटू नहीं कहा।" बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने कहा — जो सबसे मासूम है।"
वो रुका। फिर उसने अपनी आँखें मेरी तरफ़ उठाईं।
"तुम्हारी माँ के पास।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"कमला?" मैंने कहा।
"कमला के पास नहीं," बूढ़े ने कहा। "कमला के हाथ में।"
और तभी हवेली के आँगन में एक औरत की आवाज़ आई। कमला की आवाज़।
"मन्नू!"
मैं भागकर आँगन में आया। कमला गेट पर खड़ी थी। उसके हाथ में एक छोटी सफ़ेद पोटली थी जिसे वो सीने से लगाए हुए थी।
"माँ?" मैंने कहा।
"तूने कभी मुझसे नहीं पूछा," कमला ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तूने कभी नहीं पूछा कि तेरे पापा ने जाते वक़्त मुझे क्या दिया था।"
"माँ—"
"वो चाबी नहीं थी," उसने कहा। "वो सिक्का था। तीसरा सिक्का। तेरे पापा ने कहा था — जिस दिन सब सिक्के मिलेंगे, उस दिन तू इसे खोलना।"
उसने पोटली खोली। अंदर एक छोटा पीतल का सिक्का था — सपाट, बिना लकीर का। पर जब मैंने अपने टोकन के पास लाया, तो वो चमक उठा और मेरे टोकन पर एक नई लकीर उभरी।
और टोकन पर एक शब्द आया —
पूरा।
वही बूढ़ा पीछे से बोला। "अब पाँचों टुकड़े एक जगह हैं। और चाबी?" उसने मेरी तरफ़ देखा। "चाबी काग़ज़ की नहीं थी। चाबी यही सिक्के थे। हर सिक्का दरवाज़े का एक हिस्सा खोलता है। तीन सिक्के, पाँच टुकड़े — और दरवाज़ा खुल जाता है।"
कमला ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर होंठ सख़्त थे।
"मन्नू," उसने कहा। "मैंने ये सिक्का बीस साल छिपाया। तेरे पापा ने कहा था — जब तक तेरा हिसाब पूरा न हो, इसे मत खोलना। आज तेरा हिसाब पूरा हो रहा है।"
उसने सिक्का मेरे हाथ में रखा।
मैंने घड़ी देखी। तीन बजकर अट्ठावन मिनट।
"दो मिनट," राजेंद्र ने कहा।
मैंने सिक्के हवा में उठाए। भवानी गेट पर खड़ा था। कौशल्या सीढ़ियों के पास। जज साहब अपनी गाड़ी से उतर रहे थे।
और मैंने तीनों सिक्के दरवाज़े के सामने लगे पत्थर के तीन गड्ढों में रखे।
दरवाज़ा हिला। एक बार। दो बार।
फिर खुल गया।
अंदर अंधेरा था — घुप्प, सीलन भरा, बीस साल पुराना अंधेरा। और उस अंधेरे में जो पहली चीज़ दिखी, वो एक चौकी थी जिस पर एक डायरी रखी थी।
और डायरी के ऊपर, एक छोटी सी लकड़ी का डिब्बा।
मैंने डिब्बा उठाया। खोला। अंदर एक पर्ची थी, जिस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी —
"चाबी उसके पास है जो सबसे मासूम है। — कौशल्या।"
"ये तो वही पर्ची है," मैंने कहा। "जो रिकॉर्ड कमरे की दराज़ में थी।"
"नहीं," कौशल्या ने पीछे से कहा। "वो मेरी लिखी थी। और मैंने वो पर्ची दो जगह रखी थी। एक रिकॉर्ड कमरे में, एक यहाँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं चाहती थी कि जो भी पहले पहुँचे, वो ये पढ़े और रुके। और सोचे कि मासूम कौन है।"
मैंने पर्ची पलटी। पीछे कुछ लिखा था —
"सबसे मासूम वो है जो चाबी के बारे में कुछ नहीं जानता।"
"मतलब छोटू," मैंने कहा।
"नहीं," कौशल्या ने कहा। "मतलब तू।"
"मैं?"
"तू चाबी के बारे में कुछ नहीं जानता था। तू सिर्फ़ टोकन जानता था। तेरी माँ ने सिक्का छिपाया, तूने कभी नहीं पूछा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू सबसे मासूम था। इसलिए चाबी तेरे पास थी। तेरे पास — तेरे टोकन में।"
मैंने अपना टोकन निकाला। वो गरम था, पर पहले से हल्का लग रहा था। उस पर एक नई लकीर थी — सोलहवीं।
और उस पर एक शब्द उभरा —
"खुला।"
तभी बाहर से गाड़ी की आवाज़ आई। तेज़। कोई भाग रहा था।
राजेंद्र दौड़कर बाहर गया। मैं भी पीछे गया।
गली के मोड़ पर एक सफ़ेद गाड़ी भाग रही थी। पर उसकी खिड़की से किसी ने कुछ फेंका — एक पीला लिफ़ाफ़ा, जो हवा में लहराकर आँगन में गिरा।
राजेंद्र ने उठाया। खोला।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"क्या है?" मैंने पूछा।
उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
उस पर लिखा था —
"अगर ये कमरा खुल गया, तो सोहन का इलाज बंद। और शालिनी के भाई का भी। — तीसरा।"
मेरी जेब में टोकन फिर हिला।
मैंने निकाला। उस पर नई लाइन उभरी थी —
"अब जो बचा है, वो मासूम नहीं। वो तेरा है।"
और उसी वक़्त अंदर से कमला की चीख़ आई।
"मन्नू!"
मैं भागा। भीतर, भीतरी कमरे के फ़र्श पर, एक पुरानी डायरी खुली पड़ी थी। और उसके पन्नों से एक फोटो फिसलकर नीचे गिरी थी।
मैंने उठाई। पुरानी, धुँधली तस्वीर। उसमें तीन आदमी थे — दादा सुखदेव, एक जवान आदमी, और तीसरा… तीसरा कोई और था।
और तस्वीर के पीछे, कमला की लिखाई में, टेढ़े अक्षरों में लिखा था —
"जो बचा है, वो तेरा है — तेरा बाप। किशन। ज़िंदा।"
॥
मैंने वो तस्वीर कमला के हाथ से छीनकर अपनी जेब में डाली और सीधा बाहर भागा।
"मन्नू!" बंसी मेरे पीछे भागा। "कहाँ?"
"छोटू का पता लगाना है। अभी।"
राजेंद्र गाड़ी से उतर चुका था। मैंने दौड़ते-दौड़ते उसे पकड़ा।
"छोटू हवेली में नहीं है। बसंती ने उसे भवानी के आदमियों से छुड़ाया था, पर वो जगह क्या थी?"
राजेंद्र का चेहरा कड़ा हुआ। "भवानी के होम के पीछे वाला कमरा। पर वहाँ तो…"
"तो नहीं। वहाँ कुछ और हुआ है।" मैंने मोबाइल निकाला। सुमन का नंबर दबाया।
एक घंटी। दो। तीन।
"हाँ?" सुमन की आवाज़ में थकान थी।
"छोटू कहाँ है?"
"मैंने उसे हवेली भेज दिया था। बसंती के साथ। क्यों?"
"क्योंकि अभी हमें हवेली से लिफ़ाफ़ा मिला है और छोटू का फ़ोन बंद है।" मैंने राजेंद्र को देखा। "तुम सीधे हवेली चलो। मैं सुमन को लेकर आता हूँ।"
"मैं साथ चलता हूँ," राजेंद्र ने कहा।
"नहीं। तुम सीधे जाओ। अगर श्यामलाल वहाँ है, तो उसे पहले तुम्हारी वर्दी दिखनी चाहिए।"
राजेंद्र ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर सिर हिलाया और गाड़ी में बैठ गया।
मैं बंसी के साथ अस्पताल की तरफ़ भागा। रास्ते में मेरा फ़ोन फिर बजा।
सुमन।
"मन्नू — श्यामलाल जेल से भाग गया है। अभी ख़बर आई।"
मेरे पैर एक पल के लिए रुके।
"हवेली," मैंने कहा। "वो हवेली जा रहा है, छोटू के पास।"
"मैं निकल रही हूँ। तुम मुझे रास्ते में मिल जाओ, उस तरफ़ से आ रही हूँ जिधर से होम जाता है।"
"तेज़।"
बंसी मेरे साथ भाग रहा था। उसकी साँस फूल रही थी, पर वो रुका नहीं।
"मन्नू," उसने कहा, "अगर श्यामलाल के पास चाबी है तो वो भीतरी कमरा खोल सकता है।"
"नहीं।" मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन हल्का गरम था। "भीतरी कमरा खुल चुका है। पर उसके अंदर जो है, वो बाहर आने की देर है।"
हवेली की गली में मोड़ लिया। सामने सुमन की गाड़ी रुकी।
वो उतरी। सफ़ेद कोट नहीं, सादा कुर्ता। हाथ में एक छोटा बैग।
"कहाँ?" उसने पूछा।
"आँगन।"
हम तीनों साथ चले।
हवेली का गेट खुला था। आँगन में दोपहर की सीधी धूप पड़ी थी। और आँगन के बीच, एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर, छोटू बैठा था।
उसकी आँखें लाल थीं। गाल पर मिट्टी थी। पर वो रो नहीं रहा था।
और उसके पीछे खड़ा था — श्यामलाल।
उसका कुर्ता फटा था, बाल बिखरे हुए, और हाथ में एक मोटी पीतल की चाबी।
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