The Token System – Chapter 945
"एक कदम भी आगे," श्यामलाल ने कहा, "और ये बच्चा इसी कुर्सी पर बैठा रहेगा। हमेशा के लिए।"
मैं रुक गया।
बंसी ने मेरी कलाई पकड़ी। सुमन ने मेरी दूसरी तरफ़ देखा।
"मेरी बात सुनो," सुमन ने आवाज़ उठाई, "मैं डॉक्टर हूँ। ये बच्चा कल ही बचा है। अगर इसे कुछ हुआ तो तुम्हारे ख़िलाफ़ सिर्फ़ एक शब्द चलेगा — बच्चे पर हाथ। कितने साल लगेंगे, जानते हो?"
श्यामलाल की आँखें एक पल के लिए हिलीं।
"और वो चाबी," सुमन आगे बढ़ी, "उससे तुम्हें क्या मिलेगा? भीतरी कमरा तो खुल चुका है। तुम्हारी चाबी अब सिर्फ़ पीतल है।"
श्यामलाल ने चाबी अपनी तरफ़ खींच ली।
"भीतरी कमरा नहीं।" उसकी आवाज़ फटी थी। "ये उस तिजोरी की चाबी है जो उस कमरे के भीतर है।"
वो एक पल के लिए सुमन की तरफ़ देखने लगा।
बसी एक पल।
बंसी पीछे से निकला। उसने श्यामलाल का हाथ पकड़ा और ऐंठ दिया।
श्यामलाल चीख़ा। चाबी हवा में गई और राजेंद्र ने — जो गेट के पीछे खड़ा था — उसे लपक लिया।
श्यामलाल ने भागने के लिए घूमा, पर पीछे दो सिपाही पहले से खड़े थे। उसने एक को धक्का दिया, दूसरे ने उसकी बाँह पकड़ी और उसे ज़मीन पर गिरा दिया।
मैं सीधा छोटू के पास पहुँचा।
वो कुर्सी से उतरा और मेरे सीने से लिपट गया।
उसका शरीर काँप रहा था, पर आवाज़ साफ़ थी।
"मुझे डर नहीं लगा," उसने कहा।
"झूठ।"
"थोड़ा।" उसने अपनी नाक मेरी शर्ट में दबाई। "पर तुम आ गए ना।"
"तूने हिम्मत कैसे की?"
उसने सिर उठाया। "मैंने तो कुछ नहीं किया। वो मुझे यहाँ लाया और बैठा दिया। फिर मैंने देखा — उसकी जेब से कुछ निकल रहा था।"
"क्या?"
"एक काग़ज़। चाबी के साथ।" छोटू ने श्यामलाल की तरफ़ देखा। "जब उसने मुझे पकड़ा, तो वो काग़ज़ उसकी जेब से बाहर आ गया। मैंने देख लिया।"
मैं श्यामलाल के पास गया। वो ज़मीन पर बैठा था, हाथ पीछे बँधे।
"काग़ज़?" मैंने कहा।
उसने मुँह फेर लिया।
राजेंद्र ने उसकी जेब से एक मुड़ा पीला काग़ज़ निकाला और मुझे दिया।
मैंने खोला।
आधा फटा, पुराना, पीली स्याही से लिखा —
"भीतरी कमरे की दीवार पर जो नाम लिखा है, वो इस हवेली का असली मालिक है।"
मैंने काग़ज़ पलटा। पीछे सिर्फ़ एक तारीख़ थी। बीस साल पुरानी।
"ये किसका है?" मैंने श्यामलाल से पूछा।
वो चुप रहा।
"ये किसका है?" यह बार राजेंद्र ने पूछा।
"कौशल्या का," श्यामलाल ने धीरे से कहा। "उसने लिखा था। उस रात। और मुझे दिया — कहा कि जिस दिन कमरा खुले, उस दिन ये उस आदमी को देना जो सबसे पहले अंदर जाए।"
"तो तू अंदर जाने वाला था?"
"मैं चाबी लेने आया था।" उसने सिर उठाया। "पर चाबी तो तुम लोगों ने सिक्कों से खोल दिया। मेरे पास सिर्फ़ ये बची थी — तिजोरी की।"
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया।
"सबको साथ ले चलो," मैंने कहा। "भीतरी कमरे के दरवाज़े तक।"
बंसी ने श्यामलाल को उठाया। सुमन छोटू का हाथ पकड़कर चली। राजेंद्र आगे-आगे।
हम भीतरी कमरे के दरवाज़े तक पहुँचे।
दरवाज़ा खुला था — वही दरवाज़ा जिसने दोपहर में तीन सिक्कों से रास्ता दिया था। अंदर अंधेरा था, बस एक कोने से पतली रोशनी आ रही थी।
मैंने राजेंद्र से चाबी ली। मोटी पीतल की चाबी — जिसके दाँत घिसे हुए थे, जैसे बहुत पुरानी हो।
"अंदर तिजोरी है?" मैंने पूछा।
"बाईं दीवार पर," श्यामलाल ने कहा। "ईंट के पीछे।"
मैं अंदर गया।
सुमन ने बाहर से कहा, "मैं साथ आती हूँ।"
"नहीं।" मैंने पीछे देखा। "अगर अंदर कुछ है तो पहले मैं देखूँ।"
अंदर की हवा भारी थी — बीस साल की बंद हवा। मेरे जूतों के नीचे फ़र्श पर कुछ चटका।
मैं रुका। झुका।
फ़र्श पर पुरानी पर्चियाँ बिखरी थीं — सैकड़ों। हर एक पर एक नाम और एक तारीख़।
मैंने एक उठाई।
"सोहन — भेजा गया।"
दूसरी।
"शकुंतला देवी — भेजी गई।"
तीसरी।
"किशनचंद — भेजा गया।"
मेरा हाथ रुक गया।
पापा का नाम।
मैंने वो पर्ची जेब में रखी और बाईं दीवार की तरफ़ बढ़ा।
वहाँ एक ईंट बाकी से अलग रंग की थी। मैंने उसे खींचा। वो हिली।
उसके पीछे एक छोटी तिजोरी थी — काली, ज़ंग लगी, बिना ताले की।
मैंने उसे खोला।
अंदर सिर्फ़ एक चीज़ थी।
एक मोटी पीली डायरी।
मैंने उठाई। पहला पन्ना खोला।
उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था —
"हिसाब — जो अब तक किसी काग़ज़ पर नहीं आया।"
और उसके नीचे, छोटी लिखाई में —
"जो इसे पढ़े, वो इसका मालिक नहीं, रखवाला है।"
मैंने डायरी बंद की।
तभी मेरी नज़र सीधी दीवार पर पड़ी।
और मैं जम गया।
दीवार पर, उजले चूने से, बड़े-बड़े अक्षरों में एक नाम लिखा था —
मनोहर।
मैंने पीछे हटकर देखा। अक्षर पुराने थे, चूना जगह-जगह से उखड़ रहा था। नीचे एक लाइन और थी, छोटी लिखाई में, पर साफ़ —
"जो इस हवेली का असली मालिक है।"
मैं दरवाज़े की तरफ़ पलटा। बाहर सब खड़े थे — बंसी, सुमन, राजेंद्र, छोटू, श्यामलाल।
"क्या हुआ?" बंसी ने पूछा।
मैं बाहर आया। दरवाज़े की चौखट पर हाथ रखा।
"ये तो मेरा नाम है," मैंने कहा। "पर ये मैंने कभी नहीं लिखा।"
राजेंड्र ने अंदर झाँका।
"बीस साल पुराना चूना है," उसने कहा। "तू अभी अट्ठाईस का है।"
"तो किसी ने मेरा नाम मेरे पैदा होने से पहले लिख दिया?"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो भाव था जो डॉक्टर के चेहरे पर तब आता है जब वो किसी ऐसी चीज़ को देख रहा हो जो उसकी किताबों में नहीं है।
"मन्नू," उसने कहा, "तेरे पापा का नाम क्या था?"
"किशन।"
"और तेरी माँ?"
"कमला।"
"और तेरे दादा?"
मैंने एक पल सोचा। "सुखदेव।"
सुमन ने दीवार की तरफ़ देखा। फिर श्यामलाल की तरफ़।
"श्यामलाल," उसने कहा, "तूने ये नाम देखा था? पहले?"
श्यामलाल ने धीरे से सिर हिलाया। "बीस साल पहले। जब मैंने ये कमरा खोला था। उस रात।"
"और तूने किसी को बताया नहीं?"
"मैंने सोचा ये किसी और का नाम है। कोई पुराना मालिक।" उसकी आवाज़ धीमी थी। "आज पता चला ये इसी का है।"
मैं दीवार के सामने खड़ा था।
मेरे नाम के नीचे, ठीक मेरे कंधे की ऊँचाई पर, एक और लाइन थी — छोटी, फीकी, मिटती हुई।
मैंने उँगली से चूना हटाकर उसे पढ़ा।
"जो आएगा, वो नाम नहीं, हिसाब पूरा करेगा।"
मैंने पीछे मुड़कर सबको देखा।
"मुझे लगता है," मैंने कहा, "कि ये हवेली मेरी नहीं है। ये हवेली का हिसाब मेरे नाम पर रखा गया है।"
"उसने कहा था," बंसी ने धीरे से कहा।
"कौन?"
"पहरा। कल रात। कुएँ पर।" बंसी ने अपना सिर खुजाया। "उसने कहा था — 'जो काग़ज़ पर लिखा है, वो नाम नहीं, हिसाब है। नाम तो हिसाब बराबर होने पर उभरता है।'"
मैंने जेब से टोकन निकाला।
वो अब गरम था।
उस पर सोलह लकीरें थीं, और सत्रहवीं उभर रही थी — धीरे-धीरे, पीतल के अंदर से।
और उसके नीचे लिखा था —
"सत्रह — वो जो तेरा नाम जानता है।"
मैंने टोकन जेब में वापस रखा।
"राजेंद्र," मैंने कहा, "इस कमरे को सील करो। अंदर की हर पर्ची, हर काग़ज़ — अदालत जाएगा।"
"और ये?" उसने श्यामलाल की तरफ़ इशारा किया।
"वो पहले से हिरासत में है। पर अब…" मैंने श्यामलाल की तरफ़ देखा, "उससे पूछना है — कौशल्या ने उसे कौन सा आदमी बताया था? किसे देना था ये काग़ज़?"
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