The Token System – Chapter 943
बंसी मेरे पीछे था। मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया — रुकने का इशारा। फिर मैं आगे बढ़ा। मेरी जेब में टोकन गरम हो रहा था।
अचानक हवेली के भीतर से आवाज़ आई — भारी लकड़ी के दरवाज़े की आवाज़, जैसे कोई बड़ी चीज़ खुल रही हो। मोटा आदमी सहम गया और उसने पीछे देखा।
उसी पल बंसी दौड़ा। उसने मोटे की टाँग पकड़ी और दोनों ज़मीन पर गिरे। लंबा छोटू को खींचकर पीछे ले गया, पर छोटू ने अपनी पूरी ताकत से उसके हाथ को काटा और आज़ाद होकर मेरी तरफ़ भागा।
मैंने उसे अपनी बाँहों में लिया।
"भैया—" वो रो रहा था।
"कुछ नहीं हुआ," मैंने कहा। "कुछ नहीं हुआ।"
लंबा दौड़कर भीतर गया। बंसी ने मोटे को उठाकर दबाया।
"भागो मत," बंसी ने कहा। "पुलिस सामने खड़ी है।"
हवेली का भीतरी दरवाज़ा पहले से खुला था। अंदर से लालटेन की रोशनी आ रही थी। मैंने छोटू को बंसी के पास खड़ा किया और भीतर की तरफ़ गया।
सीढ़ियों के नीचे, उस छोटे कमरे के दरवाज़े पर, जहाँ मुझे बीरा देवी मिली थीं — वहाँ एक आदमी खड़ा था। उसके हाथ में छोटी लालटेन थी और चेहरा अंधेरे में।
"तुम देर से आए," उसने कहा। आवाज़ परिचित थी, पर मैं पहचान नहीं पाया।
"कौन हो?"
वो आगे आया। रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी।
राहुल।
"तुम?" मैंने कहा। "तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
"वही जो मैंने अदालत में कहा था।" उसने लालटेन नीचे रखी। "बीरा देवी ने मुझे भेजा है। उन्हें पता चला कि भवानी के आदमी छोटू को ले गए हैं। वो डर गईं कि अगर बच्चे को कुछ हुआ, तो हिसाब फिर टल जाएगा।"
"और तुमने मुझे फ़ोन नहीं किया?"
"मैंने सोचा, पहले बच्चे को बचा लूँ, फिर बताऊँ।" उसने अपनी जेब से एक छोटी पीतल की डिबिया निकाली। "पर ये रखो। ये चाबी नहीं है। ये उस दरवाज़े का दूसरा हिस्सा है — जो बीरा के पास बीस साल से बंद था।"
मैंने डिबिया ली।
"चाबी कहाँ है?" मैंने पूछा।
"यही तो सवाल है," राहुल ने कहा। "भवानी के आदमियों ने छोटू को इसलिए पकड़ा कि उन्हें लगा चाबी उसके पास है। पर उन्हें किसने बताया?"
"किसी ने बताया होगा।"
"हाँ। और वो कोई ऐसा है जो छोटू के बारे में जानता है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, चाबी उसके पास है जो सबसे मासूम है — ये पर्ची किसने लिखी?"
"मुझे नहीं पता।"
"तो जान लो। क्योंकि जिसने ये पर्ची लिखी है, वो चाबी छिपाने वाला भी है। और वो चाहता है कि हम छोटू के पीछे भागें, जबकि असली चीज़ कहीं और हो।"
बाहर से राजेंद्र की आवाज़ आई। "मन्नू! अंदर?"
"हाँ!" मैंने कहा।
राजेंद्र भीतर आया। उसके पीछे बसंती थी, जो दौड़कर आई और छोटू के पास गई।
"भवानी के आदमी पकड़े गए," राजेंद्र ने कहा। "दोनों। पर उन्होंने कुछ बताया नहीं। बस यही कह रहे हैं कि उन्हें फ़ोन पर हुक्म मिला था।"
"किसका फ़ोन?"
"वो नहीं बता रहे।" राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। "पर एक बात और — दरवाज़े पर चार बजे की मुहर लगी है। जज साहब का हुक्म है। अभी तीन बजकर पैंतालीस मिनट हुए हैं।"
मैंने छोटू की तरफ़ देखा। वो बसंती के साथ बैठा था, पर अब भी काँप रहा था। मैंने अपनी जेब से टोकन निकाला।
वो ठंडा था।
पर उस पर एक शब्द उभरा था —
इंतज़ार।
मैं हवेली के बाहर आया। सामने की तरफ़ से गाड़ी की रोशनी आ रही थी। दो गाड़ियाँ। एक जज साहब की, एक भवानी की।
भवानी गाड़ी से उतरा। उसके पीछे उसका वकील और दो आदमी थे। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर घड़ी की तरफ़ देखा, फिर हवेली के गेट की तरफ़।
वो मेरे पास आया।
"चार बजने वाले हैं," उसने कहा। "और तुम्हारे पास चाबी नहीं है।"
"तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि मैंने तुम्हारी आँखें देखी हैं।" उसने मुस्कुराने की कोशिश की, पर मुस्कुराहट आधी रह गई। "मन्नू, अगर दरवाज़ा आज नहीं खुला, तो कल जज साहब ये मान लेंगे कि मेरा दावा सच है। हवेली मेरी हो जाएगी।"
"और अगर खुल गया?"
"तो जो काग़ज़ अंदर हैं, वो मेरे बाप के ख़िलाफ़ जाएंगे।" उसने कंधे उठाए। "मैं जानता हूँ। मैं बीस साल से जानता हूँ।"
"तो तुम चाहते हो कि दरवाज़ा न खुले?"
"मैं चाहता हूँ कि जो सच है, वो सबके सामने हो।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने तुम्हें अस्पताल भेजा था। चाबी ढूँढने। मिली?"
"नहीं।"
"तो तुमने झूठ नहीं बोला।" उसने धीरे से कहा। "मैंने भी नहीं छिपाई। मतलब चाबी किसी तीसरे के पास है। और वो तीसरा आज हवेली में आने वाला है।"
"कौन?"
वो पीछे मुड़ा। उसकी गाड़ी की तरफ़ देखा। "पता नहीं। पर मुझे एक बात याद है — जब मैंने दस साल पहले वो दरवाज़ा खोला था, दरवाज़े पर एक पर्ची चिपकी थी।"
"क्या लिखा था?"
"मैंने पढ़ा नहीं था। मैंने फाड़ दी थी।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर वो पर्ची इसी हाथ की लिखाई में थी जो आज अदालत में कमला ने दी थी।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"कमला?" मैंने कहा। "मेरी माँ?"
"मुझे उस वक़्त नहीं पता था। पर आज जब कमला ने अपनी चिट्ठी पढ़ी, मुझे लिखाई याद आ गई।" उसने अपनी जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला। "ये वो पर्ची है। मैंने फाड़कर जेब में रख ली थी। आज तक रखी है।"
मैंने पर्ची खोली। फटी हुई थी, पर लिखाई साफ़ थी —
"जो इसे खोले, वो खाता बंद न करे। — कौशल्या।"
"कौशल्या?" मैंने कहा।
"जब मैंने ये पढ़ी, तब मुझे लगा कौशल्या एक औरत का नाम है।" भवानी ने कहा। "पर आज अदालत में तुम्हारी माँ ने अपनी चिट्ठी पेश की — और उसका आख़िरी पन्ना भी इसी हाथ का था।"
मैंने काग़ज़ को गौर से देखा।
"मेरी माँ का नाम कमला है," मैंने कहा। "कौशल्या नहीं।"
"तो फिर कौशल्या कौन है?" भवानी ने पूछा। "और वो क्यों चाहती थी कि खाता बंद न हो?"
तभी हवेली के अंदर से आवाज़ आई। राजेंद्र की।
"मन्नू! आ जाओ!"
मैं दौड़ा। भीतर, भीतरी कमरे के दरवाज़े पर, एक औरत खड़ी थी। सफ़ेद साड़ी। बाल पीछे बँधे। हाथ में छोटी लालटेन।
कौशल्या।
"तुम?" मैंने कहा।
"मैंने तुम्हें काग़ज़ दिया था," उसने कहा। "काली बस्ती के मोड़ पर। याद है?"
"तुम माँ की बहन हो।"
"हाँ," उसने कहा। "और ये भी सच है कि मैंने तुम्हें वो काग़ज़ दिया। पर वो काग़ज़ किसी और ने मुझे दिया था।"
"किसने?"
"इसने।" उसने अपनी लालटेन उठाई और सीढ़ियों के ऊपर इशारा किया।
सीढ़ियों के ऊपर, एक आकृति खड़ी थी। सफ़ेद दाढ़ी। हाथ में लाठी, जिसके हैंडल पर टोकन जैसा निशान।
पहरा।
"तुम?" मैंने कहा।
"ना," बूढ़े ने कहा। वो सीढ़ियाँ उतरने लगा, धीरे-धीरे, एक-एक कदम। "मैं ही हूँ। पर मैं वो नहीं जो तुम सोच रहे हो।"
"तो कौन हो?"
वो नीचे आया। उसने अपनी लाठी टिकाई और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें धँसी हुई थीं, पर साफ़ थीं।
"मैं वो आदमी हूँ," उसने कहा, "जिसने तुम्हारे दादा को टोकन दिया था। नहीं — माफ़ करना। मैंने नहीं दिया। मैं वो आदमी हूँ जिसने टोकन बनाया था। चालीस साल पहले। हवेली के पीछे, उसी कुएँ के पास।"
कौशल्या ने मेरी तरफ़ देखा। "इसने ही मुझे वो काग़ज़ दिया था। और इसने ही मुझसे कहा था कि तुम्हें देना।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मैं वो हूँ," बूढ़े ने कहा, "जो चारों टुकड़ों को जोड़ सकता है।"
उसने अपनी लाठी का हैंडल खोला। अंदर से एक आख़िरी पीतल का टुकड़ा निकाला।
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