The Token System – Chapter 939
जगन्नाथ का मकान पीछे से देखने में बड़ा नहीं लगा। आगे की तरफ़ आलीशान दरवाज़ा, पीछे की तरफ़ पीली दीवार, ऊपर लोहे का किवाड़, और दीवार के साथ एक टूटी नाली। नाली के ऊपर कुंडी थी — बाहर से, चौड़ी, मोटी।
“देख,” छोटू ने फुसफुसाया। बारह बजने में दस मिनट थे। मुंशी का बेटा पहरा छोड़कर अंदर गया, और हमने दरवाज़े के पास पत्थर पर पैर रखा।
फिर दरवाज़े के अंदर से आवाज़ आई — किसी के रोने की, फिर कुछ टूटने की। मैंने छोटू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद हो गया।
“कोई अंदर है,” उसने कहा।
“तू पीछे रह।”
मैंने कुंडी पकड़ी और ज़ोर लगाया। वो घूमी नहीं। टोकन ने कहा था — कुंडी अंदर से नहीं। मतलब बाहर से कुछ फँसा है। मैंने झुककर देखा। कुंडी के छेद में लोहे का मोटा तार घुसा था, मरोड़ा हुआ। किसी ने जल्दबाज़ी में बाहर से बंद किया था, अंदर जाने के बाद नहीं — बाहर से।
“छोटू, रस्सी दे।”
हमने रस्सी तार में फँसाई और दोनों ने एक साथ खींचा। तार चरमराया, फिर ढीला पड़ा। मैंने कुंडी उठाई। दरवाज़ा खुला।
अंदर आँगन में सामान बिखरा था। एक कुर्सी उलटी पड़ी थी। दीवार पर टँगी घड़ी रुकी हुई थी — ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर। ज़मीन पर काग़ज़ पड़े थे, फाड़े हुए। और आँगन के कोने में एक बूढ़ी औरत बैठी थी, घुटनों में सिर रखे, सिसक रही थी।
छोटू ने उसे देखा और उसका मुँह खुल गया। “ये तो… ये तो चाची की…”
वो औरत सिर उठाया। चेहरे पर डर था, होंठ काँप रहे थे।
“तुम कौन हो?” उसने फुसफुसाकर कहा।
“मैं मन्नू हूँ। अदालत से आया हूँ।” मैंने धीरे से कहा, “आप कौन हैं?”
वो औरत रो पड़ी। “मैं शांति हूँ। अमर की माँ।”
मेरे हाथ ठंडे हो गए। छोटू पीछे हट गया।
“जगन्नाथ कहाँ है?” मैंने पूछा।
“गया।” उसने आँगन की तरफ़ देखा। “सुबह जब टोकन की खबर फैली, तो वो पगला गया। काग़ज़ समेटने लगा। मैंने पूछा कहाँ जा रहे हो, तो बोला — बीरा ने सब बिगाड़ दिया। अब जो होगा, देखा जाएगा।” वो काँपी। “फिर उसने मुझे धकेल दिया और दरवाज़ा बाहर से बंद करके चला गया। मैंने चीखा, बहुत चीखी। कोई नहीं सुना।”
मैंने फटे काग़ज़ उठाए। ऊपर लिखा था — “हवेली नामांतरण, भवानी प्रसाद के नाम।” और नीचे, किसी नए हाथ से मोटे अक्षरों में — “जगन्नाथ लाल के हस्ताक्षर।” तारीख़ आज की।
“ये उसने आज लिखा?” मैंने शांति देवी की तरफ़ बढ़ाया।
“वो इसे अदालत में डालना चाहता था। कह रहा था — जब तक बीरा की जाँच पूरी हो, हवेली भवानी साहब के नाम कर दो। फिर कोई कुछ नहीं कर सकेगा।”
मैंने काग़ज़ मोड़े और कमर में खोंसा। “चलिए, आपको अदालत ले चलता हूँ।”
“नहीं।” उसने सिर हिलाया। “मैं अदालत नहीं जाऊँगी। मैंने चौदह साल इंतज़ार किया। मुझे अपने बेटे से मिलना है।”
“अमर कहीं और है?”
वो चुप रही। फिर बोली, “जगन्नाथ ने उसे भवानी के आदमियों के पास भेज दिया था। मुझे नहीं पता कहाँ।”
छोटू ने अचानक कहा, “भइया, बारह बज गए। पहरा वाला लौट आएगा।”
मैंने शांति देवी का हाथ पकड़ा। “आप मेरे साथ अदालत चलिए। आपकी गवाही से जगन्नाथ का खेल खत्म होगा। आपके बेटे को भी उसी अदालत से निकालेंगे।”
वो मेरी तरफ़ देखने लगी। उसकी आँखों में कुछ टूटा-टूटा था, पर फिर उसने होंठ कसे और खड़ी हो गई। “ठीक है। पर मैं ओढ़नी नहीं उतारूँगी जब तक जगन्नाथ का चेहरा न देख लूँ।”
हम बाहर निकले। पीछे के रास्ते से। छोटू आगे, मैं बीच में, शांति देवी पीछे। गली मुड़ी और सामने पहरा देने वाला मुंशी का बेटा खड़ा था, हाथ में लाठी।
“रुको!” उसने देखा। “तुम कौन हो? चाची, आप बाहर कैसे?”
छोटू ने तुरंत कहा, “चाची को अदालत से बुलाया है। तेरे चाचा की भी तलब है। तू भी चल, अदालत में तेरा नाम पुकारा जाएगा।”
पहरा देने वाला हिचका। अदालत का नाम सुनकर उसकी लाठी झुक गई।
“जगन्नाथ चाचा कहाँ हैं?” उसने पूछा।
“वो खुद भाग गया,” मैंने कहा। “अब तुझे बचाना है तो हमारे साथ चल।”
कुछ पल वो खड़ा रहा। फिर लाठी रख दी और पीछे-पीछे चलने लगा।
अदालत पहुँचते-पहुँचते मेरी कमीज़ पसीने से भीग गई थी। हॉल में वही भीड़ थी, पर अब किसी में बात करने का जोश नहीं था। लोग बैठे थे, आँखें दरवाज़े पर।
जज साहब लौट चुके थे। बीरा देवी की मेडिकल रिपोर्ट उनके सामने थी।
“अदालत,” जज साहब ने कहा, “बीरा देवी की जाँच रिपोर्ट पढ़ चुकी है। उनके शरीर पर पुराने ज़ंजीर के निशान मिले हैं। उम्र के हिसाब से उन्हें बंधक रखे जाने की पुष्टि होती है।”
भवानी के वकील ने खड़े होकर कहा, “हुज़ूर, फिर भी ये साबित नहीं होता कि हवेली का काग़ज़…”
“वकील साहब,” जज ने कहा, “अभी मैंने तुमसे कुछ पूछा नहीं।” और वो मेरी तरफ़ मुड़े। “तुम, युवक। तुम अभी कहाँ गए थे?”
“हुज़ूर, जगन्नाथ लाल के मकान।”
हॉल में फिर हलचल हुई।
“वो नहीं मिले,” मैंने कहा। “पर उनका किया हुआ मिला।” मैंने काग़ज़ जज साहब की मेज़ पर रखा। “ये आज सुबह के काग़ज़ हैं। हवेली भवानी प्रसाद के नाम करने की कोशिश। जगन्नाथ लाल के हस्ताक्षर के साथ।”
जज ने काग़ज़ उठाए। उन्होंने एक बार पढ़ा, फिर दोबारा। फिर भवानी की तरफ़ देखा।
भवानी की कुर्सी पर बैठा आदमी उठ खड़ा हुआ। “हुज़ूर, ये काग़ज़ मुझे नहीं मालूम…”
“बैठो,” जज ने कहा। उनकी आवाज़ सख्त थी। “अभी मैंने तुम्हें बोला नहीं।”
वो बैठ गया, पर उसके हाथ कुर्सी के हत्थों पर सफ़ेद पड़ गए थे।
“अब एक और गवाह।” जज साहब ने मेरी तरफ़ देखा। “कहो।”
मैंने शांति देवी को इशारा किया। वो आगे आई। सफ़ेद ओढ़नी, झुका चेहरा। हॉल में कोई नहीं जानता था कि ये कौन है।
“हुज़ूर,” मैंने कहा, “ये शांति देवी हैं। अमर की माँ। आठ साल से इन्हें मरा हुआ माना जा रहा था। ये ज़िंदा हैं और जगन्नाथ लाल के मकान में छिपी हुई थीं।”
राहुल कटघरे के पास खड़ा था। उसका मुँह खुला रह गया। “माँ?” वो फुसफुसाया। नहीं — वो शब्द अमर के लिए था। राहुल ने ऐसे देखा जैसे उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा काग़ज़ पढ़ लिया हो।
“जगन्नाथ लाल ने इन्हें बंधक रखा था,” मैंने कहा। “ताकि अमर आपके सामने कुछ न कह सके।”
जज साहब ने कलम उठाई और फाइल पर कुछ लिखा। फिर उन्होंने अपना सिर उठाकर पूरा हॉल देखा।
“अदालत जगन्नाथ लाल के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी का वारंट जारी करती है। उन्हें कहीं भी हो, ढूँढा जाए। और भवानी प्रसाद…”
वो रुके। हॉल में साँसें थम गईं।
पीछे दरवाज़ा खुला।
व्हीलचेयर अंदर आई। पहिए चरमराए। धक्का देने वाला आदमी व्हीलचेयर के पीछे खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद दाढ़ी। पर वो कोई नौकर नहीं था। वो खुद व्हीलचेयर पर बैठा हुआ… नहीं, वो चल रहा था, अपने पैरों से, एक हाथ व्हीलचेयर पर रखे।
मैंने उसे देखा और मेरा कलेजा हिल गया। वो पापा थे। पापा किशन। उनका चेहरा पीला था, पर आँखें वैसी ही — सीधी, बिना डर के। उनके पीछे एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। सिर पर सफ़ेद ओढ़नी।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया — जैसे कह रहे हों, बेटा, अब मैं आ गया।
और फिर उस बूढ़ी औरत ने अपनी ओढ़नी उतार दी।
नीचे एक चेहरा था जिसे मैंने सिर्फ़ फोटो में देखा था, दस साल पहले, पापा की मेज़ पर रखी एक घिसी हुई तस्वीर में।
हॉल में आवाज़ गूँजी — राधे की, काँपती हुई — “ये… ये कैसे…”
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