The Token System – Chapter 938
हॉल में साँस लेने की आवाज़ें अलग-अलग सुनाई देने लगीं। बीरा देवी ने पहली बार सिर उठाया। उन्होंने राहुल की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
जज साहब ने फ़ाइल पर हाथ रखा। “कहाँ है वो औरत?”
राहुल मेरी तरफ़ मुड़ा। मेरी जेब में टोकन ठंडा था। मैंने सिर हिलाया।
“हुज़ूर, वो अभी अदालत में ही हैं,” राहुल ने कहा।
और तभी सबने देखा। दाईं बेंच पर बैठी सफ़ेद साड़ी वाली औरत — जिसका नाम सभी ने अब तक बीरा देवी समझा था — वो उठी। पर वो बीरा नहीं थीं।
वो सफ़ेद ओढ़नी वाली औरत थीं, वही जिसने मुझे काली बस्ती से लौटते वक़्त काग़ज़ दिया था। बीरा की बहन।
मैंने जल्दी से राहुल की तरफ़ देखा। उसका चेहरा बदल गया।
“ये… ये तो…”
जज साहब ने कड़क आवाज़ में पूछा, “अदालत को बताओ, ये औरत कौन है?”
वो औरत अपनी जगह से बोली, आवाज़ साफ़ और ठंडी। “मैं कौशल्या हूँ। बीरा की बहन। बीरा यहाँ नहीं आई। वो नहीं आ सकती।”
“क्यों नहीं आ सकती?”
“क्योंकि जिस कमरे में वो है, उसका दरवाज़ा अब बंद है। किसी ने फिर कुंडी डाल दी।”
मेरे हाथ जेब में गए। टोकन अब गरम हो रहा था। मैंने बाहर निकाला — उस पर लिखा था — “दरवाज़ा। अब। वहीं।”
मुझे मेरी ड्यूटी याद आई। टोकन इशारा दे रहा था कि जगन्नाथ के मकान पर कुछ हो रहा है। पर मैं अदालत छोड़कर नहीं जा सकता था। राहुल को जाना पड़ेगा। पर राहुल अभी कटघरे में खड़ा था, और उसका बयान आधा ही हुआ था।
जज साहब ने कौशल्या से कहा, “तुम्हें पता है, इस मामले में तुम्हारा क्या रिश्ता है?”
“पता है, हुज़ूर। हवेली का चौथा हिस्सा मेरा नहीं, मेरी बहन का है। मैं सिर्फ़ सच बोलने आई हूँ। और सच ये है कि जगन्नाथ आज सुबह से ग़ायब है।”
हॉल में फिर सन्नाटा। जज साहब ने चपरासी को इशारा किया। चपरासी दौड़कर बाहर गया, और थोड़ी देर बाद लौटकर जज के कान में कुछ कहा।
जज साहब ने कुर्सी के हत्थे पर हाथ रखा। “जगन्नाथ लाल की कुर्सी ख़ाली है।”
वकील फिर उठा, इस बार वो चिल्लाया नहीं, काँप रहा था। “हुज़ूर, इसका मतलब ये है कि गवाही अधूरी है। सुनवाई टाली जाए।”
जज साहब ने उसे घूरा। “सुनवाई नहीं टलेगी। पर जगन्नाथ लाल को अदालत तलब करती है। अगर वो नहीं आए, तो उनके ख़िलाफ़ ग़ैरहाज़िरी का आदेश जाएगा।” फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े। “तुम, युवक। तुमने ये सब खड़ा किया है। तुम्हें पता है, अगर ये औरत झूठी निकली, तो क्या होगा?”
“पता है, हुज़ूर। पर मुझे ये भी पता है कि अगर बीरा देवी आज अदालत में नहीं आईं, तो कल आपके सामने एक और काग़ज़ आएगा — उनकी मौत का।”
हॉल में हलचल मच गई। बीरा देवी की बहन ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो कह रहा था — तुमने वो कह दिया जो मैं नहीं कह पा रही थी।
तभी दरवाज़े पर धक्का लगा। सबका ध्यान वहाँ गया।
व्हीलचेयर अंदर आई। पहिए धीरे-धीरे घूम रहे थे। पीछे धक्का दे रहे थे पापा — पर पापा नहीं। उनके पीछे एक बूढ़ा आदमी था, सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद दाढ़ी।
और व्हीलचेयर में बैठी थी एक औरत। सिर पर सफ़ेद ओढ़नी। चेहरा झुर्रियों से भरा। हाथ सूखे।
राहुल ने जल्दी से कुर्सी से उठकर कहा, “बीरा देवी!”
हॉल में जो बैठा था, वो उठ खड़ा हुआ। वकील भी उठ गया, फिर बैठ गया, फिर उठ गया — उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना है।
भवानी की कुर्सी पर बैठा आदमी — जो अब तक चुप था — उसने अपना सिर उठाया और पहली बार उसके चेहरे पर डर दिखा। असली डर।
बीरा देवी ने व्हीलचेयर से धीरे से कहा, आवाज़ सूखी पर साफ़, “हुज़ूर, मैं बीरा हूँ। चौदह साल की उम्र में मेरा नाम हवेली के काग़ज़ों पर लिखा गया था। और उस दिन से आज तक किसी ने मुझसे नहीं पूछा कि मैं ज़िंदा हूँ या नहीं।”
जज साहब ने चश्मा उतार दिया। उनका चेहरा बदल गया। “तुम्हें किसने बंद किया?”
“मेरे भाई ने। राधे ने।” उसने उँगली उठाई और राधे की तरफ़ इशारा किया।
राधे खड़ा हो गया। उसका चेहरा लाल था। “ये झूठ है! ये औरत… ये…”
“राधे,” बीरा देवी ने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था कि राधे की बोलती बंद हो गई। “तूने मुझे उस कमरे में बंद किया। दस साल। और तूने कहा था कि अगर मैं बाहर आई, तो तू मेरे बेटे को मरवा देगा।”
“वो… वो सब झूठ है। हुज़ूर, ये औरत पागल है।”
बीरा देवी ने अपनी कलाई उठाई। उस पर ज़ंजीर का निशान था, पुराना, सफ़ेद। “दस साल की ज़ंजीर का निशान झूठ नहीं बोलता।”
हॉल में कोई चुप नहीं था। सब फुसफुसा रहे थे। कौशल्या अपनी जगह से उठकर बीरा के पास गई और उसका हाथ पकड़ा। दो बहनें। एक व्हीलचेयर में, एक उसके पास खड़ी।
जज साहब ने अपनी घड़ी देखी। “अदालत अब इस मामले की सुनवाई दोपहर बाद तक स्थगित करती है। तब तक बीरा देवी की मेडिकल जाँच होगी, और जगन्नाथ लाल को तलब किया जाएगा।”
मैंने राहुल को खींचा। बाहर आकर मैंने कहा, “तुझे यहाँ रुकना पड़ेगा। मैं जगन्नाथ के मकान जा रहा हूँ। टोकन कह रहा है वहाँ कुछ हो रहा है।”
“अकेले मत जा,” राहुल ने कहा।
“मैं अकेला नहीं।” मैंने पीछे देखा — छोटू दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में पुरानी सीढ़ी की रस्सी पकड़े। “वो चलेगा।”
राहुल ने छोटू को देखा, फिर मुझे। “तू उसे लेकर जा रहा है?”
“वो मेरे साथ नहीं, मैं उसके साथ जा रहा हूँ,” मैंने कहा। “वो जगन्नाथ के मकान का रास्ता जानता है।”
और फिर मेरी जेब में टोकन फिर गरम हुआ। मैंने निकाला।
उस पर नई लाइन उभर रही थी, अक्षर दर अक्षर — “दरवाज़ा तोड़ो। जगन्नाथ नहीं है। कुंडी अंदर से नहीं।”
और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, जो पहली बार टोकन पर किसी इंसान के लिए उभरे थे — “बीरा का हिसाब अभी। बाकी कल।”
मैंने टोकन जेब में रखा और छोटू का हाथ पकड़कर सीढ़ियाँ उतरने लगा। पीछे से राहुल ने आवाज़ दी, “मन्नू, अगर जगन्नाथ भाग गया तो?”
“भागेगा नहीं,” मैंने पीछे मुड़े बिना कहा। “वो कुंडी खुद बंद नहीं करता। वो डर के मारे बैठा है, और डरा हुआ आदमी अपनी ही हवेली में फँसता है।”
छोटू जल्दी-जल्दी क़दम भर रहा था, सीढ़ी की रस्सी उसके कंधे पर बँधी झूल रही थी। नीचे गली में उतरकर उसने कहा, “भइया, जगन्नाथ चाचा के मकान का पिछला दरवाज़ा कुएँ की तरफ़ खुलता है। वहाँ एक मुंशी का बेटा पहरा देता है। राहुल भइया का जाना-पहचाना है?”
“नहीं, वो आज सुबह अदालत में आया था। उसे छुपकर आना था।” मैंने सड़क पार की। “तू बता, पहरा देने वाला कौन है और कितने बजे पाली बदलता है?”
“वो दोपहर में खाने जाता है। ठीक बारह बजे। उसके जाने के बाद कुंडी अंदर से बंद कर दी जाती है।”
मैंने आसमान देखा। ग्यारह बज चुके थे।
हमने रास्ता छोटा किया, पीछे के गलियारों से। छोटू आगे-आगे चल रहा था, मुझे रोक-रोककर बता रहा था — “यहाँ से नहीं, भइया, यहाँ नाली है। उस गली में बंदर बैठे हैं, वो चीखेंगे।”
“तू इतना कैसे जानता है?”
“मैं चार दिन यहीं घूमा हूँ। माँ को बोल दिया था कि सब्ज़ी मंडी में काम है।”
उसकी उम्र से बड़ी बात थी। मैंने कुछ नहीं कहा।
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