The Token System – Chapter 937
मेरी जेब में टोकन ने एक बार फिर हल्का-सा कंपन किया, जैसे किसी ने दूर से नाम पुकारा हो — बहुत धीरे, मेरे ही कान में।
"मनोहर।"
मैंने पलटकर देखा। छत सूनी थी।
पर नीचे आँगन की मटकी के पास एक परछाईं तेज़ी से गुज़री — और गायब हो गई।
मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा, तो आँगन में मटकी के पास कोई नहीं था। पर मिट्टी पर ताज़ा पैरों के निशान थे — छोटे, नंगे पैर, जैसे किसी बच्चे के हों। निशान मटकी से शुरू होकर पिछली दीवार की तरफ़ गए थे और वहीं ख़त्म हो गए, जहाँ दीवार से टेक लगाकर पुरानी सीढ़ी रखी थी।
मैंने सीढ़ी हटाई। नीचे ज़मीन पर एक काग़ज़ की पुड़िया पड़ी थी। खोली तो अंदर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी — "जो चाबी तेरे पास है, वो मेरी है। बीरा से पूछ मत। मुझसे पूछ।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। छत से कोई उतरा नहीं, गली का दरवाज़ा बंद था। फिर भी किसी ने अभी-अभी मेरे पैरों के नीचे ये रखा था।
सुबह छह बजे छोटू ने मुझे झकझोरा।
"भैया, उठो। बीरा दादी तैयार हैं। और बाहर एक आदमी खड़ा है — कह रहा है कि उसे तुमसे मिलना है।"
मैं दरवाज़े पर गया। एक लंबा दुबला आदमी खड़ा था, उमर पचास के आसपास, हाथ में लाठी, और गले में पुरानी घड़ी की ज़ंजीर। उसने मुझे देखकर सिर झुकाया।
"तुम मनोहर हो?"
"हाँ।"
"मैं रामलाल हूँ। जगन्नाथ चाचा का पुराना नौकर। उसी हवेली में रहता था जहाँ आज भवानी रहता है।" उसने चारों तरफ़ देखा, फिर धीरे से कहा, "कल रात कोई तुम्हारे आँगन में आया था। वो मैं था।"
मेरी जेब में टोकन ठंडा हुआ।
"तुमने पुड़िया रखी?"
"हाँ। क्योंकि मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता था, पर आमने-सामने नहीं। भवानी के आदमी हर जगह हैं।" उसने लाठी ज़मीन पर टिकाई। "वो चाबी जो तुम्हें मिली — उलटे चिह्न वाली — उसे मैंने ही बीरा देवी की अलमारी से निकाला था, दस साल पहले। और मैंने ही वो राधे के हाथ में दी थी।"
मैंने कदम पीछे किया।
"तुमने क्यों दी?"
"क्योंकि राधे ने कहा था कि वो चाबी से बीरा को कमरे से निकाल देगा। मैंने उस पर भरोसा किया।" उसकी आवाज़ सूख गई। "पर उसने चाबी को दरवाज़े में लगाया और बाहर से कुंडी डाल दी। मैं वहीं खड़ा था। मैंने अपनी आँखों से बीरा देवी को दरवाज़ा पीटते देखा। और मैं कुछ नहीं बोला — क्योंकि राधे ने कहा था कि अगर मैं बोला, तो मेरी बेटी का रिश्ता टूट जाएगा।"
वो मेरे सामने झुक गया।
"आज अदालत में मैं गवाही दूँगा। मैंने बीरा देवी को बंद होते देखा है। पर एक बात — अगर मैं बोलूँगा, तो भवानी मेरी बेटी को नहीं छोड़ेगा। इसलिए तुम्हें मेरी बेटी को पहले निकालना होगा। वो भवानी के घर में रसोई का काम करती है।"
छोटू पीछे से बोला, "भैया, मैं जाऊँगा। मैं उसे बहाने से बाहर बुला लाऊँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। नौ साल का था, पर आँखों में वो हिम्मत थी जो बड़ों में भी नहीं।
"तू अकेला नहीं जाएगा। साथ में राहुल जाएगा।"
रामलाल ने मेरा हाथ पकड़ा। "समय कम है। अदालत नौ बजे बैठेगी।"
अदालत का हॉल छोटा था, पर भीड़ ऐसी कि साँस लेने की जगह नहीं। मैं आगे की बेंच पर बैठा। बीरा देवी दाईं तरफ़, सफ़ेद साड़ी में, आँखें ज़मीन पर। राधे बाईं तरफ़, अंग्रेज़ी सूट में, वकील के साथ कुछ फुसफुसा रहा था। और सबसे पीछे, दरवाज़े के पास, एक आदमी खड़ा था — साधारण कुर्ता, हाथ पर पट्टी। राहुल।
न्यायाधीश के आने से पहले राधे ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। वो मुस्कान कह रही थी — तुम कुछ नहीं कर सकते।
तभी मेरी जेब में टोकन गरम हुआ। इतना गरम कि मैंने हाथ जेब पर रखा। पीछे मुड़कर देखा — राहुल ने मुझे आँख से इशारा किया, दरवाज़े की तरफ़। मैं उठा और बाहर गया।
गलियारे में राहुल ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ तेज़ थी।
"सुनो, अदालत के अंदर जाने से पहले एक बात।" उसने चारों तरफ़ देखा। "जो औरत मुझे भेज रही है — अमर की माँ — वो हवेली के भीतरी कमरे में बंद रही है दस साल। और उसने मुझे एक बात बार-बार कही है।"
वो रुका। मेरी साँस रुकी।
"वो कहती है — उस कमरे में दीवार पर तेरा नाम पहले से लिखा है। मनोहर। पूरा नाम। और वो नाम उसने नहीं लिखा। वो नाम लिखा था बीरा देवी ने — तेरे पैदा होने से बीस साल पहले।"
॥
राहुल की पकड़ मेरी कलाई पर तेज़ थी, पर उसकी आवाज़ धीमी।
“दीवार पर नाम लिखा है — ये सुनकर तू चुप क्यों खड़ा है?”
“क्योंकि मैं उस नाम की क़ीमत समझ रहा हूँ,” मैंने हाथ छुड़ाया। “बीस साल पहले लिखा नाम आज कटघरे में काम आएगा। चल।”
हम अंदर लौटे। हॉल में हवा भारी थी। बीरा देवी दाईं बेंच पर बैठी थीं, आँखें ज़मीन पर, हाथ गोद में। राधे बाईं तरफ़ अपने वकील के कान में कुछ कह रहा था और वकील सिर हिला रहा था।
जज साहब आए। सभी खड़े हुए। जज साहब ने फ़ाइल खोली और बोले, “कल की सुनवाई में जो काग़ज़ पेश हुए हैं, उनसे यह साफ़ है कि हवेली के हिस्से बँटे हैं। अब फ़ैसला सुनाया जाता है—”
मैं खड़ा हो गया।
“हुज़ूर, एक बात।”
पूरा हॉल मेरी तरफ़ घूमा। भवानी का वकील तुरंत उठा। “आपत्ति! फ़ैसला सुनाए जाने के वक़्त दख़ल देना नियम के ख़िलाफ़ है।”
जज साहब ने चश्मे के ऊपर से मुझे देखा। “युवक, तुम्हें पता है ये क्या कह रहे हैं?”
“पता है, हुज़ूर। और मुझे यह भी पता है कि अगर आपने आज फ़ैसला सुना दिया, तो एक ज़िंदा औरत का नाम काग़ज़ों से हमेशा के लिए मिट जाएगा।”
“कौन औरत?”
“अमर की माँ। बीरा देवी ज़िंदा हैं। और वो इसी शहर में हैं, हुज़ूर। ये आदमी उनके बारे में जानता है।” मैंने राहुल की तरफ़ इशारा किया।
राधे ने कुर्सी के हत्थे को इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उसकी उँगलियाँ सफ़ेद दिखने लगीं। पर वो बोला नहीं।
जज साहब ने फ़ाइल बंद की। “ठीक है। गवाह कटघरे में आए। पर याद रखना, झूठी गवाही की क़ीमत भी चुकानी पड़ती है।”
राहुल कटघरे तक गया। लाठी उसने किनारे रख दी। जज साहब ने उसकी तरफ़ देखा। “नाम?”
“राहुल। जगन्नाथ लाल के पुराने मुंशी का बेटा।”
भवानी का वकील फिर उठा। “हुज़ूर, इसका रिश्ता सीधा तौर पर पक्षकार से है। इसकी गवाही मान्य नहीं हो सकती।”
“मान्यता अदालत तय करेगी,” जज साहब ने कहा। “बोलो, राहुल।”
राहुल ने गला साफ़ किया। “हुज़ूर, मैं पिछले दस साल से जगन्नाथ लाल के मकान पर रहता हूँ। वहीं मैंने बीरा देवी को देखा है। वो वहाँ ऊपर की मंज़िल पर एक कमरे में रहती हैं। कोई उन्हें नहीं ढूँढ पाता क्योंकि वो कमरा पीछे की गली से भी बंद है।”
“ये औरत कौन है?”
“अमर की माँ, हुज़ूर। इन्हीं के नाम पर हवेली का चौथा हिस्सा है। और मैंने अपनी आँखों से देखा है कि भवानी के आदमी उन्हें ढूँढ रहे थे। दो दिन पहले भी दो आदमी जगन्नाथ लाल के मकान के पीछे आए थे। मैंने उन्हें सीढ़ी पर लौटा दिया, ये कहकर कि ऊपर तो कोई रहता ही नहीं।”
“झूठ!” वकील चिल्लाया। “हुज़ूर, ये सब कहानियाँ हैं।”
जज साहब ने वकील की तरफ़ उँगली उठाई। “एक और बार बीच में बोले, तो बाहर जाना पड़ेगा।” फिर राहुल की तरफ़। “तुम्हारे पास कोई सबूत है?”
राहुल ने हाथ पर पट्टी खोली। उलटा ज़ख़्म दिखा। “ये ज़ख़्म मैंने ख़ुद नहीं बनाया, हुज़ूर। ये मुझे बीरा देवी के बेटे की निशानी के तौर पर मिला था। मैं उनके लिए काम करता हूँ। और आज सुबह मैं उनसे मिलकर आया हूँ।”
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