The Token System – Chapter 936
मैं दो पल सीढ़ी पर खड़ा रहा। पीछे हवा में अदालत की खिड़कियों से काग़ज़ की गंध आ रही थी — धूल, स्याही, और पुराने कपड़े की।
अंदर गया तो कमरा भरा था। बंसी पहले बेंच पर बैठा था, मेरी तरफ़ देखकर उसने आँख से सवाल किया। मैंने सिर हिलाया — अभी नहीं।
राहुल सामने की बेंच पर बैठ गया। उसकी किताब गोद में थी।
जज साहब आए। काग़ज़ खुले। हरीश चंद्र खड़े हुए और बोले — "माई लॉर्ड, हिस्सेदारी का हिसाब पूरा है। पर एक नाम अभी खाली है — भवानी के बाप के पहले काग़ज़ पर चौथा नाम। जो अदालत तक आज आया है।"
"कौन?" जज ने पूछा।
राहुल खड़ा हुआ।
"मैं," उसने कहा। "राहुल। जगन्नाथ लाल के मुंशी का बेटा। पर मैं यहाँ अपने नाम के लिए नहीं आया। मैं उस औरत के नाम के लिए आया हूँ जिसका नाम भवानी के हर काग़ज़ से काटा गया — बीरा देवी।"
कमरे में काग़ज़ों की आवाज़ रुक गई।
"वो ज़िंदा है," राहुल ने कहा। "और वो उस कमरे में रही है जिसे भवानी ने बंद कराया। मैं उसका बयान लिखकर लाया हूँ।"
उसने किताब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला। कोर्ट मास्टर ने लिया, जज को दिया।
जज ने पढ़ा। फिर चश्मा उतारा।
"यह बयान क़बूल है। बीरा देवी को सुनवाई में बुलाया जाएगा।"
मैंने राहुल की तरफ़ देखा। वो बैठ गया था, और उसका चेहरा — जो अब तक पत्थर जैसा था — पहली बार थोड़ा ढीला हुआ।
तभी मेरे पास कोई बैठा। मैंने मुड़कर देखा — शेखर बाबू। साँस फूल रही थी, माथे पर पसीना, और हाथ में वही असली लिफ़ाफ़ा।
"मिल गया," उसने फुसफुसाया। "कल रात मेरे घर पर कोई आया था। मैंने लिफ़ाफ़ा पीछे के आँगन की ईंट के नीचे रख दिया था। आज सुबह निकाला।"
"अंदर क्या है?"
"दो चीज़ें।" उसने लिफ़ाफ़ा मेरी ओर सरकाया। "एक काग़ज़ — बीरा देवी के नाम पर बना हुआ, आठ साल पुराना। और एक चाबी जो मैंने कभी नहीं देखी।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। काग़ज़ पर बीरा देवी का नाम था — साफ़, सीधा, तहसील की मुहर के साथ। और उसके नीचे एक चाबी — छोटी, तीन दाँते, पीतल की, जिसके हैंडल पर उलटा कोना-चिह्न था।
मेरी जेब में टोकन गरम हुआ। इतना गरम कि मैंने हाथ जेब पर रखा।
"क्या हुआ?" शेखर ने पूछा।
मैंने टोकन निकाला। उस पर नई लाइन उभर रही थी — "माँ। आज। पहले।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
जज ने फ़ैसला सुनाना शुरू किया — हवेली का आधा हिस्सा जगन्नाथ के परिवार का, आधा उन परिवारों का जिनसे ज़मीन छीनी गई। फिर रुके।
"पर एक बात पर अदालत को सफ़ाई चाहिए," जज ने कहा। "इस काग़ज़ पर बीरा देवी का नाम है — और यह काग़ज़ आज ही पेश हुआ। जब तक यह साबित न हो कि यह नाम जाली नहीं, फ़ैसला पूरा नहीं माना जाएगा।"
हरीश चंद्र खड़े हुए। "माई लॉर्ड, बीरा देवी को अदालत में हाज़िर किया जाए। अगर वो ज़िंदा है, तो वो ख़ुद बोले।"
"कल सुबह दस बजे," जज ने कहा। "बीरा देवी अदालत में पेश हों।"
मैंने टोकन जेब में रखा और उठ गया। राहुल भी उठा। हम दोनों एक ही समय में गलियारे की तरफ़ बढ़े। दरवाज़े पर वो मेरे कंधे के बराबर आ गया।
"जो चाबी मिली," उसने धीरे कहा, "वो भीतरी कमरे की नहीं है। वो उस दराज़ की है जो उस कमरे के अंदर है। और उस दराज़ में — बक्सा है। और बक्से में — दीवार का नक्शा।"
"तू जानता है इसका?"
"बीरा ने मुझे बताया था। पर मैं अंदर नहीं गया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैं नहीं जा सकता। जब भी मैं हवेली की ज़मीन छूता हूँ, मेरा पैर बेकार हो जाता है। किसी ने उस दिन मुझ पर शाप डाला था — जब मैं बारह साल का था और उस कुएँ में गिरा था।"
"किसने?"
"वो जो मर चुका है, पर मरा नहीं। हरि सिंह। वो मेरी माँ के पास आया था, मेरे ज़ख़्म पर हाथ रखा, और बोला — 'तू हवेली की ज़मीन नहीं छू पाएगा।' उसके बाद से मैंने कभी हवेली की छत नहीं छुई।"
"तो तेरे पैर में क्या है?"
"कुछ नहीं। दर्द महसूस होता है — डॉक्टर कुछ नहीं ढूँढ पाए। यही तो शाप है।"
मैंने सीढ़ियाँ उतरनी शुरू कीं।
"तू कल आएगा?"
"हाँ।" वो रुका। "पर एक बात और। जो चाबी मिली है — उस पर जो उलटा चिह्न है, वो भवानी के हिसाब में नहीं था। वो बीरा का था। यानी वो चाबी बीरा ने बनवाई थी — अपने बचने के लिए। उसने यह चाबी किसी और को दी थी, पर वो किसी और के हाथ लगी। तुझे ढूँढना होगा — किसके पास से गुज़री।"
मैं सीढ़ियों के आख़िरी कदम पर खड़ा था। सामने आँगन में भीड़ थी — अख़बार वाले, भवानी के पुराने आदमी, और एक कोने में छोटू खड़ा था जो मेरा इंतज़ार कर रहा था।
"राहुल," मैंने कहा। "कल सुबह बीरा देवी अदालत आएँगी। तुझे आना पड़ेगा — उनके साथ।"
वो मुस्कुराया। "मैं आऊँगा। पर मेरे साथ कोई और भी आएगा।"
"कौन?"
"भवानी। उसने कल रात मुझे ख़बर भेजी थी। वो चाहता है कि बीरा देवी ख़ुद आकर अपना नाम लिखवाए। वो जानता है कि अगर बीरा ख़ुद आई, तो पूरा हिसाब खुलेगा — और उसका बेटा अमर बच जाएगा। उसने कहा है — 'मैं चुप रहूँगा। पर बीरा को ख़ुद बोलने देना।'"
मेरे पैर जम गए।
"भवानी बदल गया है?"
राहुल ने कंधे उचकाए। "नहीं। भवानी डर गया है। और डरा हुआ आदमी सबसे सच्चा होता है। क्योंकि उसके पास अब खोने को कुछ नहीं बचा — सिवाय उस लड़के के जो उसने ख़ुद बेच दिया था।"
वो चला गया।
छोटू मेरे पास भागा आया।
"भैया, माँ कह रही है — घर चलो। बीरा दादी बुला रही हैं।"
मैंने उसका सिर छुआ। "चल।"
रास्ते में मेरी जेब में टोकन ठंडा हो गया — और एक पल के लिए लगा कि उसका वज़न कम हुआ है।
घर पहुँचा तो बीरा देवी पिछले कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थीं। सफ़ेद साड़ी, सूखा चेहरा, और आँखों में वो चीज़ जो दस साल अंधेरे में रहने से आती है — चमक नहीं, बल्कि रोशनी की आदत।
"कल सुबह," मैंने कहा, "अदालत में आपका नाम लिखा जाएगा।"
"मेरा नाम तो काग़ज़ पर लिखा है," उसने कहा। "कल बात मेरे चेहरे की होगी। और चेहरा सबसे बड़ा काग़ज़ होता है।"
वो कमरे के अंदर गईं और एक पल बाद लौटीं। हाथ में एक पतली मोमजामे की पुड़िया थी।
"ये ले। इसमें उस कमरे की मिट्टी है जहाँ मैं दस साल रही। जब अदालत में कोई पूछे कि तुमने क्या देखा — ये मिट्टी मेज़ पर रख देना। मैं तब बोलूँगी।"
मैंने पुड़िया ली। हल्की थी, पर हाथ में रखते ही बोझ लगी।
"अब सुन," बीरा देवी ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार सख़्त हुई। "राधे कल अदालत में होगा। वो कहेगा कि मैं पागल हूँ, कि मैंने ख़ुद अपनी मौत लिखवाई। पर तू याद रखना — जिस दिन मैं उस कमरे में बंद हुई, उस दिन राधे ने मेरे हाथ पर वो ज़ख़्म बाँधा था, और कहा था — 'बहन, तू चुप रह। मैं तेरा नाम कभी नहीं मिटाऊँगा।' और उसने क्या किया? मेरा नाम ख़ुद मिटाया।"
उसकी आवाज़ काँपी, पर आँसू नहीं आए।
"कल अदालत में मैं उसकी तरफ़ नहीं देखूँगी," उसने कहा। "क्योंकि अगर देखा, तो वो फिर कहेगा कि मैंने उसे दया दिखाई। और मैं उस पर दया नहीं करूँगी। मैं सिर्फ़ अपना हिसाब लिखूँगी।"
रात में मैं छत पर गया। टोकन जेब से निकाला। ठंडा था। पर उस पर एक नई लाइन उभरी — बारीक, छोटी।
"कल। तीन। पहला बोलेगा।"
मैंने टोकन हथेली में रखा और आसमान की तरफ़ देखा।
कल अदालत में तीन नाम बोलेंगे — बीरा देवी, राहुल और राधे। और तीनों में से कोई एक झूठ बोलेगा।
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