The Token System – Chapter 935
"वो राधे है?" मैंने दोहराया।
"हाँ।" बीरा देवी ने कहा। "उस दिन के बाद उसने अपना नाम बदल लिया। वो राधे नहीं रहा। वो बस — एक आदमी बन गया जो बदला लेता फिरता है। और अब वो तुमसे भी बदला लेना चाहता है, क्योंकि तुम उस किताब को पकड़कर खड़े हो जो उसने बीस साल ढूँढी और नहीं मिली।"
मेरी जेब में टोकन गरम हुआ।
मैंने निकाला।
उस पर एक लाइन उभरी थी — धीरे-धीरे, जैसे कोई दूर से लिख रहा हो।
"अदालत। पहले। फिर दीवार।"
"क्या लिखा है?" बंसी ने पूछा।
"कह रहा है — पहले अदालत।"
बीरा देवी ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार उसके चेहरे पर कुछ और दिखा — डर।
"वो अदालत आएगा," उसने कहा। "वो हर जगह आता है जहाँ हिसाब खुलता है। मेरे भाई को रोक नहीं सकते। तुम सिर्फ़ इतना कर सकते हो — कि जब वो आए, तुम मेरी तरफ़ मत देखना।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो तुम्हारी आँखों से पढ़ लेगा," उसने कहा, "कि मैं कहाँ हूँ।"
बाहर गली में किसी गाड़ी का हॉर्न बजा।
बंसी दौड़कर दरवाज़े पर गया और झाँका।
"सफ़ेद गाड़ी," उसने कहा। "गली के मोड़ पर। रुकी है।"
मैंने टोकन जेब में रखा और किताब उठाई — वही भूरी जिल्द वाली।
"सुमन," मैंने कहा, "बीरा देवी को अंदर ले जाओ। पिछले कमरे में।"
"और तुम?"
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। सूरज ऊपर आ रहा था। अदालत का वक़्त पास था।
"मैं अदालत जा रहा हूँ," मैंने कहा। "और अगर वो मुझसे पहले वहाँ पहुँचा," मैंने बंसी की तरफ़ देखा, "तो वो मेरी जगह नहीं ले सकता। मेरा नाम काग़ज़ पर है।"
मैंने किताब बंसी को दी।
"इसे अपने पास रख। अगर मैं अदालत से सीधा न आऊँ, तो इसे राजेंद्र को देना।"
बंसी ने किताब पकड़ी और मेरी आँखों में देखा।
"अदालत में मिलते हैं, भाई।"
मैंने सिर हिलाया और गली के मोड़ की तरफ़ चला।
सफ़ेद गाड़ी वहीं खड़ी थी — इंजन बंद। खिड़की खुली। अंदर सिर्फ़ एक बूढ़ा आदमी बैठा था, सफ़ेद दाढ़ी, टोपी — कोई और नहीं। उसने मुझे देखा और मुस्कुराया, फिर खिड़की बंद कर दी।
मैं रुक गया।
वो गाड़ी वहीं से धीरे-धीरे आगे बढ़ी, और उसकी पिछली सीट की खिड़की से एक काग़ज़ का टुकड़ा उड़कर मेरे पैरों पर आ गिरा।
मैंने उठाया।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, और नीचे उलटा कोना-चिह्न —
"अदालत में तेरा नाम आज नहीं लिखा जाएगा। क्योंकि जो नाम पहले लिखा जाएगा, वो मेरा होगा। — राधे।"
मैंने काग़ज़ मुट्ठी में दबाया और अदालत की तरफ़ चल दिया।
पीछे से बंसी की आवाज़ आई — कुछ कह रहा था, पर हवा ने उसे उड़ा दिया। मैंने पलटकर नहीं देखा।
जब मैं अदालत की सीढ़ियों पर पहुँचा, तो सामने लाल बत्ती वाली एक पुरानी गाड़ी से एक आदमी उतर रहा था।
सफ़ेद कुर्ता। उलटा ज़ख़्म। और हाथ में — वही भूरी जिल्द वाली किताब जैसी एक और किताब।
उसने सीढ़ियों पर मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।
"देर कर दी, मनोहर। मैंने सोचा था तू पहले पहुँचेगा।"
और वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगा — मेरे आगे, मेरे अपने शब्दों के साथ, मेरी ही अदालत में।
॥
सीढ़ियों पर वो मेरे आगे था, पर मैंने अपनी रफ़्तार नहीं बदली। दो कदम चढ़ा, फिर रुक गया।
"तेरा नाम क्या है?"
वो पलटा। हाथ का ज़ख़्म सूरज की तरफ़ आते ही और उभर आया — उल्टा, नीचे से लंबा, जैसे किसी ने जान-बूझकर बनाया हो।
"राहुल," उसने कहा।
"भवानी का आदमी?"
वो हँसा। ऐसी हँसी जिसमें मज़ाक कम, थकान ज़्यादा थी।
"भवानी का आदमी नहीं। जगन्नाथ चाचा के पुराने मुंशी का बेटा। तेरे दादा का लगाया हुआ, अगर तू सीधी बात करे।"
मेरे पैर सीढ़ी पर जम गए।
"मेरे दादा का?"
"तेरे दादा ने मुझे उस दिन कुएँ पर खींच लिया था। जब मैं बारह साल का था और हाथ से खून बह रहा था। उसने मेरी कलाई पर कपड़ा बाँधा और कहा — बेटा, ज़ख़्म दिखेगा, तो ही लोग भरोसा करेंगे।"
मैंने उसकी कलाई की तरफ़ देखा।
"ये सचमुच का है?"
"हाँ। मैंने ख़ुद बनवाया।" उसने आस्तीन चढ़ाई। निशान पर पुराना सूखा घाव साफ़ दिख रहा था। "भवानी के आदमियों में घुसना था। उसके होम में, उसके काग़ज़ों के बीच। ज़ख़्म के बिना कोई तुझे अपना आदमी नहीं मानता। तेरे दादा ने यही सिखाया था।"
"किसके लिए काम कर रहा है?"
वो सीढ़ी की रेलिंग पर टिक गया और मेरी आँखों में सीधा देखा।
"उस औरत के लिए जिसे सब मरी हुई समझते हैं।"
मेरे हाथ से काग़ज़ गिरते-गिरते रहा।
"अमर की माँ," उसने कहा। "बीरा देवी।"
मेरा सिर घूम गया। मैंने रेलिंग पकड़ी।
"वो मेरे घर पर है। मैंने उसे आज सुबह देखा है।"
"नहीं।" राहुल ने सिर हिलाया। "जो तूने देखा, वो उसकी बहन है — जो तेरे घर आई थी, कौशल्या को लेकर। बीरा उससे मिलना चाहती थी, पर ख़ुद सामने नहीं आई। वो अब भी जगन्नाथ चाचा के पुराने मकान की ऊपर वाली मंज़िल पर है। दस साल से। और पिछले चार महीने से उसी दालान में एक खिड़की है जो हवेली की छत की खिड़की से सीधी दिखती है। वो वहाँ से सब देख रही है। तुझे भी।"
"तो वो ज़िंदा है," मैंने धीरे से कहा।
"ज़िंदा है। पर उसने ख़ुद को मरा हुआ लिखवाया, क्योंकि ज़िंदा औरत को भवानी ढूँढ लेता था। लाश को नहीं।"
मैंने कुछ सोचा। फिर पूछा — "उसने तुझे क्या बनाया?"
"मुझे नहीं बनाया। मैं ख़ुद गया था। जब उसका बेटा अमर भवानी के दरवाज़े पर पड़ा था, तब कोई नहीं गया था। मैं गया। और उसने मुझे एक काम दिया — देखना, कि अमर के साथ क्या हो रहा है। भवानी ने उसे जिस कोठरी में रखा, वहाँ से उसके काग़ज़ चुराना। बस एक शर्त थी — जब तक अमर न बचे, तब तक अमर की माँ सामने नहीं आएगी।"
"और वो काग़ज़ कौन सा?"
राहुल ने अपनी किताब खोली। वो भूरी जिल्द वाली नहीं थी — उससे पतली, मैली, किनारे जले हुए।
"ये वो काग़ज़ों की सूची है जो भवानी ने बीस साल में जलाए," उसने कहा। "हर काग़ज़ के सामने लिखा है किसने उसे देखा, किसने उसे पढ़ा, किसने उसे छिपाया। और यहाँ—" उसने उँगली रखी, "—तेरे दादा का नाम है। तीन जगह।"
"कहाँ?"
"एक — हवेली का पहला काग़ज़। दो — ज़मीन का बँटवारा। तीन — वो काग़ज़ जो तेरी माँ के नाम पर बना है।"
अंदर से घंटी बजी। ऊपर के गलियारे में किसी की परछाईं गुज़री और गायब हो गई।
"फ़ैसला सुनाया जाएगा," किसी ने ऊपर से आवाज़ दी। "पक्षकार अंदर आएँ।"
राहुल ने किताब बंद की और सीढ़ी का एक कदम और चढ़ा। फिर पलटा।
"अदालत जाने से पहले एक बात।"
उसने मेरा हाथ पकड़ा। मुट्ठी में कुछ दबा दिया। गोल, ठंडा, पीतल जैसा — पर पत्थर जैसा भारी।
"वो औरत हवेली के भीतरी कमरे में बंद रही है दस साल। उसने तेरे दादा की बातें सुनी हैं, दीवार के पार से। और वो कहती है—" उसने मेरी आँखों में देखा, "—कि उस कमरे की दीवार पर तेरा नाम पहले से लिखा है। लिखा हुआ, स्याही में नहीं — किसी और चीज़ में।"
"क्या मतलब?"
"मतलब ये कि वो कमरा तेरा रास्ता नहीं है। वो तेरा पता है।"
मैंने मुट्ठी खोली। वही पीतल की गोली थी — बिल्कुल टोकन जैसी, पर कोरों पर मुड़ी हुई, जैसे किसी ने दो टोकन को गला कर एक किया हो।
मेरी जेब में टोकन हिला। मैंने निकाला। उस पर लिखा था — "भीतर। तीन। पहले वाला नहीं।"
राहुल ने मेरे हाथ में देखकर कुछ नहीं कहा। वो ऊपर चला गया।
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